आदिवासी पहचान और उपलब्धियों की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी

प्रजिता सी पनिया, अडिया और काट्टुनायकन आदिवासी समुदायों की छह युवतियों में से एक हैं, जिन्होंने वर्कशॉप में वायनाड के कुछ उद्यमी आदिवासियों का मौखिक इतिहास (Oral History) प्रस्तुत किया. कुल मिलाकर, 20 आदिवासी लड़कियों ने 13 आदिवासियों से बात कर उनके जीवन और उपलब्धियों का दस्तावेज़ीकरण किया है.

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चावल की पारंपरिक किस्मों के संरक्षण में योगदान,  वायनाड में रिसॉर्ट्स की बढ़ती संख्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन, भूमि संघर्ष के लिए हुए मुतंगा विरोध में भागीदारी, दैनिक मज़दूरी में बढ़ोतरी की मांग के लिए आंदोलन, और बच्चों की पीढ़ियों को जन्म देने में मदद – यह केरल के वायनाड ज़िले के आदिवासियों की कुछ ऐसी कहानियां हैं, जो आदिवासियों द्वारा ही बयां की जा रही हैं.

मसलन, वायनाड ज़िले के मानंतावड़ी के एक आदिवासी किसान, चेरुवायल रामन ने लगभग 50 किस्मों का संरक्षण कर चावल की आनुवांशिक विविधता की रक्षा की है. रामन के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि वह 10 साल के भी नहीं थे जब उन्होंने अपने चाचा की खेतों में मदद, और चावल की किस्मों को समझना शुरु कर दिया था.

चेरुवायल रामन के जीवन की यह झलक वायनाड की तोंडरनाड पंचायत की प्रजिता सी ने केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में आयोजित ‘ओंटू निल्लुवा’ नामक एक वर्कशॉप में की. आदिवासी अडिया भाषा में ‘ओंटू निल्लुवा’ का मतलब ‘साथ रहने के लिए’ है.

प्रजिता सी पनिया, अडिया और काट्टुनायकन आदिवासी समुदायों की छह युवतियों में से एक हैं, जिन्होंने वर्कशॉप में वायनाड के कुछ उद्यमी आदिवासियों का मौखिक इतिहास (Oral History) प्रस्तुत किया. कुल मिलाकर, 20 आदिवासी लड़कियों ने 13 आदिवासियों से बात कर उनके जीवन और उपलब्धियों का दस्तावेज़ीकरण किया है.

इस दस्तावेज़ में वो महिलाएं शामिल हैं जिन्होंने वायनाड में रिसॉर्ट्स की बढ़ती संख्या के ख़िलाफ़ विरोध शुरू किया, जिन्होंने भूमि अधिकारों के लिए हुए मुतंगा संघर्ष की गवाह बनीं, जो दैनिक मज़दूरी में बढ़ोतरी की मांग करने वाले आंदोलन में लगी हुई थीं, और जिसने आदिवासी बच्चों की पीढ़ियों को जन्म देने में मदद की.

‘ओंटू निल्लुवा’ जनजातीय शिक्षा पद्धति परियोजना ( Tribal Education Methodology project) के हिस्से के रूप में शुरू की गई एक गतिविधि है. इस परियोजना का मक़सद मुख्यधारा की शिक्षा में हस्तक्षेप करना है. इसे राज्य सरकार ने लिंकन यूनिवर्सिटी के साथ साझेदारी में शुरू किया है.

थिएटर और कला के इस्तेमाल से आदिवासी संस्कृति को मुख्यधारा के स्कूली पाठ्यक्रम के साथ एकीकृत करने के लिए इस परियोजना को सितंबर 2019 में लॉन्च किया गया था.

लिंकन यूनिवर्सिटी के श्रीनाथ नायर ने द हिंदू को बताया कि स्कूली पाठ्यक्रम में आदिवासी कला और संस्कृति शामिल होना ज़रूरी है, ताकि आधुनिक शिक्षा पाने के बावजूद बच्चों का अपनी जड़ों से जुड़ाव बना रहे.

ओंटू निल्लुवा के हिस्से के रूप में आदिवासी युवाओं द्वारा कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी और आदिवासी संस्कृति की एक झलक पेश करने का प्रयास है.

ट्राइबल एजुकेशन मेथडोलॉजी प्रोजेक्ट को केरल डेवलपमेंट एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक काउंसिल के माध्यम से यूके के आर्ट एंड ह्यूमैनिटीज रिसर्च काउंसिल, और ग्लोबल चैलेंजेस रिसर्च फंड के सहयोग से लागू किया जा रहा है.

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