त्रिपुरा में आदिवासी वोट की लड़ाई और सिर उठाते चरमपंथी संगठन

अगले साल त्रिपुरा में विधान सभा चुनाव भी होंगे. इस संदर्भ में राजनीतिक दलों का मानना है कि लगभग ख़त्म हो चुके आतंकवादी संगठन पैसे वसूली के लिए राजनीतिक दलों से मोल-भाव करने की कोशिश कर सकते हैं. 

0
44

त्रिपुरा में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी और टिपरा मोथा (TIPRA MOTHA) को राज्य में चरमपंथी गतिविधियाँ बढ़ने की आशंका है. दरअसल 19 अगस्त को बांग्लादेश बॉर्डर के नज़दीक गश्त लगा रही बीएसएफ़ (BSF) की टुकड़ी पर गोलीबारी की गई थी.

इस गोलीबारी में 53 साल के हवलदार गिरिश कुमार यादव की मौत हो गई थी. पुलिस अधिकारियों का अनुमान है कि इस हमले में नेशनल लिबरेशन फ़्रंट ऑफ त्रिपुरा (National Liberation Front of Tripura) है. इस आतंकवादी संगठन (Terrorist Group) को त्रिपुरा में समाप्त प्राय माना जाता है. 

यह घटना मिजोरम और त्रिपुरा की अंतर्राज्यीय सीमाओं से लगती बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास हुई थी. इस इलाक़े को  दमचेरा (Damcherra) के नाम से जाना जाता है. पुलिस का कहना है कि त्रिपुरा में अब इस संगठन की कोई मौजूदगी या गतिविधि नहीं है. 

लेकिन बांग्लादेश में इसके कुछ ठिकाने ज़रूर हैं. पुलिस अधिकारियों के हवाले से यह बताया जा रहा है कि यह हमला पैसा वसूलने की मंशा से भी हो सकता है. पुलिस का मानना है कि फ़िलहाल इस संगठन के पास ना तो पैसा है और ना ही ज़्यादा लोग इस संगठन के सदस्य बचे हैं. 

इसलिए इस हमले से यह संगठन अपने कैडर को प्रोत्साहित करने का प्रयास भी कर रहा होगा. 

चुनाव से जुड़ा है हमला

इस हमले के बारे में राजनीतिक दलों और पुलिस अधिकारियों में एक बात पर सहमति है कि यह हमला चुनाव से जुड़ा है. नवंबर महीने में राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में विलेज काउंसिल के चुनाव (Village council elections) होंगे. 

अगले साल त्रिपुरा में विधान सभा चुनाव भी होंगे. इस संदर्भ में राजनीतिक दलों का मानना है कि लगभग ख़त्म हो चुके आतंकवादी संगठन पैसे वसूली के लिए राजनीतिक दलों से मोल-भाव करने की कोशिश कर सकते हैं. 

त्रिपुरा ने पृथकतावादी हिंसा का एक लंबा दौर देखा है. राज्य में इसी वजह से स्पेशल पॉवर एक्ट भी लागू था जो सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार देता  है. इस हमले के बाद राजनीतिक दलों में भी बयानबाज़ी का दौर देखा गया है.

सीपीएम के राज्य सचिव और जाने माने आदिवासी नेता जितेन्द्र चौधरी ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि जितने भी असामाजिक संगठन हैं बीजेपी का उनके साथ पर्दे के पीछे गठबंधन है. उन्होंने कहा है कि जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आ रहा है एनएलएफटी (NLFT) सत्ताधारी दल के साथ सौदेबाज़ी का दबाव बढ़ा रहा है. 

उधर बीजेपी ने सीपीएम पर आरोप लगाते हुए जवाब दिया है कि जब सीपीएम सत्ता में थी तो उस समय त्रिपुरा में आतंकवाद चरम पर था. बीजेपी के प्रवक्ता नोबेंदु ने MBB से बात करते हुए कहा, “त्रिपुरा में हिंसा की घटना नई नहीं हैं. जिस दिन से यहाँ पर सीपीएम ने राजनीति शुरू की थी उस दिन से यहाँ पर हिंसा शुरू हो गई थी.”

वो कहते हैं, “चरमपंथी संगठनों की कोई विचारधारा नहीं है, वे बेशक आदिवासियों के विकास और कल्याण की बात करते हैं. लेकिन सच्चाई ये है कि उन्हें विकास से कोई मतलब नहीं है.”

बीजेपी नेता ने कहा कि दरअसल कम्युनिस्ट पार्टी के ज़माने में इन संगठनों को पाल कर रखा गया था. लेकिन अब इन संगठनों का कोई वजूद नहीं बचा है. उनके अनुसार राज्य में चुनाव को देखते हुए कुछ संगठन जो मृत प्राय हैं, हथियार और पैसे के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश कर सकते हैं.

आदिवासी वोट बैंक महत्वपूर्ण है

2018 में बीजेपी ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को हरा कर त्रिपुरा में सरकार बनाई थी. बीजेपी ने सत्ता में पहुँचने के लिए आदिवासी संगठन आईपीएफटी (Indigenous People’s Front of Tripura) के साथ गठबंधन किया था. लेकिन अब आईपीएफटी के सभी बड़े नेता आदिवासियों के नए संगठन टिपरा मोथा में शामिल हो चुके हैं.

त्रिपुरा में पिछले साल (2021) अप्रैल महीने हुए त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (Tripura Tribal Areas Autonomous District Council (TTAADC)) के चुनाव में 28 में से 18 सीटें जीत ली थीं. 

त्रिपुरा में कुल 60 विधान सभा सीट हैं और इनमें से 20 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा 15 अन्य विधान सभा सीटों पर आदिवासी मतदाता का प्रभाव माना जाता है. इसलिए त्रिपुरा में आदिवासी मतदाता का झुकाव किस दल की तरफ़ है, उससे ही सत्ता बदलने या बने रहने के संकेत मिलते हैं. 

बीजेपी नेता नोबेंदु का कहना है कि उतर पूर्वी भारत के राज्यों में ट्राइबल वोट बैंक कभी भी एकजुट नहीं रहता है. उनके संगठन चाहे वो सामाजिक, राजनीतिक या फिर चरमपंथी संगठन रहे हों, उनके अलग अलग टुकड़े होते रहे हैं. उनमें से ज़्यादातर संगठन पैसे के लिए बने हैं और उनकी कोई विचार धारा नहीं है.

उन्होंने कहा कि जो संगठन ग्रेटर टिपरा लैंड की माँग कर रहे हैं, वो सपनों की दुनिया में जी रहे हैं. आज की तारीख़ में अलग टिपरालैंड की माँग को पूरा करना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा. इस माँग के नाम पर आदिवासियों को गुमराह किया जा रहा है.

आदिवासी इलाक़ों में आतंकवाद की जगह नहीं – टिपरा मोथा

MBB से बातचीत में टिपरा मोथा के नेता प्रद्युत देबबर्मन ने हिंसा की इस घटना की निंदा की है. उन्होंने कहा, “यह अफ़सोस की बात है कि जब भी राज्य में आतंकवाद या हिंसा की कोई घटना होती है तो सवाल आदिवासियों से ही पूछे जाते हैं. ऐसे दिखाया जाता है जैसे पूरा आदिवासी समुदाय अंडरग्राउंड है. “

पिछले महीने हुई घटना जिसमें एक बीएसएफ़ के हवलदार को चार गोली लगी थी, उसकी शुक्रवार को मौत हो गई. इस घटना के बाद की चर्चा पर बोलते हुए प्रद्युत देबबर्मन का कहना था कि आदिवासी इलाक़ों में आतंकवादी संगठनों के लिए कोई जगह नहीं है.

आदिवासी अब लोकतांत्रिक तरीक़ों से अपने अधिकार हासिल करने में विश्वास रखते हैं. इसलिए वो हमारे साथ जुड़े हुए हैं. MBB से बातचीत के दौरान टिपरा मोथा के नेता काफ़ी दुखी और चिंतित नज़र आए.

उन्होंने कहा कि जिस तरह से अल्पसंख्यक लोगों को पाकिस्तानी कह दिया जाता है, वैसे ही आदिवासियों को चरमपंथी या आतंकवादी कहा जाता है. अपनी बात कहते हुए उन्होंने कहा कि त्रिपुरा में राजनीति में सीपीएम या बीजेपी में फ़र्क़ करने का कोई मतलब नहीं है.

वे कहते हैं कि त्रिपुरा में राजनीति आदिवासी और बंगाली में बंटी है. प्रद्युत देबबर्मन कहते हैं, “इस तरह की घटनाओं से चुनाव में आदिवासी प्रभावित नहीं होगा. आदिवासी इलाक़ों में मुद्दा एक ही होगा कि किसी दल की आदिवासी इलाक़ों के लिए क्या नीति रहेगी.”

वो कहते हैं कि आदिवासी एक स्थायी और संवैधानिक समाधान चाहते हैं. आदिवासी अब हिंसा में विश्वास नहीं करता है. इसलिए यह ज़रूरी है कि आदिवासी इलाक़ों के लिए नीतियाँ सामने आएँ.

उनका दावा है कि त्रिपुरा के आदिवासी इलाक़ों में अब आतंकवादी संगठनों में भर्ती संभव नहीं है. अब आदिवासी लोकतांत्रिक तरीक़े से टिपरा मोथा के साथ रह कर अपनी लड़ाई लड़ रहा है. इसलिए इस बात की आशंका नहीं होनी चाहिए कि यहाँ पर फिर से आतंकवाद सिर उठा सकता है.

टिपरा मोथा के नेता का दावा है कि आदिवासी अब किसी चरमपंथी संगठन पर भरोसा नहीं करेंगे. अब वो एक ऐसे नेता पर विश्वास करते हैं जो लोकतांत्रिक तरीक़े से उनके अधिकारों के लिए लड़ सकता है. अब उनके लिए आर्थिक तरक़्क़ी, उनकी पहचान की तरह ही महत्वपूर्ण है.

त्रिपुरा ने आतंकवाद के दौर में काफ़ी कुछ गँवाया है और सालों के प्रयासों के बाद राज्य हिंसा मुक्त हो सका है. सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकार मानते हैं कि अगर सत्ता संघर्ष में चरमपंथी संगठन आदिवासी इलाक़ों में फिर से पैर ज़माने की कोशिश कर सकते हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here