कमेटी और रिपोर्ट का फ़र्क़ नहीं समझ पाया मंत्रालय, संसद में तथ्यात्मक भूल के साथ जवाब पेश किया

जब हमने कमेटी और उसकी रिपोर्ट तलाश की तो पाया कि सरकार के जवाब में तथ्यात्मक भूल है. दरअसल जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े संकलित करने के लिए कमेटी का गठन 2013 में हुआ था. डॉक्टर अभय बंग को इस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. जबकि संसद में सरकार ने बताया है, “भारत में जनजातीय स्वास्थ्य: कमियों को दूर करना और भविष्य की रूपरेखा” नाम से जनजातीय स्वास्थ्य संबंधी विशेषज्ञ समिति वर्ष 2018 में गठित हुई. इस कमेटी का काम जनजातीय स्वास्थ्य की स्थिति पर ब्यौरा प्रदान करना है.

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लोकसभा के चालू मानसून सत्र में सरकार से आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ा एक सवाल पूछा गया था. इस सवाल में सरकार से पूछा गया है कि जनजातीय क्षेत्रों में आदिवासी लोगों के स्वास्थ्य की स्थिति और स्वास्थ्य की देखभाल की सुविधाओं पर कोई सर्वेक्षण या अध्ययन किया है.

इस सवाल का एक लंबा जवाब स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ़ से संसद में रखा गया है. इस जवाब में मंत्रालय ने बताया है, “भारत में जनजातीय स्वास्थ्य: कमियों को दूर करना और भविष्य की रूपरेखा” नाम से जनजातीय स्वास्थ्य संबंधी विशेषज्ञ समिति वर्ष 2018 में गठित हुई. इस कमेटी का काम जनजातीय स्वास्थ्य की स्थिति पर ब्यौरा प्रदान करना है.

लेकिन जब हमने इस जवाब में बताई गई कमेटी और उसकी रिपोर्ट तलाश की तो पाया कि सरकार के जवाब में तथ्यात्मक भूल है. दरअसल जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े संकलित करने के लिए कमेटी का गठन 2013 में हुआ था. डॉक्टर अभय बंग को इस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था.

ऐसा लगता है कि मंत्रालय ने सवाल का जवाब तैयार करने में जल्दबाज़ी की है. इसलिए जिस साल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है उस साल को कमेटी के गठन का साल बता दिया गया है. 

जनजातीय इलाक़ों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर रिपोर्ट

वैसे तो संसद के पटल पर ग़लत जानकारी रखना बड़ी भूल है. क्योंकि यह भूल दस्तावेज़ों में दर्ज हो जाती है और फिर एक ग़लत तथ्य हमेशा के लिए सही रिकॉर्ड बन जाता है. लेकिन इस सवाल का जवाब पढ़ते हुए हमें हैरानी इस बात की हुई कि इस कमेटी का ज़िक्र तो मंत्रालय के जवाब में हुआ है, लेकिन इस कमेटी ने जो आंकड़े पेश किये हैं उनका ज़िक्र नहीं किया गया है.

सरकार की तरफ़ से जनजातीय इलाक़ों में स्वास्थ्य सुविधाओं पर पूछे गए एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब बेहद तकनीकी और खा़नापूर्ती नज़र आता है. इस कमेटी को यह बताना था कि देश के बाक़ी इलाक़ों की तुलना में आदिवासी इलाक़ों में लोगों का स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सुविधाओं में क्या फ़र्क़ है? इसके साथ ही कमेटी को यह भी बताना था कि जनजातीय इलाक़ों में स्वास्थ्य देखभाल संबंधित सुविधाओं और दूसरे इलाक़ों में मौजूद सुविधाओं के फ़र्क़ को कैसे मिटाया जाए?

इस सिलसिले में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से तथ्यों को रखा है. मसलन आदिवासी इलाक़ों में स्वास्थ्य से जुड़ी हुई 10 बड़ी समस्याओं को कमेटी ने रेखांकित किया है. कमेटी ने इन समस्याओं से जुड़े आँकड़े भी पेश किये हैं – 

  1. मलेरिया (Controlling Malaria) – कमेटी ने बताया है कि देश के 124 ज़िलों में जहां भारत की कुल आबादी का 8 प्रतिशत है लेकिन इस कुल आबादी का 49 प्रतिशत आदिवासी आबादी है. देश के कुल मलेरिया के मामलों में से 46 प्रतिशत इस आदिवासी आबादी में पाए जाते हैं. देश भर में मलेरिया से होने वाली मौतों में से 47 प्रतिशत यानि लगभग आधी मौतें आदिवासी इलाक़ों में होती हैं. लेकिन मलेरिया से लड़ने के लिए बनाए गए कार्यक्रम NVBDCP के बजट का 10 प्रतिशत ही आदिवासी इलाक़ों के लिए दिया जाता है.
  1. माता और बच्चों में कुपोषण (Malnutrition among the tribal population) – कमेटी ने पाया है कि आदिवासी इलाक़ों में माताओं और बच्चों में कुपोषण कई कारणों से होता है. इसलिए इससे निपटने के लिए भी कई विभागों के कार्यक्रमों के तालमेल से ही हो सकता है. इस सिलसिले में कमेटी ने उपाय सुझाते हुए कहा है कि खाद्य सुरक्षा, स्थानीय भोजन, आंगनबाड़ी मजूबत करना, स्थानीय तौर पर उपलब्ध भोजन में पोषक तत्वों की जानकारी और ज़रूरत माताओं को समझाना आदि ज़रूरी है. 
  1. आदिवासी बच्चों की मृत्यु दर को नियंत्रित करना (Child Mortality among the tribal Population) – कमेटी कहती है कि आदिवासी इलाक़ों में शिशु मृत्यु दर किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं कही जा सकती है. इस समस्या को विकराल और चिंताजनक बताते हुए कमेटी ने इसके कारण समझने की कोशिश भी की है. आदिवासी बच्चों में मौत के मुख्य कारणों में मलेरिया, पेचिश-हैजा और निमोनिया पाया गया है. इस मामले में कमेटी कहती है कि सबसे पहले तो आदिवासी इलाक़ों में नवजात बच्चों की मृत्यु दर को सही सही दर्ज करना ज़रूरी है. कमेटी को शायद यह लगता है कि आदिवासी इलाक़ों में ये मामले अंडर रिपोर्टेड हैं. 
  1. सुरक्षित और स्वस्थ माता (Safe Motherhood and Health women) – कमेटी ने कहा है कि आदिवासी महिलाओं को अस्पताल के सुरक्षित माहौल में बच्चे को जन्म देने के अलावा उनके गाँव या घर पर भी सुरक्षित जन्म देने की व्यवस्था की जानी चाहिए. इसके लिए आदिवासी इलाक़ों में दाई और दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाना बेहद ज़रूरी है. इसके अलावा आदिवासी इलाक़ों में प्रसूति सेवाओं की व्यवस्था होनी चाहिए. कमेटी ने सुझाव दिया है कि दो लाख की आबादी के इलाक़े में कम से कम एक प्रसूति केन्द्र होना ही चाहिए. यह केन्द्र 24 घंटे खुला हो और किसी भी आदिवासी इलाक़े से यहाँ तक एक घंटे के भीतर पहुँचने की व्यवस्था हो. कमेटी ने विशेष रुप से कमज़ोर आदिवासी समुदायों (PVTG) के लिए विशेष उपाय करने की ज़रूरत भी बताई है. 
  1. परिवार नियोजन सुविधाएँ  (Family planning and Infertility care) – इस कमेटी ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मसले पर अपनी राय देते हुए कहा है कि आदिवासियों को भी अपने परिवार को नियोजित करने का हक़ और विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए. कमेटी कहती है कि इस मामले में विशेष रूप से कमज़ोर माने जाने वाले आदिवासी समुदायों को भी यह हक़ दिया जाना चाहिए कि वो बच्चा पैदा करना चाहते हैं या नहीं. 
  1. नशा मुक्ति और मेंटल हेल्थ (De-addiction and Mental Health) – इस रिपोर्ट में ज़ोर दे कर कहा गया है कि आदिवासी इलाकों में नशे और मानसिक सेहत का सही सही आकलन करना बेहद ज़रूरी है. इस बारे में कहा गया है कि आदिवासी इलाकों में उनकी संस्कृति और परंपराओं को ध्यान में रखते हुए मानसिक सेहत से जुड़े मसलों को सुलझाना होगा. इसके साथ ही आदिवासी इलाकों में नशे की लत का इलाज़ ढूंढने पर भी बल दिया गया है. 
  1. सिकल सेल (Sickle Cell Disease) – कमेटी ने अपने अध्य्यन में यह पाया है कि इस मोर्चे पर एक स्क्रीनिंग का सिस्टम तैयार किया गया है. लेकिन अभी भी इस बीमारी से गंभीर रूप से ग्रस्त लोगों के लिए कोई कार्ययोजना नहीं है. कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मसले को प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए. 
  1. जानवरों के हमले या दुर्घटना में समय पर इलाज (Animal Bites and Accident) – यह सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन यह सच है कि आदिवासी इलाकों में कुत्ते और दूसरे जानवरों के हमले में घायल होना एक आम बात है. इसके अलावा सांप के काटने से भी कई लोगों की मौत होती है . इस तरह के ज़्यादातर मामलों में मौत इसलिए होती है कि आदिवासी इलाकों में समय पर सही इलाज नहीं मिल पाता है. 
  1. आदिवासी इलाक़ों में स्वास्थ्य जागरूकता (Health Literacy in Tribal Areas) – कमेटी कहती है कि जानकारी किसी भी बीमारी के इलाज़ की सबसे बेहतरीन गोली होती है. यानि अगर समाज में जानकारी हो तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है. इस सिलसिले में कमेटी ने सुझाव दिया है कि और विस्तार से बाताय है कि आदिवासी इलाकों में कैसे यह काम किया जा सकता है.
  1. आश्रमशालाओं में बच्चों की सेहत (Health of Children in Ashramshala) – कमेटी ने बताया है कि बड़ी तादाद में आदिवासी बच्चे हॉस्टल या आश्रमशाला में रहते हैं. यह देखा गया है कि आमतौर पर इन आश्रमशालाओं में स्थिति काफ़ी खराब रहती है. इस सिलसिले में कमेटी ने महाराष्ट्र का ज़िक्र करते हुए उदाहरण दिया है जहां करीब साढ़े चार लाख बच्चे इस तरह की आश्रमशालाओं में रहते हैं. 

इस कमेटी की रिपोर्ट को पढ़ने के बाद अहसास होता है कि देश में आदिवासियों की सेहत से जुड़े मसलों को समझने और उनके समाधान की एक गंभीर कोशिश की गई है. लेकिन इस रिपोर्ट में जो जानकारी, पृष्ठभूमि, आँकड़े या विश्लेषण दिया गया है वह अकादमिक उद्देश्य नहीं बल्कि नीति निर्माण में सहयोग के लिए है.

लेकिन कम से कम संसद में सरकार की तरफ़ से दिए गए जवाब से तो ऐसा नहीं लगता है कि ज़िम्मेदार लोगों ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है. स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ़ से दिए गए जवाब में जनजातीय क्षेत्रों पर माँगी गई जानकारी को अलग से नहीं बताया गया है.

बल्कि सभी वर्गों और क्षेत्रों के लिए चलाए जाने वाले आँकड़े और उस पर होने वाले ख़र्च का ब्यौरा दिया गया है. दरअसल सरकार यह जानती है कि इस सवाल के जवाब के लिए जो आँकड़े चाहिएँ वह सरकार के पास उपलब्ध नहीं हैं.

2013 में गठित की गई इस कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में यह माना है कि भारत में आदिवासी इलाक़ों में स्वास्थ्य की स्थिति को समझने और उसे दुरूस्त करने के लिए जितने आँकड़ों की दरकार है वह मौजूद नहीं हैं. शायद इसलिए ही इस कमेटी का गठन भी किया गया था.

भारत में नीति आयोग (योजना आयोग) जैसी संस्था का निर्माण इसलिए ही किया गया था कि जिससे देश के अलग अलग राज्यों, इलाक़ों और समुदायों से जुड़ी योजनाओं का निर्माण प्रभावी तरीक़े से किया जा सके. योजना बनाने के लिए अक्सर यह संस्था कई तरह के अध्ययन या सर्वे भी करवाती है.

इसके अलावा देश में कई विभाग और एजेंसी भी अलग अलग आँकड़े जुटाने का काम करती है. इन आँकड़ों के आधार पर ही विशेषज्ञ यह पता लगाते है कि कहां पर क्या कमी है. जिससे उन इलाक़ों या समुदायों या फिर मसलों पर फ़ोकस कर नीतियाँ या योजनाएँ बनाई जा सकें.

लेकिन लगातार आलोचनाओं के बाद भी सरकार आँकड़े जुटाने या पेश करने में ना जाने क्यों झिझकती है.

हमने यह भी लगातार देखा है कि संसद में आदिवासियों और आदिवासी इलाक़ों पर सरकार की तरफ़ से लंबे जवाब दिए जाते हैं. लेकिन इन सवालों से अपेक्षित जानकारी निकालना एक टेढ़ी खीर होता है. क्योंकि अक्सर इन जवाबों में माँगी गई जानकारी के अलावा सब कुछ मौजूद होता है.

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