मकोकचुंग के खेत में मुस्कराता वो चेहरा, क्यों नहीं भुला सकता हूँ

थोड़ी देर में वो बुज़ुर्ग महिला दो प्लेट में चावल और उसके साथ कुछ साग और सूअर का मीट लेकर झोंपड़ी से बाहर निकली. मुझे लगा कि दोनों के खाने का समय है, और उन्हें आराम से खाना खाने दिया जाए. मैंने बुज़ुर्ग महिला से कहा कि वो खाना खा लें, मैं थोड़ी देर में आता हूं, नीचे की तरफ़ घूम कर. लेकिन उन्होनें हंसते हुए मुझे बैठने का इशारा किया. उन्होंने एक प्लेट अपने पति को दे दी, और दूसरी मेरी तरफ़ बढ़ा दी. ज़ाहिर है इस बुज़ुर्ग दंपत्ति ने अपने खाने में से ही मुझे कुछ खाने के लिए दे दिया था. क्योंकि ये दो लोग ही तो घर से काम करने आए थे तो खाना भी तो अपने ही हिसाब से लाए होंगे.

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मैं अपनी टीम के साथ नागालैंड के मोन ज़िले के कोनियाक आदिवासियों से मिल कर मकोकचुंग के लिए निकला था. मोन से मकोकचुंग की सड़क की हालत ठीक ठाक थी.

लेकिन पहाड़ी रास्ते पर इस घुमावदार सड़क पर गाड़ी की रफ़्तार काफ़ी कम ही रखनी पड़ी थी.

हम सुबह जल्दी निकल गए थे, हमारा अंदाज़ा था कि हम 12 बजे तक मकोकचुंग पहुँच जाएँगे. लेकिन जैसा अक्सर होता है, रास्ते में कुछ शूट करते हुए भी चल रहे थे. इसलिए दिन का 1 बज गया था और अभी हम मोककचुंग नहीं पहुँचे थे. 

डेढ़ बजे के क़रीब हम एक जगह रुके जहां मील का पत्थर बता रहा था कि मोकोकचुंग अब सिर्फ़ 5 किलोमीटर रह गया है. यहां पहाड़ी ढलानों पर दूर तक फैले खेत खिली धूप में बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रहे थे. 

खेतों में बलखाती बहुत नीचे तक उतरती पगडंडियां जिन पर फिसलने से बचने के लिए सीढ़ियां खोद कर बनाई गई हैं. ऊपर सड़क से खड़े होकर खेतों में दूर दूर सैंकड़ों झोंपड़ी नज़र आती हैं.

हमने फ़ैसला किया कि नीचे उतर कर देखा जाए और हो सके तो इन खेतों में किसी से बात करने की कोशिश की जाए. पर ये चिंता थी कि पता नहीं इन खेतों में काम करते लोगों में से कोई हिंदी या इंग्लिश समझ पाएंगे या नहीं. 

यही सोचते हम एक पगडंडी से नीचे उतर गए. थोड़ा ही नीचे उतरे तो देखा एक बुज़ुर्ग दंपत्ति खेतों में छोटी-छोटी खुरपाली से मक्का के बीज चोभ रहे थे. 

मैंने इन लोगों को ज़ोर से नमस्ते किया तो इनका ध्यान मेरी तरफ़ गया. दोनों जिस तरह से मुस्कुराए, उससे लगा कि वो हमारे वहां होने से कम-से-कम ख़फ़ा नहीं हैं. मैंने उन्हें बताया कि हम दिल्ली से आए हैं.

वो दोनों मेरे पास आए और झोंपड़ी की तरफ़ चलने का इशारा किया. हल्की ठंड में धूप बहुत अच्छी लग रही थी. हम लोग बाहर ही बैठ गए. बुज़ुर्ग महिला झोंपड़ी के अंदर चली गई. जबकि उनके साथी हाथ धोने लगे. 

थोड़ी देर में वो बुज़ुर्ग महिला दो प्लेट में चावल और उसके साथ कुछ साग और सूअर का मीट लेकर झोंपड़ी से बाहर निकली. मुझे लगा कि दोनों के खाने का समय है, और उन्हें आराम से खाना खाने दिया जाए. 

मैंने बुज़ुर्ग महिला से कहा कि वो खाना खा लें, मैं थोड़ी देर में आता हूं, नीचे की तरफ़ घूम कर. लेकिन उन्होनें हंसते हुए मुझे बैठने का इशारा किया. उन्होंने एक प्लेट अपने पति को दे दी, और दूसरी मेरी तरफ़ बढ़ा दी. 

लेकिन उन्होंने प्लेट में मौजूद सूअर के मीट की तरफ़ इशारा किया. मैं समझ गया कि वो मुझे बताना चाह रही हैं कि यह सूअर का मीट है. मैंने उन्हें कहा कि मैं सूअर का मीट भी खा लेता हूं. इस पर उनके चेहरे पर संतोष के भाव थे.

ज़ाहिर है इस बुज़ुर्ग दंपत्ति ने अपने खाने में से ही मुझे कुछ खाने के लिए दे दिया था. क्योंकि ये दो लोग ही तो घर से काम करने आए थे तो खाना भी तो अपने ही हिसाब से लाए होंगे. 

यह बात मैने बुज़ुर्ग पुरुष को कही. उन्होंने हिंदी में हंसते हुए कहा बेफ़िक्र होकर खाएं, उन्हें कम नहीं पड़ेगा. लेकिन उन्हें अफ़सोस है कि वो मेरे कैमरामैन साथियों को खाना नहीं दे पा रहे हैं. 

मैंने उन्हें बताया कि मेरे साथी मांस नहीं खाते हैं. इसलिए वो अफ़सोस ना करें. इन दोनों के साथ खाना खाते समय उनके परिवार के बारे में कुछ बातें हुई. 

इनके कुल 12 बच्चे हैं – 6 लड़के और 6 लड़कियां. सभी पढ़ाई-लिखाई या नौकरी के सिलसिले में बाहर हैं. इनका एक बेटा फ़ौज में है और एक बेटी कोहिमा में नर्स है. 

खेती इन दोनों बुज़ुर्गों के भरोसे है. इन लोगों से बातचीत में पता चला कि यह स्थिति अब ज़्यादातर परिवारों में दिख रही है. अब यहां भी नई पीढ़ी खेती में खुद को नहीं खपाना चाहती.

आओ आदिवासी इन पहाड़ी ढलानों पर मिश्रित खेती करते हैं. इस खेती में मेहनत बहुत ज़्यादा करनी पड़ती है, और उत्पादन बहुत ज़्यादा नहीं होता है. लेकिन फिर भी परिवार भर की ज़रूरत के लिए फसल हो जाती है. 

उन्होंने बताया कि यहां पर अभी भी पूरी तरह से परंपरागत खेती होती है. यानि जूम खेती होती है, जिसमें आग से जलाकर पहाड़ों को खाली किया जाता है और फिर उसको खेती के लिए तैयार किया जाता है.

इन खेतों में बेशक फ़सल इन आदिवासियों के अपने परिवार के पालन-पोषण लायक ही हो पाती है, लेकिन एक बात संतोष देने वाली है कि कम से कम यहां की सामाजिक संरचना ऐसी है कि ये बीज, दवा या खाद के लिए साहूकारों के जाल में नहीं फंसे हैं. 

यहां पर अब फल, रबड़ और दूसरे पौधे लगाये जा रहे हैं. यह एक प्रयोग है जो अगर सफल होता है तो यह आदिवासी समुदाय स्थाई खेती की तरफ़ बढ़ सकता है.

मैंने बुज़ुर्ग दंपत्ति से अपनी झोंपड़ी दिखाने को कहा तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चाय पीना पसंद करूंगा. मैंने हां कहा, तो बांस के दो कप में बुज़ुर्ग महिला चाय ले आईं. 

यह बिना दूध की लाल चाय थी, जिसमें चीनी भी नहीं थी. यहां पर लगभग हर घर अपनी ज़रूरत के लिहाज़ से घर के आंगन में या खेतों में चाय के पौधे लगाता है. 

इन्होंने बताया कि ये लोग चाय में दूध या चीनी का इस्तेमाल बिलकुल भी नहीं करते हैं. लाल चाय की खुश्बु तो अच्छी थी ही, खाना खाने के बाद यह गर्म चाय  का मज़ा आ गया था.

चाय पीने के बाद हम जब इन से विदा लेने लगे तो उन्होंने झोंपड़ी की तरफ़ इशारा किया. मैं झोंपड़ी के अंदर गया तो कोने में एक चूल्हा था, एक तरफ़ लकड़ी से जमा करके रखी गईं थीं. 

चूल्हे पर अभी भी बर्तन में लाल चाय बची थी. उन्होंने बताया कि यहां जो सैंकड़ों झोंपड़ियां नज़र आ रही हैं, उनमें सभी में आपको चूल्हा और लकड़ी ज़रूर मिलेंगे. 

लकड़ियों को बेहद सफ़ाई से झांग कर चार लकड़ी गाड़ कर उनके बीच फंसा कर जमा किया गया था. उन्होंने बताया कि जब पहाड़ को खेती के लिए साफ़ किया जाता है तो ये लकड़ियां जमा कर ली जाती हैं. 

झोंपड़ी में चार-पांच हरे, मोटे और लंबे बांसों को खड़ा करके रखा गया था. मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि इनमें पानी भर कर रखा जाता है. यह पानी झोंपडी में आग लगने की सूरत में इस्तेमाल करने के लिए रखा गया है.

इन बुजुर्गों से कुछ देर और बातचीत होती रही. लेकिन मुझे अहसास था कि मेरे कैमरामैन साथी भूख से बिलबिला रहे होंगे. खासतौर से हल्की ठंड के मौसम में अपने एक साथी को धूप में बैठ कर खाना खाते देख तो उनकी भूख और भी तेज़ हो गई होगी.

मैंने इन बुजुर्गों से विदा ली, आज 3-4 साल बाद भी उनकी गर्मजोशी की याद आती है तो मन खुश हो जाता है. 

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