एक महीने में 40 मौतें, 24 मृत जन्म; आदिवासी बहुल मेलघाट के आंकड़ों पर बॉम्बे हाई कोर्ट की नाराज़गी, सरकार से मांगा जवाब

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया है कि पिछले कुछ सालों में उठाए गए विशेष क़दमों की वजह से शिशु मृत्यु दर में कमी आई है. हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि राज्य सरकार के आंकड़ों और ज़मीनी हक़ीक़त में बड़ा फ़र्क है.

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र सरकार को मेलघाट और राज्य के दूसरे आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण की वजह से हो रही बच्चों की मौतों को रोकने के लिए तुरंत उपाय करने का निर्देश दिया है.

कोर्ट का यह निर्देश तब आया जब सरकार ने कहा कि इन इलाक़ों में विशेषज्ञ डॉक्टरों को नियुक्त किया गया है, लेकिन इन डॉक्टरों ने वहां जाने से इंकार कर दिया है. इस वजह से आदिवासी इलाक़ों में उचित चिकित्सा सहायता नहीं मिल पा रही है.

अदालत ने चिंता जताते हुए कहा है कि यह मुद्दा राज्य सरकार के लिए ‘प्राथमिकता’ पर होना चाहिए. दरअसल, दायर की गई एक याचिका से पता चला है कि कोविड-19 महामारी के बीच पिछले महीने कुपोषण की स्थिति और ख़राब हुई, और 40 से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई है.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिछले महीने ही राज्य सरकार से महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल इलाक़ों में उचित स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करने को कहा था. लेकिन इसके बाद भी 40 बच्चों की मौत के अलावा 24 मृत जन्म (Stillbirth) भी दर्ज किए गए हैं.

चीफ़ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस कुलकर्णी की बेंच मेलघाट इलाक़े के बच्चों में कुपोषण पर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. डॉ राजेंद्र बर्मा और कार्यकर्ता बंदू संपतराव साने द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप है कि आदिवासियों की मुश्किलों को कम करने के लिए कोई ख़ास काम नहीं हो रहा है.

दावा: डायरिया और निमोनिया से दर्ज हुई मौतें कुपोषण की वजह से हुई हैं

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया है कि पिछले कुछ सालों में उठाए गए विशेष क़दमों की वजह से शिशु मृत्यु दर में कमी आई है. हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि राज्य सरकार के आंकड़ों और ज़मीनी हक़ीक़त में बड़ा फ़र्क है.

उनका दावा है कि पिछले दो सालों में, और ख़ासकर महामारी के दौरान, अधिकारियों ने डायरिया और निमोनिया से होने वाली मौतों की जो सूचना दी है वो दरअसल कुपोषण की वजह से हुई हैं.

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा है कि 45 आदिवासी गांव अभी भी दुर्गम हैं, और इसीलिए चिकित्सा और दूसरी ज़रूरी सुविधाओं से वंचित हैं.

एक दावा यह भी है कि केंद्र सरकार ने 2017 में ‘पोषण अभियान’ शुरू किया था, लेकिन राज्य सरकार ने आदिवासी इलाक़ों के लिए आवंटित लगभग 110 करोड़ रुपये में से 30 प्रतिशत से भी कम का इस्तेमाल किया है. इस बात की पुष्टि के लिए योजनाओं के तहत केंद्र से राज्य को मिली राशि के ऑडिट का ब्यौरा मांगा गया है.

कोर्ट ने मेलघाट में मरने वाले बच्चों के बढ़ते आंकड़ों पर चिंता जताई और इन योजनाओं की उपयोगिता पर सवाल करते हुए कहा कि क्या ये सिर्फ कागज़ी हैं.

अदालत ने यह भी नोट किया कि पुणे और नागपुर समेत दूसरे शहरी इलाक़ों में सिविल चिकित्सा अधिकारियों के पद लगभग भरे हुए हैं. जबकि गोंदिया और गढ़चिरौली ज़िलों में ऐसे आधे चिकित्सा पद खाली हैं.

सरकार का कहना है कि इन इलाक़ों के लिए की गई नियुकितियों में कई डॉक्टरों ने ड्यूटी पर रिपोर्ट नहीं किया है. सरकार के इस जवाब से तो यही लगता है कि वो आदिवासी इलाक़ों में चिकित्सा सुविधाओं को लेकर गभीर नहीं है, क्योंकि सरकार के लिए ऐसे डॉक्टरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना मुश्किल नहीं है.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कुपोषण की स्थिति पर नाराज़गी जताई है

कोर्ट ने भी सरकार से कहा है कि कार्रवाई न करना इन डॉक्टरों को ऐसा करते रहने के लिए प्रोत्साहन देने जैसा है. कोर्ट ने राज्य सरकार से दूसरे ज़िलों से चिकित्सा अधिकारियों को आदिवासी बहुल इलाक़ों में ट्रांस्फ़र करने के बारे में सोचने को कहा है. सरकार को अगले एक महीने का नियुक्तियों का प्लान देने के लिए कहा गया है.

हाई कोर्ट ने टिप्पणी की, “कोई दो राय नहीं है कि मौतें हो रही हैं. एक महीने में 40 मौतें और 24 मृत जन्म? क्या यह निराशाजनक नहीं है? आपका ध्यान बच्चों की मौतों को नियंत्रित करने पर होना चाहिए. इस जनहित याचिका को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. आपको उनकी (याचिकाकर्ता) भावनाओं को समझना होगा.”

अदालत ने यह भी सुझाव दिया है कि कुपोषण से ग्रस्त बच्चों के लिए उपयुक्त आहार तय करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों के अलावा डायटीशिटन और न्यूट्रीशनिस्ट नियुक्त किए जाएं. इसके अलावा राज्य सरकार से बच्चों की मौतों को रोकने के लिए आदिवासी इलाक़ों में हर परिवार की ज़रूरतों का पता लगाने के लिए फील्ड वर्कर या स्वयंसेवकों को नियुक्त करने के लिए भी कहा गया है.

मामले में अगली सुनवाई 20 सितंबर को होगी.

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