प्रतीकों की राजनीति और विकास के लिए इमानदार कोशिशों में फ़र्क है

आदिवासी अपनी धार्मिक पहचान की दावेदारी पेश कर रहा है. लेकिन सरकार इस मामले पर मौन साधे हुए हैं. कई आदिवासी संगठन अब इस मसले को राष्ट्रीय स्तर पर लाने की कोशिश में जुटे हैं.

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आज़ादी के 75 साल बाद भी भारत में अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) समुदाय पहचान के संकट से जूझ रहा है. बीजेपी सरकार ने रा रौपदी मुर्मू के रूप में भारत को अपना पहला आदिवासी राष्ट्रपति देने के “मास्टर स्ट्रोक” के बावजूद आदिवासी परेशान है. आदिवासी के मन में कई तरह के डर हैं. 

उन्हीं डरों में से एक है कि समुदाय की विशिष्ट धार्मिक पहचान को बड़े धार्मिक समूहों  के धर्म निगल जाऐंगे.  इस पृष्ठभूमि में एक आदिवासी संगठन ने केंद्र सरकार के लिए हिंदू धर्म से अलग एक अलग धर्म के रूप में पहचान देने के लिए 20 नवंबर की समय सीमा निर्धारित की है.

यह संगटन आदिवासी सेंगल अभियान (Adivasi Sengel Abhiyan) है और  ‘सरना’ को एक विशेष धर्म के रूप में मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार के समक्ष बार-बार याचिका दायर कर रहा है. आदिवासी सेंगल अभियान सबसे बड़े और सबसे प्रभावशाली जनजातीय संगठनों में से एक है. इसका प्रभाव ख़ासकर ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और असम,  पांच राज्यों में सबसे ज्यादा है.

अपनी मांग को आगे बढ़ाने के लिए आदिवासी सेंगल अभियान के संरक्षण में पांच राज्यों के आदिवासी प्रतिनिधियों ने मंगलवार (20 सितंबर) को भुवनेश्वर में शांतिपूर्ण धरना दिया. ऐसा ही एक प्रदर्शन 30 सितंबर को कोलकाता में होगा.

इस संगठन का कहना है कि अगर केंद्र 20 नवंबर तक इनकी मांगों को पूरा नहीं करता है,  वह अपना आंदोलन तेज़ करेगा.   इस आंदोलन की शुरुआत 30 नवंबर को रेल और सड़क जाम से होगी. यह घेराबंदी पांच राज्यों के कम से कम 50 ज़िलों में संचार को ठप्प कर सकती है, जहां इस संगठन की मजबूत उपस्थिति है.

सलखान मूर्मु

आदिवासी सेंगल अभियान के अध्यक्ष सलखान मुर्मू ने MBB से बातचीत में कहा, “हम बार-बार केंद्र से सरना को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देने का आग्रह कर रहे हैं क्योंकि हम आदिवासी ज्यादातर प्रकृति उपासक हैं और न ही हिंदू हैं, न ही मुस्लिम और ईसाई हैं. हमारी अपनी जीवन शैली, धार्मिक प्रथाएं, रीति-रिवाज और संस्कृति है.”

उन्होंने कहा, “हमें इस मान्यता से वंचित रखा गया है, इस तथ्य के बावजूद कि 2011 की जनगणना के अन्य धर्म कॉलम में लगभग 50 लाख आदिवासी लोगों ने अपने धर्म को सरना घोषित करके अपनी पसंद का खुलासा किया था.”

एक अलग धार्मिक संहिता और सरना श्रेणी की मान्यता की मांग का समर्थन करते हुए 11 नवंबर, 2020 को झारखंड विधानसभा ने  केंद्र से उचित कदम उठाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था.

हाल के हफ्तों में इस मांग को और अधिक राजनीतिक समर्थन मिला. अब क्यों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सही माना है और विधायी समाधान के साथ इस पर कार्रवाई करने का वादा किया है.

लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक आदिवासी समुदाय के सरना धर्म कोड के मांग पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. पहचान के संकट के अलावा देश की आदिवासी आबादी से जुड़े कुछ तथ्य हैं जिनसे पता चलता है कि केंद्र सरकार ने आदिवासियों के लिए कुछ ठोस काम करने की बजाए प्रतीकों की राजनीति (Politics of Symbolism) ही ज़्यादा की है. 

अनुसूचित जनजाति के खिलाफ़ अपराध

हाल के आंकड़ों से पता चला है कि अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अपराध भी लगातार बढ़ रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में अनुसूचित जनजाति के खिलाफ किए गए अपराधों की संख्या में 6 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है. 

आदिवासियों के खिलाफ 2020 में अपराध के 8 हज़ार 272 मामले दर्ज किए गए थे जो 2021 में बढ़कर 8 हज़ार 802 हो गए हैं. जबकि 2019 में यह संख्या 7 हज़ार 570 थी. इतना ही नहीं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की ज्यादातर कल्याणकारी योजनाओं का कार्यान्वयन रिकॉर्ड भी इस समुदाय के लिए निराशाजनक है.

संसदीय समिति की चिंताएं

 हाल ही में एक संसदीय कमेटी ने भी अनुसूचित जनजाति के लिए कल्याणकारी योजनाओं के खराब कवरेज के बारे में चिंता जताई थी. उदाहरण के लिए, प्री-मैट्रिक स्कॉलरशि स्कीम के संबंध में, सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में स्कीम के तहत लाभार्थियों की संख्या और निर्धारित लक्ष्यों में बहुत अधिक अंतर नहीं आया है.

2019-20 में 14.51 लाख छात्रों को स्कॉलरशिप मिली. वहीं 2020-21 में यह संख्या 14.46 लाख थी, जबकि अगले वित्त वर्ष में 12.7 लाख छात्र थे. संसदीय पैनल ने पिछले महीने प्रस्तुत एक रिपोर्ट में देखा, “इन आंकड़ों की जांच के बाद, संसदीय स्थायी समिति को लगता है कि या तो प्री-मैट्रिक कक्षाओं के तहत आदिवासी छात्रों की आबादी स्थिर बनी हुई है या मंत्रालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं कि योजना के तहत निर्धारित लक्ष्य आदिवासी आबादी के सही आंकड़ों पर आधारित है या नहीं ताकि सभी योग्य छात्रों को योजना का लाभ मिले.”

स्कॉलरशिप समय से नहीं मिल रही है

संसदीय स्थायी समिति ने आगे कहा कि जनजातीय मामलों का मंत्रालय सालाना 20 नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप देता है. यानी विदेश में हाई एजुकेशन के लिए अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए 17 और विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों (PVTG) के छात्रों के लिए तीन स्कॉलरशिप देता है.  

रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति इस बात से नाखुश है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान सिर्फ 45 छात्रों को स्कॉलरशिप से सम्मानित किया गया है और जाहिर तौर पर मंत्रालय द्वारा लाभार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए कोई कोशिश नहीं की गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जब समिति ने स्कॉलरशिप की मांगों की जांच की तो पाया कि  2021-22 में, 5 करोड़ की स्वीकृत राशि में से सिर्फ 2.46 करोड़ ही खर्च किए जा सके.

इसके अलावा, भारतीय विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में हाई एजुकेशन के लिए हर साल एसटी छात्रों को दी जाने वाली 750 राष्ट्रीय फेलोशिप के लिए, पैनल को यह जानकर हैरानी हुई कि 2020-21 और 2021-22 में बजटीय आवंटन/व्यय और लक्ष्य एक ही है.

आदर्श गांवों के मामले में आदिवासी इलाके पीछे

समिति ने पाया कि प्रधानमंत्री आदि आदर्श ग्राम योजना (PMAAGY) भी केंद्र प्रायोजित योजनाओं में से एक है, जिसका कवरेज आदिवासी इलाकों में संतोषजनक नहीं था. दरअसल यह योजना आदिवासी बहुल गांवों के ‘आदर्श गांवों’ के रूप में एकीकृत विकास के लिए है. संसदीय कमेटी यह जानकार हैरान थी कि इस सिलसिले में मंत्रालय साल 2020 – 21 और साल 2021-22 में बजट में आवंटित धन भी पूरा खर्च नहीं कर पाया. 

संसदीय समिति ने आगे कहा कि लगभग 1,17,000 आदिवासी गांव हैं जहां 25 फीसदी से अधिक या उसके बराबर जनजातीय आबादी है जहां विकास के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्नता मौजूद हैं.

समिति ने यह भी बताया कि अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड जैसे कई उत्तर-पूर्वी राज्य हैं जहां केंद्र सरकार द्वारा कोई फंड जारी नहीं किया गया था. इसी तरह, कुछ क्षेत्र हैं जैसे पेयजल, सिंचाई, वाटरशेड और सड़क संपर्क आदि, जहां पिछले वर्षों के दौरान खर्च बहुत कम हुआ था.

समिति ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में सूचित करने के लिए भी कहा “ताकि अगले पांच वर्षों के लिए निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके और योजना के लिए धन सही तरीके से खर्च किया जा सके.”

वेलफेयर फंड में कमी

आदिवासियों के विकास को केंद्र से उचित प्राथमिकता नहीं मिल रही है. यह बात इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा दिया गया अपेक्षित बजट वित्त मंत्रालय द्वारा बजट अनुमान में हमेशा कम किया जाता है जैसा कि संसदीय पैनल ने पाया है.

रिपोर्ट में कहा गया है, “वर्ष 2020-21 में, संशोधित अनुमान चरण में आवंटन को 7,355.76 करोड़ से घटाकर 5,472.50 कर दिया गया था और 2021-22 में इसे 7,484.07 करोड़ से घटाकर  6,126.46 करोड़ कर दिया गया था.”

समिति ने पाया कि शुरू में 7,355.76 करोड़ और 7,084.07 करोड़ का बजटीय आवंटन क्रमशः वर्ष 2020-21 और 2021-22 के लिए आदिवासी मामलों के मंत्रालय के लिए किया गया था, ताकि दो आधिकारिक कार्यक्रमों के अलावा उनके केंद्रीय क्षेत्र और केंद्र प्रायोजित योजनाओं को संचालित किया जा सके.

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि, संशोधित अनुमान (RE) चरण में आवंटन को घटाकर 2020-21 में 5,472.50 करोड़ और 2021-22 में 6,126.46 करोड़ कर दिया गया. हैरानी की बात है कि जनजातीय मामलों का मंत्रालय 2020-21 में पूरी तरह से आरई आवंटन भी खर्च नहीं कर सका. 15 फरवरी, 2022 तक 4,070.04 करोड़ खर्च किए.

इसके अलावा, 2022-23 के लिए बजटीय आवंटन वित्त मंत्रालय द्वारा काफी कम कर दिया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 13,208.52 करोड़ के प्रक्षेपण के खिलाफ, आदिवासी मामलों के मंत्रालय को सिर्फ 8,406.92 करोड़ दिए गए. जो बजट में लगभग 5 हज़ार करोड़की कमी है.

आदिवासी सेंगल अभियान के अध्यक्ष ने कहा कि संसदीय समिति का निष्कर्ष मौजूदा सत्ताधारी दल के द्वारा समुदाय की उपेक्षा को रेखांकित करता है. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि आवंटित धन को भी अक्सर डायवर्ट किया जा रहा है. और यह पता लगाने के लिए कोई “गुणवत्ता मूल्य मूल्यांकन” नहीं है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में लक्षित लाभार्थियों तक पहुंच रहा है या नहीं.

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