विश्व आदिवासी दिवस विशेष: संथालकाटा पोखर, एक शहीद स्थल जो उपेक्षित है

1855 के संताल विद्रोह के दौरान जब बड़ी संख्या में संताल विद्रोही अंग्रेज अधिकारियों के सामने प्रदर्शन करने के लिए कोलकाता जा रहे थे,  तब उन्हें इसी दिगुली गांव के पास मयूराक्षी नदी के किनारे अंग्रेजों ने रोक दिया था और उनका सामूहिक नरसंहार किया गया था. मारे गए विद्रोहियों को इसी तालाब या पोखर में डाल दिया गया था, इसलिए इसका नाम बाद में संथाल काटा पोखर पड़ा. 

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यह प्रमाणित तथ्य है कि 1857 की क्रांति से पहले 1855 में पूर्वी भारत के संताल परगना क्षेत्र में संताल आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ पहला संगठित विद्रोह किया था. इस विद्रोह का नेतृत्व सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू नाम के दो संताल भाइयों ने किया था. 

स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान के सम्मान में उनका गांव भोगनाडीह और पचकठिया को एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है. क्योंकि यहाँ पर इन दोनों ही स्वतंत्रता सेनानियों को फाँसी दी गई थी.  ये दोनों जगहें झारखंड के साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड क्षेत्र में पड़ती हैं.

लेकिन स्वतंत्रता के इस पहले संगठित विद्रोह का से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण स्थान है जिसे संथाल काटा पोखरकहा जाता है. इस स्थान के बारे में ज़्यादा लोगों को जानकारी नहीं है. 

संथाल काटा पोखर दुमका जिले के रानीश्वर प्रखंड क्षेत्र में पड़ने वाला बंगाल की सीमा से लगे आखिरी गांव दिगुली में पड़ता है. वहां से महज 400 मीटर की दूरी से पश्चिम बंगाल का बीरभूम जिला आरंभ हो जाता है.

स्थानीय पत्रकार और बांग्ला भाषा व संस्कृति रक्षा समिति, झारखंड के राज्य सचिव गौतम चटर्जी कहते हैं, “1855 के संताल विद्रोह के दौरान जब बड़ी संख्या में संताल विद्रोही अंग्रेज अधिकारियों के सामने प्रदर्शन करने के लिए कोलकाता जा रहे थे,  तब उन्हें इसी दिगुली गांव के पास मयूराक्षी नदी के किनारे अंग्रेजों ने रोक दिया था और उनका सामूहिक नरसंहार किया गया था”. उनका कहना है कि मारे गए विद्रोहियों को इसी तालाब या पोखर में डाल दिया गया था, इसलिए इसका नाम बाद में संथाल काटा पोखर पड़ा. 

गौतम चटर्जी

दशकों तक यह जगह अज्ञात रही. इसका न उल्लेखनीय दस्तावेजीकरण हुआ और न यह मुख्य धारा की मीडिया में यह चर्चा में आया. हालांकि अब यह सरकार और मीडिया के द्वारा नोटिस किया जा रहा है. 

पिछले साल स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में दुमका जिला प्रशासन व पर्यटन विभाग की ओर से पुलिस लाईन मैदान के परेड में संथाल काटा पोखर की झांकी निकाली गयी.

झारखंड सरकार के पथ निर्माण विभाग के द्वारा संथाल काटा पोखर के पास एक बोर्ड लगवाया गया है. इस बोर्ड में संथाल काटा पोखर को 1855 के संथाल हूल का ऐतिहासिक गवाह बताया गया है. 

इसमें लिखा है – सन 1855 के संथाल हूल के क्रांतिकारियों के कोलकाता जाने के रास्ते में वर्तमान दुमका जिले के मयूराक्षी नदी के तट आमजोड़ा घाट के दक्षिण भाग के दिगुली ग्राम में अंग्रेज सैनिकों ने संताल विद्रोहियों का सामूहिक नरसंहार किया था. इसके बाद उनके क्षत-विक्षत शरीर को इसी तालाब में डूबा दिया गया था. इस वजह से इस तालाब का नाम संथाल काटा पोखर पड़ा.

दिगुली गांव के निवासी 57 वर्षीय सुखदेव साहा ने इस संवाददाता से कहा, “1855 में अंग्रेज व संताल में लड़ाई हुई थी, तब संताल विद्रोही यहां शहीद हो गए थे। पहले यहां कोई नहीं आता था. लेकिन हाल में यहां बोर्ड लगवाया गया है”. 

वहीं इसी गांव के 43 वर्षीय बलाई माल कहते हैं कि इस स्थल को संरक्षित किया जाना आवश्यक है. यहां संताल विद्रोही शहीद हुए थे.

गौतम चटर्जी कहते हैं, “बांग्ला भाषा व संस्कृति रक्षा समिति, झारखंड दुर्गा पूजा के अवसर पर वर्ष 2000 से एक पत्रिका झारखंड बंग भाषी जागरण का प्रकाशन करता आ रहा है. साल 2000 में ही इस पत्रिका में संथाल काटा पोखर पर एक छोटा आलेख छपा था”. इस आलेख को इस पत्रिका के संपादक श्रीदाम बंद्योपाध्याय ने लिखा था, जो अब जीवित नहीं हैं. यह पत्रिका का पहला अंक था. 

गौतम चटर्जी  कहते हैं, “सिउड़ी में एक सिदो-कान्हू ग्रंथागार नाम से एक संताल लाइब्रेरी है, वहां भी इससे संबंधित दस्तावेज मिले. यहां तक कि गैजेट सेटलमेंट रिकार्ड में भी इसका नाम संताल काटा पोखर के रूप में दर्ज है”. वे कहते हैं कि हम लोग इसको लेकर सालों काम करते रहे जिसके बाद अब इसे पहचाना जा रहा है.

यहाँ सिदो-कान्हु को फाँसी दी गई थी

चटर्जी तर्क देते हैं, “संताल विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने अगले ही साल 1856 में संताल परगना नाम से एक अलग जिला बनाया, जिसमें वर्तमान का पूरा संताल परगना क्षेत्र आता था. दूसरा जिस मार्ग पर संताल काटा पोखर स्थित है, वह बहुत पुराना है और सामरिक दृष्टिकोण से अंग्रेजी शासन में इसका महत्व था”.

वे कहते हैं कि पहले इस रोड को वर्द्धमान-भागलपुर रोड कहा जाता था और यह कोलकाता से पटना तक को जोड़ता था. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय बैरकपुर (कोलकाता) से दानापुर (पटना) रसद व अन्य सामग्री इसी मार्ग से भेजा जाता था.

गौतम चटर्जी कहते हैं, “अंग्रेजों ने संताल परगना क्षेत्र में एक अस्पताल तक नहीं बनाया, लेकिन दुमका के शिव पहाड़ में घोड़ों का अस्पताल बनवाया ताकि उनके घोड़े स्वस्थ रहें और उनके आवागमन व शासन में सुविधा हो”.

वे कहते हैं जब ईश्वर चंद्र विद्यासागर इस इलाके में आए तो उन्होंने आदिवासियों के इलाज की शुरुआत की. इस दौरान आदिवासियों के कई गांव प्लेग आदि बीमारियों से उजड़ गए.

संथाला काटा पोखर के संरक्षण के लिए संथाल काटा पोखर स्मृति रक्षा समिति का गठन किया गया है. यह समिति 20 सालों से इस तालाब को हैरिटेज घोषित करवाने के लिए प्रयासरत है.

संथाल काटा पोखर स्मृति रक्षा समिति के कोषाध्यक्ष बाबूलाल मोदी कहते हैं, संताल विद्रोह में दूसरी जातियों का भी समर्थन था. उस विद्रोह में लोहार, केवट, भुइयां आदि भी शामिल थे. 

जब विद्रोही कोलकाता की ओर जा रहे थे, तो पहले उन्हें मयूराक्षी नदी के पास रोका गया और गोलीबारी की गयी. उसके बावजूद वहां से कुछ विद्रोही आगे बढ गए, जिनकी संथाल काटा पोखर के पास हत्या की गयी. उन्हें उस पोखर में फेक दिया गया. इसके बाद स्थानीय लोगों ने उसे संथाल काटा पोखर नाम से पुकारना शुरू कर दिया.

आदिम जनजाति पहाड़िया वर्ग से आने वाले रामजीवन पहाड़िया कहते हैं, अंग्रेजों का शोषण और दमन लगातार बढता गया, तब सिदो-कान्हू के नेतृत्व में संताल हूल हुआ. वे कहते हैं कि इस विद्रोह में समाज के सभी वर्ग का योगदान था. 

जब विद्रोही सिउड़ी, बीरभूम में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दमन के खिलाफ प्रदर्शन के लिए जा रहे थे तो मयूराक्षी नदी पार करने से अंग्रेजों ने विद्रोहियों को रोकना चाहा. जब विद्रोही नहीं रूके तो दिगुली गांव में उनका सामूहिक नरसंहार किया गया और जिस तालाब में उनके शव को डाला गया उसे संताल काटा पोखर कहते हैं.

रामजीवन पहाड़िया कहते हैं, “1855 के जन विद्रोह के दौरान कैप्टन वाल्टर शेरविल इस क्षेत्र में काफी सक्रिय थे. कैप्टन शेरविल से कहलगांव (भागलपुर) से 18 विद्रोही को गिरफ्तार किया था, उसमें आठ पहाड़िया समुदाय से थे”. 

वे कहते हैं, “1983 में तारापद राय द्वारा संपादित रचना संताल रेबेलियन डाक्यूमेंट कलकत्ता 1983 में 1855 के विद्रोह के संबंध में अनेकों मौलिक दस्तावेजों का उल्लेख है”।

हालांकि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम पर अभी शोध और अध्ययन की जरूरत है, ताकि वे और अधिक प्रमाणिक, व्यवस्थित हो सकें और पूरा देश उसके बारे में जाने.

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