आदिवासी लड़कियों की शिक्षा पर दोहरी मार, पहले से ही कम दाख़िले की दर को कोविड ने और गिराया

जो लड़कियां स्कूल पहुंचीं भी, उन्हें वहां कई दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा. मसलन, स्कूलों में पारंपरिक लिंगभेद से रूढ़ीवादी सोच को बढ़ावा दिया गया. जहां लड़कों को ब्लैकबोर्ड साफ़ करने का काम मिलता है, तो लड़कियों से झाड़ू लगवाया जाता है. जाति, जनजाति, और धर्म के आधार पर बच्चों की सीटें तय की जाती हैं, और कई बार इस तरह का भेदभाव पाठ्यपुस्तकों में भी मिलता है. विकलांग या एलजीबीटीक्यू समुदाय की लड़कियों के हालात और भी बदतर हैं.

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कोविड महामारी के चलते देश में एक करोड़ लड़कियों की पढ़ाई अधूरी रह सकती है. राइट टू एजुकेशन फ़ोरम ने अपने पॉलिसी ब्रीफ़ में कहा है कि वर्तमान में 11 से 14 वर्ष की 16 लाख लड़कियां जो स्कूलों से बाहर हैं, महामारी की वजह से यह आंकड़ा और भी बढ़ जाएगा.

अनुसूचित जनजातियों में महिला साक्षरता दर चौंकाने वाली है, ख़ासकर उन राज्यों में जहां आदिवासियों की बड़ी तादाद है. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और राजस्थान में महिला साक्षरता दर 70.3 प्रतिशत की राष्ट्रीय औसत से काफ़ी नीचे है. हालांकि यह आंकड़ा केरल, मिज़ोरम, लक्षद्वीप, गोवा और त्रिपुरा में बेहतर है.

लड़कियों की उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सबसे बड़ी अड़चन स्कूल से उनकी दूरी है, साथ ही बुनियादी ढाँचे की कमी ने भी उन्हें पढ़ाई से दूर किया है. पॉलिसी ब्रीफ़ में कहा गया है कि ग्रामीण भारत में प्रत्येक 100 प्राथमिक स्कूलों (कक्षा 1 से 8) के लिए, केवल 14 माध्यमिक (कक्षा 9-10) और केवल छह हाई स्कूल (कक्षा 11-12) हैं.

आदिवासियों की बात करें तो प्राथमिक स्तर पर सिर्फ़ 10.35 प्रतिशत लड़कियों ने स्कूल में दाख़िला लिया, माध्यमिक स्तर पर यह दर 8.6 प्रतिशत तक गिर गई, और हाई स्कूल तक आते-आते दाख़िले की दर 6.8 प्रतिशत रह गई. अनुसूचित जाति की लड़कियों के आंकड़े भी ज़्यादा अच्छे नहीं हैं. एससी लड़कियों की दाख़िले की दर प्राथमिक स्तर पर 19.34 प्रतिशत थी, जो माध्यमिक स्तर पर 18.6 प्रतिशत और हाई स्कूल में 17.3 प्रतिशत हो गई. यानि जो लोग पहले से ही हाशिये पर हैं, उन्हें आगे बढ़ने से कहीं न कहीं रोका ही जा रहा है.

जो लड़कियां स्कूल पहुंचीं भी, उन्हें वहां कई दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा. मसलन, स्कूलों में पारंपरिक लिंगभेद से रूढ़ीवादी सोच को बढ़ावा दिया गया. जहां लड़कों को ब्लैकबोर्ड साफ़ करने का काम मिलता है, तो लड़कियों से झाड़ू लगवाया जाता है. जाति, जनजाति, और धर्म के आधार पर बच्चों की सीटें तय की जाती हैं, और कई बार इस तरह का भेदभाव पाठ्यपुस्तकों में भी मिलता है. विकलांग या एलजीबीटीक्यू समुदाय की लड़कियों के हालात और भी बदतर हैं. प्रशिक्षण और संवेदना की कमी के चलते इन बच्चों का उत्पीड़न शिक्षक नहीं रोक पाते, और कभी-कभार शिक्षक खुद इस उत्पीड़न में शामिल होते हैं.

लड़कियों पर घर की ज़िम्मेदारी ज़्यादा

ग़रीबी और समाज की पितृसत्तात्मक सोच भी लड़कियों की शिक्षा को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि घर के छोटे बच्चों का ख़्याल, और घर का काम ज़्यादातर लड़िकयों के ज़िम्मे होता है.

इस भेदभाव को दूर करने के लिए ज़रूरत है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम का विस्तार किया जाए. इसके अलावा ज़रूरत है कि लड़कियों के लिए एक सुरक्षित वातावरण स्थापित किया जाए, और सशक्तिकरण और जीवन कौशल के अलावा समान भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया जाए.

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