निशा ने शराब बनाना क्यों छोड़ दिया है ?

जब हमने उनसे पूछा कि वो आदिवासी लड़कों से क्या कहना चाहेंगी, तो उनका जवाब था कि यही के शराब ज़्यादा ना पीएं. लेकिन जब हमने उनसे पूछा कि उन औरतों से क्या कहना चाहेंगी जो शराब बनाती हैं. उनका जवाब अलग था जिसमें एक समझदारी नज़र आती है.

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महाराष्ट्र के पालघर ज़िले की डहाणू तहसील के वाकी में शुक्री अपने घर पर शराब बना रही थीं. उन्होंने बताया कि उनके यहाँ गुड़ से शराब बनाई जाती है. इसके लिए कम से कम 3 दिन पहले गुड़ को नौसादर के साथ मिलाकर भिगो कर रख दिया जाता है.

गुड़ से बनी यह शराब प्योर अल्कोहल होता है. शुक्री ने हमें दिखाया कि इस शराब की कुछ बूँदें आग में डाल दी जाए तो आग भड़क उठती है. वो कहती हैं कि किसी भी हालत में इसे पानी मिलाए बिना नहीं पिया जाना चाहिए. 

शुक्री अपने घर के एक हिस्से में लोगों को शराब पिलाती हैं. यही उसके परिवार को पालने का मुख्य ज़रिया है. 

हम वाकी गाँव में कई परिवारों से मिले. इस दौरान पता चला कि शराब की लत यहाँ जवान लड़कों की जान की दुश्मन बन गई है. हमें बताया गया कि इस गाँव में कई परिवारों में जवान लड़कों की मौत हो चुकी है. 

इनमें से एक परिवार से हम मिलने पहुँचे. इस परिवार को फ़िलहाल निशा चलाती हैं. निशा संजय वसन बाबर एक दृढ़ निश्चय वाली लड़की है. संजय वसन बाबर उनके पति का नाम था, जी हाँ नाम था, अब संजय इस दुनिया में नहीं है. 

उसकी मौत के कारणों में एक कच्ची शराब का नशा भी था. निशा को देख कर ही अंदाज़ा होता है कि उसकी उम्र कम ही है. लेकिन मजबूत इरादों वाली निशा ने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी ले ली है. उसके सास-ससुर भी कुछ हाथ ज़रूर बँटाने की कोशिश करते हैं. 

निशा अपने लड़कों को शराब से दूर ही रखना चाहती हैं

घर के बाहर वाले कमरे को एक छोटी से दुकान में तब्दील कर दिया गया है. निशा के घर में एक बड़ा बर्तन धूल खा रहा है, एक ज़माने में इसी बर्तन में निशा शराब बनाती थी. लेकिन संजय के जाने के बाद उसने क़सम खा ली की जो हो जाए, वो घर चलाने के लिए शराब नहीं बनाएगी, उसने फ़ैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया है. 

निशा को मुश्किल से महीने के 6 हज़ार रूपये मिलते हैं. ज़ाहिर है कि इन पैसों में परिवार चलाना आसान तो नहीं होता होगा. लेकिन निशा कहती है कि अब शराब नहीं बनाएगी. उनसे बातचीत में वो कहती हैं कि आदिवासी समाज को शराब और नशे से हो रही बर्बादी पर सोचना चाहिए.

जब हमने उनसे पूछा कि वो आदिवासी लड़कों से क्या कहना चाहेंगी, तो उनका जवाब था कि यही के शराब ज़्यादा ना पीएं. लेकिन जब हमने उनसे पूछा कि उन औरतों से क्या कहना चाहेंगी जो शराब बनाती हैं. उनका जवाब अलग था जिसमें एक समझदारी नज़र आती है.

उन्होंने कहा, “ शराब बनाने वाली औरतों को मैं क्या कह सकती हूँ. इस शराब से ही तो उनका घर चलता है. यहाँ पर पढ़े लिखे लोग नहीं है और ना ही काम के कुछ ख़ास अवसर हैं. शराब नहीं बनाएँगी तो घर कैसे चलेगा.”

निशा के अलावा गाँव की कई औरतों से बातचीत हुई. इन औरतों में से ज़्यादातर ने माना की आदिवासी समुदाय में शराब एक बड़ी समस्या हो गया है. कम उम्र के लड़के शराब पीते हैं. इस वजह से उनकी सेहत का जो नुक़सान होता है वो तो है ही, परिवार की शांति भी भंग होती है. 

देश के लगभग सभी आदिवासी इलाक़ों में घर पर ही शराब बनाई जाती है. अलग अलग आदिवासी इलाक़ों में शराब बनाने के लिए अलग अलग चीजों का इस्तेमाल भी होता है. मसलन अगर यहाँ गुड़ से शराब बनाई जा रही है तो असम में हमने चावल से शराब बनती देखी थी. 

वहीं गुजरात और मध्य प्रदेश में महुआ और यहाँ तक की नीम से बनी शराब का स्वाद भी हमने चखा था. आदिवासी समुदायों में घर पर बनाई जाने वाली शराब के बारे में एक और ख़ास बात है, वो ये कि यह शराब सिर्फ़ औरतें ही बनाती हैं या बना सकती हैं. अलग अलग आदिवासी समुदायों में इस बारे में अलग अलग धारणाएँ पाई जाती हैं. 

जैसे अरुणाचल प्रदेश में हमें एक ट्राइबल परिवार ने बताया था कि ओपो यानि देसी शराब सिर्फ़ औरतें ही बनाती हैं. क्योंकि उनके समाज में माना जाता है कि अगर आदमी शराब बनाएगा तो उसे जंगल में शिकार नहीं मिलेगा. इ

दुनिया भर में शराब का चलन पुराना है और आदिवासी समुदायों की संस्कृति का तो यह अभिन्न अंग है. लेकिन अगर शराब की वजह से समाज में तनाव बढ़ रहा है तो इस पर नियंत्रण लगाने पर कम से कम बहस तो ज़रूर होनी चाहिए.

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