तमिल नाडु: नरिकुरवर जनजाति की दो लड़कियों ने जीता राज्य स्तर पर पदक

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली इन छात्राओं ने सब-जूनियर वर्ग में कांस्य पदक जीता है. उनका प्रदर्शन इससे भी बेहतर हो सकता है, अगर उनके स्कूल में एक खेल का मैदान हो.

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तमिल नाडु में मइलदुतुरई जिले के पल्लवरायनपेट्टई की एक नरिकुरवा आदिवासी बस्ती में आजकल जश्न का माहौल है. वजह है बस्ती की दो लड़कियां, जिन्होंने कुछ दिन पहले हुई एक राज्य स्तरीय बॉक्सिंग (मुक्केबाज़ी) प्रतियोगिता में जीत हासिल की.

नरिकुरवा आदिवासी समुदाय के लोगों के बीच सूरज ढलने से पहले घर लौटने की परंपरा है. हालांकि यह परंपरा इन लड़कियों के लिए बाधा बन सकती थी, लेकिन उनके माता-पिता और समुदाय के दूसरे लोगों ने उनके सपनों को पहचाना औऱ उनकी मदद की.

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली इन छात्राओं ने सब-जूनियर वर्ग में कांस्य पदक जीता है. उनका प्रदर्शन इससे भी बेहतर हो सकता है, अगर उनके स्कूल में एक खेल का मैदान हो.

एक मई को राज्य के तंजावुर ज़िले में क्षेत्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेने वाले पल्लवरायनपेट्टई में नेताजी सुभाष चंद्र बोस रेज़िडेंशियल स्कूल के छह छात्रों में से दो ने अगले स्तर के लिए क्वालीफाई किया. इन दोनों ने पुदुक्कोट्टई में 6 से 8 मई के दौरान हुए राज्य स्तरीय मीट में कांस्य पदक जीता.

तमिलनाडु बॉक्सिंग एसोसिएशन द्वारा आयोजित इस मीट में छात्रा सी धनलक्ष्मी ने 54-56 कि.ग्रा. वर्ग में कांस्य जीता जबकि एस वेन्निला ने 36-38 किग्रा वर्ग में कांस्य जीता.

“मैं एक साल से अभ्यास कर रही हूं. मुझे ज्यादा परेशानी नहीं हुई, क्योंकि मुझे मेरे माता-पिता, शिक्षकों और प्रशिक्षकों का पूरा समर्थन मिला है. मैं पूर्व विश्व चैंपियन मैरी कॉम की तरह एक चैंपियन बॉक्सर बनना चाहती हूं,” वेन्निला ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया.

हालाँकि, इन दोनों की ट्रेनिंग स्कूल में नहीं बल्कि राजन तोट्टम स्थित  भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के स्टेडियम में हुई थी.

ऐसा इसलिए कि कक्षा 1 से 8 तक के 100 से ज़्यादा छात्रों की संख्या वाले स्कूल में – जिनमें से अधिकांश नरिकुरवर और अडियन आदिवासी समुदायों से हैं – के पास खेल का मैदान नहीं है. स्कूल के कर्मचारियों का कहना है कि उनके पास खिलाड़ियों को बुनियादी ट्रेनिंग देने के लिए भी साई स्टेडियम ले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

40 साल की नरिकुरवर महिला और सी धनलक्ष्मी की मां, सी सुमति, समुदाय के बच्चों को दूर भेजने के बारे में अपनी चिंताएं बयान करते हुए कहती हैं, “मुझे गर्व है कि मेरी बेटी ने कांस्य पदक जीता है, और मुझे विश्वास है कि वह भविष्य में स्वर्ण पदक भी जीतेगी. हालांकि, हम अभी भी अपने बच्चों को कॉलोनी के बाहर ट्रेनिंग के लिए भेजने को लेकर चिंतित रहते हैं. हम प्रशासन से अनुरोध करते हैं कि स्कूल के लिए खेल का मैदान बनाएं, ताकि हमारे बच्चे बेहतर कर सकें और स्कूल के लिए ज़्यादा गौरव ला सकें.”

स्कूल की प्रिंसिपल के कृष्णवेनी ने कहा, “हम छात्रों को शाम को ऑटोरिक्शा में स्टेडियम ले जाते हैं. हम यह सुनिश्चित करते हैं कि जब भी हमें लड़कियों को ट्रेनिंग के लिए ले जाना होता हो तो कई महिला टीचर लड़कियों के साथ यात्रा करे.”

स्कूल के पीटी टीचर के असैतंबी, जिन्होंने ट्रेनर आर कुबेंदिरन के साथ छात्रों को बॉक्सिंग के लिए ट्रेन किया, ने भी स्कूल के लिए एक खेल के मैदान की ज़रूरत को हाइलाइट किया. वो कहते हैं कि खेल का मैदान हो तो छात्रों की प्रतिभा को और निखारा जा सकता है.

स्कूल का समर्थन करने वाले नीड ट्रस्ट के एक ट्रस्टी आर विजयसुंदरम ने कहा, “स्कूल को सभी के लिए शिक्षा प्रदान करने के इरादे से बनाया गया था, ख़ासकर इलाक़े की खानाबदोश जनजातियों के लिए. समग्र शिक्षा अभियान के अधिकारियों को उचित मात्रा में धन आवंटन सुनिश्चित करना चाहिए ताकि छात्र पढ़ाई के अलावा खेल कूद में भी चमक सकें.”

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