तमिलनाडु: 40 इरुला परिवार अपनी ज़मीन पर क़ैद

आदिवासियों को मेन रोड तक पहुंचने के लिए निजी भूखंडों में कम से कम 600 मीटर चालना पड़ता है. 2010 के बाद से, यानि इन लोगों के यहां बसने के चार साल बाद, आसपास के प्लॉट निजी भूमि में बदलना शुरू हुए.

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लगभग 40 इरुला आदिवासी परिवार अपनी बस्ती में जैसे क़ैद हो गए हैं, क्योंकि बस्ती के आसपास के प्लॉट निजी खरीददारों ने ले लिए हैं, तो उनके आने-जाने के लिए कोई जगह नहीं बची है. चेन्नई के उपनगरीय इलाके में थिरुपोरूर के पास जिस ज़मीन पर यह लोग रहते हैं, वह 2006 में एक एनजीओ द्वारा उनके लिए ख़रीदी गई थी ताकि यह आदिवासी कांचीपुरम ज़िले से शिफ़्ट हो सकें.

जिस समय वो यहां शिफ़्ट हुए थे, तब ईस्ट कोस्ट रोड (ईसीआर) के लिए एक सीधी सड़क तक उनकी पहुंच थी. उनके पास अपने घरों के पट्टे, और पेयजल, बिजली और शौचालय जैसी सुविधाएं हैं, लेकिन आसपास के इलाक़े के विकास ने उनके लिए समस्या खड़ी कर दी है.

एक आदिवासी, मुरुगेशन, ने कहा, “जब हम पहली बार यहां आए तो आने-जाने के लिए रास्ता था. लेकिन समय के साथ, खुले मैदान निजी भूखंडों में बदल गए और हमारे प्राथमिक निकास मार्ग पर एक बड़ी सी दीवार आ गई.”

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आदिवासियों को मेन रोड तक पहुंचने के लिए निजी भूखंडों में कम से कम 600 मीटर चालना पड़ता है. 2010 के बाद से, यानि इन लोगों के यहां बसने के चार साल बाद, आसपास के प्लॉट निजी भूमि में बदलना शुरू हुए.

इन आदिवासियों को डर है कि वो अंत में फंस जाएंगे, क्योंकि हाल के महीनों में, कुछ ज़मीन के मालिकों ने उनकी आवाजाही पर आपत्ति करना शुरू कर दिया है.

एक बुज़ुर्ग आदिवासी, वीरम्माल ने कहा, “चूंकि हम मवेशी चराते हैं, उन्होंने हमें अपनी ज़मीन का इस्तेमाल बंद करने के लिए कहा है. हम उनकी ज़मीन पर अपनी बाइक भी चलाते हैं. हम चाहते हैं कि सरकार हस्तक्षेप करे और हमारे गांव के लिए एक उचित सड़क तैयार करे.”

इस संबंध में आदिवासियों ने पहले भी ज़िला अधिकारियों को याचिकाएं भेजी थीं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. ज़िला राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने अखबार को बताया, “हम इस मुद्दे को कलेक्टर के साथ उठाएंगे और पता लगाएंगे कि हम उनके लिए सड़क बना सकते हैं या नहीं.”

आदिवासी निवासियों को हालांकि इस बात से ज़्यादा उम्मीद नहीं है. उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने पहले निजी ज़मीन मालिकों के साथ इस मामले पर चर्चा की थी, लेकिन उन्होंने सड़क बनाने के लिए अपनी ज़मीन देने से इनकार कर दिया.

थिरुपोरूर के विधायक एसएस बालाजी का कहना है कि ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनाव ख़त्म होने के बाद इस समस्या का हल निकाला जाएगा. उन्होंने बताया कि उनके चुनाव जीतने के बाद भी आदिवासियों ने इस मुश्किल से उनको अवगत कराया था, और उन्होंने इस बारे में कलेक्टर से बात की थी और विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया था. अब वो चुनाव के बाद फिर से कलेक्टर के साथ चर्चा करेंगे.

स्थानीय निकाय चुनाव में गांव की एक इरुला महिला एस मोहना उम्मीदवार बनना चाहती हैं. उनका मानना है कि चुनाव जीतने पर ही इस समस्या का हल निकाला जा सकता है. वह ग्राम पंचायत वॉर्ड सदस्य के पद के लिए चुनाव लड़ने को तैयार हैं.

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