आदिवासी लड़की की न्यायपालिका में सर्वोच्च पद पर पहुँचने की हसरत

16 वर्षीय मृदुला कहती हैं, “मैं अपने समुदाय जैसे हाशिए के वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए देश की न्यायिक प्रणाली के सर्वोच्च पद का सपना देख रहा हूं. मेरी सीनियर के.के. राधिका ने पिछले साल CLAT को क्रैक किया, जिसने मुझे परीक्षा में बैठने के लिए प्रेरित किया,.”

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देश की जेलों में सबसे अधिक संख्या आदिवासियों और दलितों की है. यह जानकारी बाक़ायदा सरकार ने संसद में दी है. इसके अलावा आदिवासियों का विस्थापन, ज़मीनों की दावेदारी, उनके संवैधानिक अधिकार और परंपरागत सामाजिक व्यवस्थाओं के सवाल, ये बातें चर्चा में ही नहीं आते हैं. 

जब ये मसले आमतौर पर न्यायालयों के सामने आते ही नहीं हैं. जब कभी ऐसा संयोग बनता है कि मामला न्यायालय में पहुँचता है तो, आमतौर पर आदिवासी हार जाते हैं.

लेकिन जब देश के किसी हिस्से से यह ख़बर आती है कि न्यायपालिका में आदिवासी के प्रतिनिधित्व ग़ायब होना किसी को प्रेरित कर रहा है तो अच्छा लगता है.

केरल के वायनाड जिले में वराचमकुन्नू कट्टुनायक्कन आदिवासी बस्ती की 16 वर्षीय मृदुला कहती हैं, “मैं अपने समुदाय जैसे हाशिए के वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए देश की न्यायिक प्रणाली के सर्वोच्च पद का सपना देख रहा हूं. मेरी सीनियर के.के. राधिका ने पिछले साल CLAT को क्रैक किया, जिसने मुझे परीक्षा में बैठने के लिए प्रेरित किया,.”

वो कहती हैं, “मैं अपना कोर्स पूरा करने के बाद एक अच्छा वकील बनना चाहती हूं.” मृदुला की माँ सुमा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत दिहाड़ी मज़दूरी करती हैं. 

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) ने 23 लड़कियों सहित 27 आदिवासी छात्रों को परीक्षा में बैठने के लिए तीन महीने का प्रशिक्षण दिया था.

उनमें से आठ छात्र, आर.जी. अयाना, पी. श्रीकुट्टी, ए. अम्मू, के.के. अनघा, आदित्य, एम. आर. अखिल, आर. राहुल और दिव्या विजयन ने परीक्षा पास कर ली है. अब ये आदिवासी छात्र देश के अलग अलग राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाएँगे. 

डीएलएसए के के अधिकारियों का कहना था कि यह ट्रेनिंग प्रोग्राम आसान नहीं था. क्योंकि कोविड की वजह से परस्थिति सामान्य नहीं थी.

लेकिन संस्था ने कोविड ​​​​-19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए कनियामपेटा में आदिवासी बच्चों के लिए मॉडल आवासीय विद्यालय में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया था. 

इस संस्था का कहना है कि भारत की पूरी न्याय व्यवस्था में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व ना के बराबर है. इसलिए उन्हें लगा कि आदिवासी छात्रों को लॉ की पढ़ाई के लिए प्रेरित भी किया जाए और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाए. 

एकीकृत जनजातीय विकास परियोजना, वायनाड ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को सहयोग दिया था. यह ख़बर फ़िलहाल ख़बर ही है. रास्ता लंबा और संघर्ष से भरा होगा, लेकिन उम्मीद तो बंधती है. 

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