HomeAdivasi Dailyहिमाचल का हाटी समुदाय और जनजाति में शामिल होने का अनवरत संघर्ष

हिमाचल का हाटी समुदाय और जनजाति में शामिल होने का अनवरत संघर्ष

आजादी से पहले उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र 1933 तक सिरमौर रियासत का ही एक भाग था. जोंसार को 1967 में भारत सरकार ने जनजातीय क्षेत्र घोषित कर दिया. लेकिन तमाम समानताओं और संघर्ष के बावजूद गिरिपार क्षेत्र के लोगों को अब जनजातीय दर्जा नहीं मिल पाया. नतीजतन, यहां के लोग उन अधिकारों से वंचित रह गए जो उन्हें जनजातीय क्षेत्र होने के कारण मिलने चाहिए थे.

हिमाचल प्रदेश की विधानसभा में गुरूवार, 10 मार्च को हाटी समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने की माँग उठी. विधान सभा में प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस के विधायक हर्षवर्धन चौहान ने यह मामला उठाया. उनका कहना था कि सिरमौर जिला के गिरि पार क्षेत्र की 144 पंचायतों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान करने का मामला लंबे समय से चर्चा में है.

हर्षवर्धन चौहान का कहना है कि उत्तराखंड का जौनसार बावर क्षेत्र अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया है. ऐसे में सिरमौर जिला के हाटी समुदाय को भी जनजाति का दर्जा मिलना चाहिए. उनके सवाल पर जनजाति एवं विकास मंत्री डा रामलाल मारकंडा का कहना था कि इस संबंध में कार्रवाई की जा रही है. 

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने प्रश्नकाल के दौरान कहा कि हाटी समुदाय के लोगों को जनजातीय का दर्जा मिलना चाहिए. उन्होंने बताया कि पिछले दिनों  हाटी समुदाय का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से मिलने के लिए आया था.

उन्होंने सदन को सूचित किया कि सरकार ने इस प्रतिनिधिमंडल की बात को गंभीरता से सुना था. मुख्यमंत्री ने इस सिलसिले में कहा है कि सरकार चाहती है कि हाटी समुदाय के लोगों को अपने दूसरे समुदायों की तरह दर्जा मिल जाए. 

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस मामले पर बोलते हुए सवाल किया कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में यह क्यों नहीं किया था. उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में थी तो तब कांग्रेस को चाहिए था कि इस समुदाय के लोगों को जनजातीय का दर्जा दिलवाने के लिए गंभीरता पूर्वक प्रयास करते.

उन्होंने आश्वासन देते हुए कहा कि मौजूदा प्रदेश सरकार इस दिशा में काम कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि सरकार सिरमौर जिला के ट्रांस गिरी क्षेत्र के लोगों को जनजातियों का दर्जा दिलाने का हर संभव प्रयास करेगी. 

उत्तराखंड में जनजाति का दर्जा मिल चुका है

गिरिपार क्षेत्र में दुर्गम पहाड़ पर उत्तराखंड की सीमा से सटा एक छोटा सा गांव है शरली. टौंस नदी के पार सामने ही उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र का सुमोग गांव है. दोनों ही गांवों के लोगों की भौगोलिक स्थिति एक जैसी ही है. इनकी बोली, पहनावा, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, परंपराएं और जीवन स्तर में भी कोई फ़र्क़ नहीं है.

इन दोनों ही गांवों के लोगों का कुल (वंश) भी एक ही है. यह कहानी जोंसार बाबर और शिलाई समेत गिरिपार क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के लोगों  में भाईचारा है. 

टौंस नदी के उस पार जोंसारा समुदाय को एसटी का दर्जा है और इस पार हाटी समुदाय जनजातीय दर्जे के लिए करीब 49 साल से संघर्ष कर रहा है. लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला. सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की 127 पंचायतों में करीब पौने तीन लाख आबादी हाटी समुदाय की है. 

हाटी समुदाय की लोक संस्कृति, मेले, त्योहार, धार्मिक मान्यताएं और सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन साथ लगते उत्तराखंड के जोंसार बाबर में जोंसारा समुदाय से एकदम मिलता-जुलता है. हाटी और जोंसारा समुदाय एक ही वंश के हैं. 

आजादी से पहले उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र 1933 तक सिरमौर रियासत का ही एक भाग था. जोंसार को 1967 में भारत सरकार ने जनजातीय क्षेत्र घोषित कर दिया. लेकिन तमाम समानताओं और संघर्ष के बावजूद गिरिपार क्षेत्र के लोगों को अब जनजातीय दर्जा नहीं मिल पाया. नतीजतन, यहां के लोग उन अधिकारों से वंचित रह गए जो उन्हें जनजातीय क्षेत्र होने के कारण मिलने चाहिए थे.

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