केरल में खुले आज स्कूल, क्या आदिवासी छात्र भी लौटेंगे?

आदिवासी कल्याण विभाग का दावा है कि अधिकांश छात्र बुधवार को स्कूल पहुंचेंगे, लेकिन आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस दावे पर आशंका जताई है.

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केरल में आज छात्र, शिक्षक और माता-पिता दो साल की महामारी के बाद एक नए शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत का जश्न मना रहे हैं. कोविड महामारी ने शिक्षा प्रणाली को बुरी तरह बाधित कर दिया था. हालांकि, इसका सबसे ज्यादा असर शायद आदिवासी समुदाय और दूसरे गरीब तबकों का छात्रों पर पड़ा था.

ऊपर से, केरल सरकार के 334 एकल शिक्षक स्कूलों को बंद करने के फैसले ने दूरदराज के जंगलों में बसे आदिवासी परिवारों के बच्चों को हाशिए पर धकेल दिया है.

वैसे तो आदिवासी कल्याण विभाग का दावा है कि अधिकांश छात्र बुधवार को स्कूल पहुंचेंगे, लेकिन आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस दावे पर आशंका जताई है.

आदिवासी छात्रों को वापस स्कूल लाना मुश्किल

“आदिवासी छात्रावासों में रहने वाले छात्रों को लॉकडाउन के दौरान कॉलोनियों में वापस भेज दिया गया और उन्होंने माता-पिता की दिनचर्या में मदद करना शुरू कर दिया. हालांकि पिछले साल नवंबर में स्कूल खोले गए थे, लेकिन बच्चे लौटने से हिचक रहे थे. एकल शिक्षक स्कूलों के बंद होने से माता पिता को प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों को भी हॉस्टल भेजना होगा. लेकिन राज्य के कई प्री-मैट्रिक छात्रावासों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. प्राथमिक कक्षाओं से लेकर प्लस टू तक के छात्र बेहद तंगी से हॉस्टल में रहते हैं,” आदिवासी एक्य वेदी की अध्यक्ष चित्रा निलंबूर ने कहा.

आदिवासी कल्याण विभाग ने पंचायतों के सहयोग से गोत्रसारथी योजना के तहत छात्रों को आदिवासी कॉलोनियों से स्कूल तक पहुंचाने के लिए वाहनों की व्यवस्था की है.

“हालांकि वैकल्पिक शिक्षण केंद्र बंद कर दिए गए हैं, सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी छात्र स्कूल जाने से वंचित न रह जाए, गोत्रसरथी योजना तैयार की है. जो बच्चे अपने माता-पिता के साथ रहना चाहते हैं, वे गोत्रसारथी योजना का लाभ उठा सकते हैं, जबकि घने जंगलों में रहने वाले आदिवासी छात्र हॉस्टल में रह सकते हैं,” आदिवासी कल्याण विभाग के उप निदेशक के कृष्ण प्रकाश ने कहा.

कृष्ण प्रकाश ने यह भी दावा किया कि लॉकडाउन के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में कोई ड्रॉपआउट नहीं था क्योंकि सरकार ने सभी कॉलोनियों में शिक्षण केंद्रों की व्यवस्था की थी. कहीं-कहीं रिटायर्ड टीचरों और पढ़े-लिखे युवाओं ने बच्चों की पढ़ाई में मदद की है.

लेकिन चित्रा निलंबूर के मानना है कि आदिवासी बच्चों को कक्षाओं में वापस लाना एक मुश्किल काम होगा.

“शुरुआती दिनों में छात्रों की उपस्थिति कम होगी. आदिवासी प्रमोटरों और शिक्षकों ने कॉलोनियों का दौरा किया है और माता-पिता को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की है. लेकिन घने जंगलों में रहने वाले बच्चों को स्कूल वापस लाना एक चुनौती है. हाई स्कूल की कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे हॉस्टल लौट सकते हैं, लेकिन माता-पिता प्राथमिक कक्षा के छात्रों को छात्रावास भेजने के इच्छुक नहीं हैं,” उन्होंने कहा.

कार्यकर्ता यह भी मानते हैं कि इतनी कम उम्र में बच्चों को माता-पिता से दूर करना गलत है. यह उन्हें परिवारों से अलग कर देगा और अपनी भावनाओं को साझा करने वाला कोई नहीं होने से बच्चे अवसाद का शिकार होंगे.

प्री-मैट्रिक हॉस्टल के कर्मचारी ज्यादातर गैर-आदिवासी हैं और वे आदिवासी बच्चों की मनःस्थिति को नहीं समझ सकते. पिछले साल अकेले मलप्पुरम जिले में 15 से 19 वर्ष के आयु वर्ग के 10 छात्रों की आत्महत्या से मौत हो गई थी.

इस बीच, आदिवासी विभाग इडमलयार में अभी तक हॉस्टल नहीं खोल पाया है क्योंकि अरकप्पू कॉलोनी के 11 परिवार उसकी इमारत में रह रहे हैं. परिवारों ने पिछले साल भूस्खलन और जंगली जानवरों के डर से अपनी कॉलोनी छोड़ दी थी और उन्हें हॉस्टल में अस्थायी रूप से रहने की सुविधा दी गई थी. वे कुट्टमपुझा पंचायत के पंदपरा कॉलोनी में जमीन आवंटन की मांग कर रहे हैं.

हालांकि हॉस्टल खाली करने के लिए परिवारों को नोटिस दिया, लेकिन उन्होंने बाहर जाने से इनकार कर दिया. एडमलायर में सरकारी यूपीएस के छात्रों को छात्रावास प्रदान किया गया है. 40 छात्र हैं और हमने तलुकंदम और पोंगिनचुवडु कॉलोनियों के 29 छात्रों को परिवहन देने का फैसला लिया है.

इसके अलावा नाश्ता और दोपहर का भोजन भी इन बच्चों को दिया जाएगा कक्षाएं दोपहर 2 बजे तक चलेंगी, जिसके बाद उन्हें सुरक्षित रूप से घर छोड़ दिया जाएगा.

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