आख़िर जनजाति की परिभाषा क्या है

किसी समुदाय को जनजाति की सांस्कृतिक, आर्थिक और भौगोलिक स्थिति के बारे में विस्तृत शोध उपलब्ध होना पहली शर्त मानी जाती है. आमतौर पर यह शोध करने की ज़िम्मेदारी ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट की होती है. इस शोध के आधार पर राज्य सरकार किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की सिफारिश केंद्र सरकार से कर सकती है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में गोंड, कुरुबा, हाटी जैसी जातियों को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है. कैबिनेट ने छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में कई जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.

देश के पांच राज्यों की 15 जातियों को केंद्र की मोदी सरकार ने अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की मंजूरी दी है. इसी के साथ देश में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 705 से बढ़कर 720 हो गई है.

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर के ट्रांस-गिरी क्षेत्र में बसे हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है. हिमाचल की तरह छत्तीसगढ़ में भारिया-धनगढ़ जैसे 12 समुदाय और तमिलनाडु की पहाड़ियों में रहने वाले वंचित समुदायों में से एक नारिकुरावन जाति को भी अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने की मांग को मंजूरी दी गई.

ऐसे ही कर्नाटक की बेट्टा-कुरुबा जैसी अतिपिछड़ी जाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मंजूरी दी है. उत्तर प्रदेश के 13 जिलों में गोंड जाति की 5 उपजातियों- धुरिया, नायक, ओझा, पठारी और राजगोंड को भी अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया. अब कैबिनेट का यह प्रस्ताव संसद में लाया जाएगा.

सरकार की तरफ से संसद में अलग अलग समुदायों को जनजाति की सूचि में शामिल करने के लिए प्रस्ताव लाती रहती है. इस बारे में कई बार विपक्ष ने आपत्ति भी दर्ज की है. विपक्षका कहना है कि सरकार को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के इस सिलसिले में लंबित सभी प्रस्तावों पर विचार करने के बाद एक प्रस्ताव संसद में पेश करना चाहिए.

जनजाति की सूची में शामिल किए जाने की क्या शर्ते होती हैं

आमतौर पर जिन समुदायों को आदिवासी के नाम से जाना जाता है उन्हें कानूनी भाषा में जनजाति कहा जाता है. किसी समुदाय को जनजाति की सूचि में शामिल करने का संविधान में कोई निश्चित मापदंड तय नहीं किया गया है. लेकिन 1965 में इस मसले पर लोकुर समिति का गठन अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के लिए किया गया था.

इस समिति ने इस बारे में कुछ मानदंड सुझाए थे जिनके आधार पर किसी समुदाय को जनजाति का दर्जा देना का फैसला किया जा सकता है. लोकुर समिति ने किसी आदिवासी समुदाय को जनजाति में शामिल किये जाने के लिए पहचान के पांच मानदंड सुझाए थे – आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और पिछड़ापन.

आदिम लक्षण – अगर कोई समुदाय खेती किसानी में माहिर नहीं है या फिर खेती के लिए अभी भी पुरातन तकनीकि और औज़ार इस्तेमाल करता है. इसके अलावा वह समुदाय अगर अभी भी भोजन जुटाने के लिए जंगल पर निर्भर रहता है तो इसे आदिम लक्षण माना जाता है.

विशिष्ट संस्कृति – अगर किसी समुदाय को जनजाति की सूची में शामिल करना है तो यह देखना होगा कि क्या उस समूह या समुदाय की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है. मसलन उसके रीति रिवाज, धार्मिक सामाजिक आस्थाएं, उसके पर्व त्यौहार और गीत संगीत की अपनी एक ख़ास पहचान होनी चाहिए. इसके अलावा उनकी अपनी भाषा होती है. ज़्यादातर जनजाति समुदायों की भाषा की स्क्रिप्ट नहीं है लेकिन इन समुदायों में उसका इतिहास और ज्ञान मौखिक तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है.

भौगोलिक अलगाव – जब किसी समुदाय को जनजाति का दर्जा देने पर विचार किया जाता है तो उसकी भौगोलिक स्थिति पर भी ध्यान दिया जाता है. आमतौर पर जिन समुदायों को जनजाति की सूची में शामिल किया जाता है वो पहाड़ और जंगल के इलाकों में रहते हैं. दुर्गम इलाकों में रहने की वजह से ये समुदाय आधुनिक दुनिया की बहुत सी सुविधाओं से वंचित रहते हैं.

मुख्यधारा के साथ संपर्क में संकोच – आदिवासी समुदायों में यह देखा जाता है कि आमतौर पर उसके लोग मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज के लोगों से मिलने और बात करने में संकोच बरतते हैं. बल्कि काफी हद तक वो मुख्यधारा के समाज से एक दूरी बना कर रखते हैं. लोकुर समिति ने किसी समुदाय में इस तरह के रैवये को भी जनजाति का दर्जा देने के मापदंडों में से एक के तौर पर सुझाया था.

पिछड़ापन – उपर बताए गए चार मापदंड अगर किसी समुदाय में मिलते हैं तो ज़ाहिर है कि उस समुदाय में आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ापन होगा. क्योंकि उनके उत्पादन के साधन पुरातन हैं और वे आधुनिक तकनीक या सुविधाओं से वंचित हैं.

किसी समुदाय को जनजाति घोषित करने का प्रोसेस क्या है

ब्रिटिश हुकुमत के दौरान आदिवासी समुदायों को ट्राइब्स के नाम से पहचाना गया था. आज़ादी के बाद जब देश का संविधान लागू हुआ तो इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति कहा गया.

संविधान की धारा 342 (Article 342) में किसी समुदाय को जनजाति की सूची में शामिल करने का प्रावधान किया गया है.

फिलहाल किसी समुदाय को जनजाति की सांस्कृतिक, आर्थिक और भौगोलिक स्थिति के बारे में विस्तृत शोध उपलब्ध होना पहली शर्त मानी जाती है. आमतौर पर यह शोध करने की ज़िम्मेदारी ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट की होती है. इस शोध के आधार पर राज्य सरकार किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की सिफारिश केंद्र सरकार से कर सकती है.

केन्द्र सरकार इस तरह के प्रस्ताव पर विचार करने से पहले इसे अनुसूचित जनजाति आयोग और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया को भेजती है. इन दोनों ही संस्थानों से अगर किसी समुदाय को जनजाति में शामिल करने की सिफ़ारिश मिलती है तो फिर यह प्रस्ताव कैबिनेट में लाया जाता है. कैबिनेट से मंजूरी के बाद सरकार इस प्रस्ताव को संसद में लाती है.

संसद से प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति किसी समुदाय का नाम अनुसूचित जनजाति की सूचि में शामिल करने का आदेश करते हैं.

जनजाति को परिभाषित करना क्यों ज़रूरी है

जैसा उपर बताया गया है कि संविधान में जनजाति की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है. इस मसले पर समाजशास्त्रियों, और सोशल एंथ्रोपोलॉजिस्ट के बीच बहस रही है.

लेकिन भारत का संविधान एक बात बिलकुल स्पष्ट कहता है कि देश के जनजाति समुदायों को विशेष अधिकार और सुरक्षा दिए जाने की ज़रूरत है. इसलिए अगर परिभाषा तय ना हो पाने से कुछ आदिवासी समुदाय जनजाति की सूची से बाहर रहते हैं तो यह उनके विकास और वजूद के लिए घातक हो सकता है.

इस सिलसिले में कई कमीशन और कमेटियों का गठन हुआ है. लेकिन अभी भी यह मसला सुलझा नहीं है. यह देखा गया है कि कोई भी सरकार टुकड़ों में कुछ समुदायों को जनजाति घोषित करने के प्रस्ताव संसद में लाती रहती है.

कई मामलों में तो यह भी देखा गया है कि किसी समुदायों के नाम की स्पेलिंग या उच्चारण की वजह से कोई समुदाय अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर रह गया है.

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