केरल हाई कोर्ट: आरक्षित वनों पर आदिवासियों का हक़, नहीं बन सकते यहां तीर्थस्थल

आदिवासी द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि बोनाकौड वन क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 18 के तहत आरक्षित वन भूमि है. उसमें आरोप है कि 2013-14 के बाद से जंगल में कई जगहों पर क्रॉस का निर्माण कर अतिक्रमण करने की कोशिश की गई है.

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केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी भी धार्मिक समुदाय को आरक्षित वन भूमि के अंदर तीर्थयात्रा करने का अधिकार नहीं है. जस्टिस एन नागेश ने सुकुमारन काणी और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया.

पहले याचिकाकर्ता एक आदिवासी समुदाय के हैं, जबकि दूसरी याचिका एक पर्यावरणविद् द्वारा दायर की गई है. उनकी मांग है कि वन अधिकार अधिनियम की धारा 3 के तहत परुनपल्ली रिज़र्व फ़ॉरेस्ट, पेप्परा वन्यजीव अभयारण्य और आसपास के क्षेत्रों को अधिसूचित किया जाए.

इससे अनुसूचित जनजातियों और जंगल में रहने वाले दूसरे लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखा जा सकेगा.

दो याचिकाएं और दायर की गई हैं जिसमें दावा किया गया है कि यह क्षेत्र एक तीर्थस्थल है. एक याचिका विदुरा में बोनाकौड तीर्थयात्रा केंद्र के रेक्टर द्वारा दायर की गई थी. इसमें दावा किया गया है कि बोनाकौड तीर्थयात्रा केंद्र को यहां स्थित हिल ऑफ़ द क्रॉस पर धार्मिक संस्कार करने का अधिकार है.

आदिवासी द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि बोनाकौड वन क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 18 के तहत आरक्षित वन भूमि है. उसमें आरोप है कि 2013-14 के बाद से जंगल में कई जगहों पर क्रॉस का निर्माण कर अतिक्रमण करने की कोशिश की गई है.

2013-14 में इस तरह के 14 क्रॉस आरक्षित वन क्षेत्र में स्थापित किए गए थे

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे क्षेत्र एक तीर्थस्थल के रूप में परिवर्तित हो रहा है, जो आदिवासियों की आजीविका पर असर डालेगा. दरअसल इस भूमि को लेकर विवाद पुराना है. एक दावा यह भी है कि यह इलाक़ा 1957 से ही इसाई तीर्थस्थल के रूप में मशहूर है.

इसके अलावा एक दावा यह भी है कि हिंदु धर्म के यहां तीन पूजा स्थल हैं. ऐसे में अगर एक समुदाय के लोगों को पूजा करने की अनुमति है, और दूसरे को नहीं तो संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होता है.

कोर्ट ने अपना फ़ैसला नाते हुए हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें अगस्त्यकूडम शिखर पर स्थित मंदिर में प्रवेश से इनकार कर दिया था. कोर्ट ने कहा कि किसी भी धार्मिक समुदाय को आरक्षित वन भूमि में किसी भी स्थान पर तीर्थयात्रा करने का अधिकार नहीं है.

कोर्ट ने यहा भी कहा कि अगर लोगों का कोई समूह किसी भी आरक्षित वन क्षेत्र में जबरन प्रवेश कर अनाधिकृत रूप से किसी भी संरचना का निर्माण करते हैं, तो कानून के अनुसार ऐसी संरचनाओं को हटाने का उत्तरदायित्व वन अधिकारियों पर है.

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