आदिवासी कार्यकर्ता को ज़बरदस्ती माओवादी दिखाने के मामले में झारखंड पुलिस को NHRC का नोटिस

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजी गई शिकायत में पुलिस पर आरोप है कि उसने बालदेव मुर्मू को ज़बरदस्ती हिरासत में लिया था. इस पूरे मामले में पुलिस ने क़ानून और अदालतों के दिशानिर्देशों का पूरी तरह से उल्लंघन किया था.

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एक आदिवासी कार्यकर्ता को ज़बरदस्ती माओवादी साबित करने के आरोप में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने झारखंड पुलिस को नोटिस दिया है. झारखंड पुलिस को 4 हफ़्ते में इस नोटिस का जवाब देना है. यह घटना 29 जनवरी, 2022 की है जब पुलिस ने बालदेव मुर्मू नाम के एक आदिवासी कार्यकर्ता को हिरासत में लिया था.

बालदेव मुर्मू झारखंड के हज़ारीबाग़ ज़िले के एक गाँव के निवासी हैं. इस घटना के बारे में मिली जानकारी के अनुसार पुलिस ने बालदेव मुर्मू को हिरासत में लेकर उन को प्रताड़ित किया.

बालदेव मुर्मू के अनुसार पुलिस ने हिरासत में उन्हें कई तरह की यातनाएँ दी और ख़ुद को माओवादी स्वीकार करने का दबाव बनाया. जब उनकी हिरासत की ख़बर फैली तो सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा शुरू हो गई. कुछ लोगों ने थाने पर जा कर प्रदर्शन भी किया. 

इस बीच एक वकील के ज़रिए बालदेव मुर्मू ने राँची हाईकोर्ट में इस सिलसिले में आवेदन किया था. इन सब कार्रवाइयों के कई दिन बालदेव मुर्मू को हिरासत से रिहा किया गया. इस सिलसिले में झारखंड में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी शिकायत भेजी थी. 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजी गई शिकायत में पुलिस पर आरोप है कि उसने बालदेव मुर्मू को ज़बरदस्ती हिरासत में लिया था. इस पूरे मामले में पुलिस ने क़ानून और अदालतों के दिशानिर्देशों का पूरी तरह से उल्लंघन किया था.

इस शिकायत में कहा गया है कि बालदेव मुर्मू को बिना वारंट के हिरासत में लिया गया था. इसके अलावा 48 घंटे से ज़्यादा हिरासत में रखने के बावजूद उन्हें किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश तक नहीं किया गया.

राष्ट्रीय आयोग को मिली शिकायत में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने या गिरफ्तार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने डीके बासु केस में जो दिशा निर्देश तय किये थे, उनका पालन नहीं किया गया था.

अब इस सिलसिले में आयोग ने झारखंड पुलिस से जवाब माँगा है. 

डीके बासु गाइडलाइन्स क्या है

1. गिरफ्तारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी की पोशाक पर उसकी पहचान, नामपट्टी तथा पद स्पष्ट व सटीक रूप से अंकित होना चाहिए.

2. गिरफ्तारी के समय अरेस्ट मेमो के रूप में गिरफ्तारी संबंधी पूरी जानकारी का कागज़ तैयार किया जाए. उसमें गिरफ़्तारी के समय व तारीख का उल्लेख होना चाहिए. उसके सत्यापन के लिए कम से कम एक गवाह होना चाहिए. वह गिरफ़्तार सदस्य के परिवार का व्यक्ति भी हो सकता है. अरेस्ट मेमो पर गिरफ़्तार होने वाले व्यक्ति के दस्तखत होने चाहिए. 

3. गिरफ्तार किए गए, हिरासत रखे गए या जिससे पूछताछ की जा रही है, ऐसे व्यक्ति को अपने किसी संबंधी या दोस्त या शुभचिंतक को जानकारी देने का अधिकार होता है. 

4. जब गिरफ़्तार व्यक्ति का दोस्त या संबंधी उस जिले से बाहर रहता हो, तो गिरफ़्तारी के 8-12 घंटे के भीतर उसे गिरफ्तारी के समय, स्थान और हिरासत की जगह के बारे में जानकारी भेज दी जानी चाहिए.

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