MP के सतना में 85 प्रतिशत आदिवासी छात्र 10वीं में फेल हुए

आदिवासी इलाक़ों में स्कूल ड्रॉप आउट एक बड़ी समस्या है. आमतौर देखा गया है कि कक्षा 10 एक बड़ा बैरियर है जहां पर आदिवासी बच्चों की पढ़ाई लिखाई बंद हो जाती है और स्कूल छूट जाता है. अगर बच्चा दसवीं कक्षा में फेल हो जाए तो यह तय माना जाता है कि अब उसके माँ बाप उसे और स्कूल नहीं भेजना चाहेंगे.

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मध्य प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ महीनों में आदिवासी कल्याण के लिए रिकॉर्ड तोड़ घोषणाएँ की हैं. आदिवासियों के उत्थान से जुड़ी घोषणाओं के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री के बड़े बड़े कार्यक्रम रखे गये. 

लेकिन आदिवासी कल्याण, उत्थान और विकास की हकीकत हाईस्कूल के परीक्षा परिणामों में सामने आ गई है. कोरोना काल के बाद हुई परीक्षा में हाईस्कूल के जो नतीजे सामने आए हैं उसमें सतना ज़िले के 85 फीसदी आदिवासी बच्चे फेल हो गए हैं. 

यह सतना जिले की स्थिति है लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी और आदिवासी बहुल ज़िले में परिणाम कोई बहुत अच्छे रहे हैं. इस परिणाम ने साबित कर दिया की कोरोना काल में स्कूल शिक्षा विभाग के डिजी लैप जैसे प्रयोग आदिवासी इलाक़ों में कोई असर नहीं छोड़ पाए.

कोरोना के दौरान आदिवासी छात्रों की पढ़ाई रही ठप्प

कोरोना के समय में जब स्कूल बंद कर दिए गये थे उस समय विद्यार्थियों की शिक्षा को जारी रखना बड़ी चुनौती था.  इस बीच स्कूल शिक्षा विभाग ने डिजिटल एजुकेशन का विकल्प चुना. 

इसके लिए डिजीलैप जैसे कार्यक्रम शुरू हुए,  जिसमें मोबाइल के माध्यम से पढ़ाई का दौर शुरू हुआ. हालांकि कोरोना की परिस्थितियों में यही इकलौता विकल्प था जिसके जरिये विद्यार्थियों को सुरक्षित तरीके से पढ़ाई से जोड़े रखा जा सकता था. 

लेकिन अब जब नतीजे सामने आए तो यह साबित हो गया कि यह विकल्प शहरी वर्गों तक ही कुछ हद तक सफल रहा. लेकिन गरीब वर्ग और आदिवासियों तक इस प्रोग्राम की पहुंच नहीं हो सकी.

रिज़ल्ट निराश करता है

हाईस्कूल के जिले के परीक्षा परिणामों पर अगर गौर करें तो आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) वर्ग के 84.62 फीसदी बच्चे फेल हो गये. सिर्फ 15.38 फीसदी बच्चे ही पास होने में सफल रहे. ये आंकडे बता रहे हैं कि इन विद्यार्थियों के पास डिजिटल शिक्षा का कोई साधन नहीं था. 

आदिवासी विकास के लिए चलने वाला आदिम जाति कल्याण विभाग भी इस दिशा में कोई पहल नहीं कर सका. कुल मिलाकर अगर कहें तो कोरोना काल में आदिवासियों के लिए सभी रास्ते बंद हो चुके थे जिसमें शिक्षा की हालत सबसे खराब थी जिसे रिजल्ट ने साबित कर दिया.

जिले में कक्षा दसवीं में दाखिला लेने वाले आदिवासी (एसटी) वर्ग के छात्रों की कुल संख्या 2687 रही है. इसमें भी 159 विद्यार्थी परीक्षा ही नहीं दे सके. 

सिर्फ 2528 विद्यार्थी परीक्षा में शामिल हुए. इसमें से 1895 विद्यार्थी फेल हो गए, सिर्फ 389 एसटी विद्यार्थी परीक्षा पास करने में सफल रहे. 

ज्यादतर बच्चे ड्रापआउट हो सकते हैं

आदिवासी इलाक़ों में स्कूल ड्रॉप आउट एक बड़ी समस्या है. आमतौर देखा गया है कि कक्षा 10 एक बड़ा बैरियर है जहां पर आदिवासी बच्चों की पढ़ाई लिखाई बंद हो जाती है और स्कूल छूट जाता है. अगर बच्चा दसवीं कक्षा में फेल हो जाए तो यह तय माना जाता है कि अब उसके माँ बाप उसे और स्कूल नहीं भेजना चाहेंगे.

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कोरोना का दौर भयावह था. इस दौरान देश भर में स्कूली शिक्षा का बुरा हाल रहा. लेकिन यह भी अफ़सोसनाक है कि जितने विकल्प शहर, क़स्बों या कुछ हद तक गाँवों के छात्रों को भी मिले, आदिवासी छात्रों को वो विकल्प भी नहीं मिले. 

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