महाराष्ट्र में कुपोषण से बच्चों की मौत पर मंत्री का चौंकाने वाला दावा, एक भी मौत से इंकार

भारी विवाद के बाद, विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने मंत्री विजयकुमार गावित से सवाल आरक्षित करने और कुपोषण के बारे में ताजा जानकारी देने को कहा. अध्यक्ष नार्वेकर ने यह भी बताया कि प्रश्न के उत्तर को संशोधित करने की आवश्यकता है क्योंकि सदन के समक्ष जो कुछ भी प्रस्तुत किया जाता है वह एक आधिकारिक दस्तावेज बन जाता है और कोई भी गलत या भ्रामक जानकारी प्रस्तुत नहीं की जानी चाहिए.

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किसी भी सरकार के लिए यह मानना बेहद मुश्किल काम होता है कि उसके शासन में भूख या कुपोषण से मौत हुई हैं. लेकिन सभी आँकड़ों और रिपोर्टों को ख़ारिज करना आसान नहीं होता है. विधान सभा या संसद में पूछे सवाल के जवाब में तो यह और भी मुश्किल काम होता है. क्योंकि ग़लत जानकारी देने की सूरत में सरकार को शर्मिंदा होना पड़ता है.

लेकिन महाराष्ट्र के आदिवासी विकास मंत्री विजयकुमार गावित ने बुधवार को राज्य विधानसभा में कहा कि पिछले पांच वर्षों में राज्य में कुपोषण के कारण एक भी बच्चे की मौत नहीं हुई है.

विजयकुमार गावित ने कहा, “राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा मेरे कार्यालय के साथ साझा की गई जानकारी के अनुसार, राज्य में कुपोषण के कारण किसी बच्चे की मौत की सूचना नहीं है. राज्य में 16 ज़िले ऐसे हैं जहां आदिवासी आबादी की पहचान की गई है. लेकिन पिछले पांच वर्षों में किसी भी ज़िले में कुपोषण के कारण मौत की सूचना नहीं है.”

हालांकि, एनसीपी और कांग्रेस के सदस्यों ने मंत्री के इस दावे पर आपत्ति जताई. विपक्ष के नेता अजीत पवार ने विजयकुमार के दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा, “यह एक सर्वविदित तथ्य है कि राज्य में कुपोषण के मामले सामने आए हैं और हर साल कई बच्चे इसके कारण मर जाते हैं.”

वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता ने दावा किया, “अकेले मेलघाट (अमरावती ज़िला) में इस साल 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच 18 बच्चों की मौत हुई.”

इस मुद्दे पर भारी विवाद के बाद, विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने मंत्री विजयकुमार गावित से सवाल आरक्षित करने और कुपोषण के बारे में ताजा जानकारी देने को कहा. अध्यक्ष नार्वेकर ने यह भी बताया कि प्रश्न के उत्तर को संशोधित करने की आवश्यकता है क्योंकि सदन के समक्ष जो कुछ भी प्रस्तुत किया जाता है वह एक आधिकारिक दस्तावेज बन जाता है और कोई भी गलत या भ्रामक जानकारी प्रस्तुत नहीं की जानी चाहिए. उन्होंने मंत्री से सवाल वापस लेने और अपने विभाग से नए सिरे से जवाब मांगने को कहा है.

दरअसल प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक कुणाल पाटिल ने आदिवासी क्षेत्रों में माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए बनाई गई नवसंजीवनी योजना और आदिवासी आबादी वाले 16 ज़िलों में इसे लागू करने पर सवाल उठाया.

यह पूछे जाने पर कि क्या 16 आदिवासी ज़िलों में पिछले पांच वर्षों में कुपोषण के कारण 8,842 बच्चों की मृत्यु हुई है?

जिसके जवाब में मृत्यु के कारणों को समय से पहले जन्म, कम वजन, सेप्सिस, श्वसन संकट, जन्मजात विसंगति, जन्म श्वासावरोध और निमोनिया के रूप में बताया गया.

ऐसे में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के विधायक दिलीप वालसे-पाटिल ने बताया कि जवाब में कुपोषण से होने वाली मौतों की संख्या के बारे में कुछ नहीं कहा गया. उन्होंने मंत्री से पूछा “तो क्या हम कह रहे हैं कि महाराष्ट्र में पिछले पांच सालों में कुपोषण के कारण एक भी मौत नहीं हुई है?”

जवाब में मंत्री विजयकुमार गावित ने कहा कि जनस्वास्थ्य एवं महिला एवं बाल कल्याण विभाग से उनके विभाग को सूचना उपलब्ध करायी गई है. जिसके बाद वालसे-पाटिल ने कहा कि प्रश्न को रोक कर रखा जाना चाहिए और विस्तृत उत्तर मांगा जाना चाहिए.

विपक्ष के नेता अजीत पवार ने भी हस्तक्षेप करते हुए पूछा कि यह कैसे दावा किया जा सकता है कि कुपोषण के कारण कोई मौत नहीं हुई. मैंने पिछले हफ्ते मेलघाट इलाके का दौरा किया, जहां मुझे कुपोषण के कारण बच्चों की मौत की खबरें मिलीं.

सरकार ने आदिवासी बच्चों की मृत्यु के जो कारण गिनवाए समय से पहले जन्म, कम वजन, सेप्सिस, श्वसन संकट, जन्मजात विसंगति, जन्म श्वासावरोध और निमोनिया गिनवाएं हैं. इस नज़रिए से देखेंगे तो फिर महाराष्ट्र ही क्यों देश के किसी भी राज्य में कुपोषण से मौत का एक भी मामला नहीं मिलेगा.

लेकिन आदिवासी इलाक़ों मे स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले ज़्यादातर संगठन यही कहते हैं कि यहाँ पर बीमारी की असली जड़ कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है. बोम्बे हाईकोर्ट ने जनवरी महीने में इस तरह के संगठनों की जनहित याचिका में दिए गए तथ्यों के आधार पर आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण को गंभीर मुद्दा माना था.

हाईकोर्ट ने मेलघाट और दूसरे इलाकों में कुपोषण पर डाक्टर चेरिंग दोरजे (Dr Chhering Dorje’s report) की रिपोर्ट का संज्ञान भी लिया था. उस वक्त हाई कोर्ट ने सरकार की कोशिशों पर संतोष प्रकट किया था लेकिन साथ में यह भी कहा था कि कोर्ट हर महीने सरकार की कोशिशों का जायजा लेगा.

पिछले हफ़्ते ही सरकार को आदिवासी इलाक़ों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हाईकोर्ट से ज़बरदस्त फ़टकार पड़ी थी. दरअसल मुंबई से क़रीब 115 किलोमीटर दूर पालघर ज़िले में एक गर्भवती औरत को अस्पताल तक नहीं पहुँचाया जा सका था. क्योंकि उसके गाँव तक सड़क नहीं है इसलिए वहाँ एंबुलेंस नहीं जाती है. लोगों ने चद्दर और बांस की डोली बना कर इस महिला को अस्पताल तक पहुँचाने की कोशिश की थी.

लेकिन जब तक उसे अस्पताल पहुँचाया जाता तब काफ़ी देर हो चुकी थी. इस देरी की वजह से उसके नवजात जुड़वां बच्चों की मौत हो गई थी.

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