साल के आख़री महीनों में आदिवासी आंदोलन की धमक सुनाई देगी

साल 2022 के आख़री तीन महीने में आदिवासी संगठन अपनी धार्मिक पहचान की दावेदारी को लेकर दिल्ली आने की तैयारी कर रहे हैं. इसके अलावा इन महीनों में झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में भी आदिवासी आंदोलन तेज़ करने की तैयारी चल रही है.

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पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कई आदिवासी संगठन ‘सरना धर्म’ के लिए बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं. इस सिलसिले में मयूरभंज के पूर्व सांसद सलखान मूर्मु ने MBB से बात करते हुए कहा, “अलग सरना धर्म को मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन की रूपरेखा बन चुकी है. इस क्रम में 20 सितंबर यानि मंगलवार को ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में एक बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा. उसके बाद 30 सितंबर को कोलकाता में भी एक प्रदर्शन होगा.”

उन्होंने आगे कहा, “इस सिलसले में 26 अगस्त को हमने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से मुलाक़ात की थी. उनके राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी समुदायों में यह उम्मीद जगी है कि उनके मसलों पर राष्ट्रपति कदम उठाएँगी.”

आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की माँग की जा रही है. इस सिलसिले में झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में कई आदिवासी संगठन ‘सरना धर्म’ को अलग से मान्यता देने की माँग कर रहे हैं. इसके अलावा आदिवासी संगठन यह भी माँग कर रहे हैं कि अगली जनगणना में आदिवासियों की पहचान अलग से दर्ज की जाए.

आदिवासी सेंगल अभियान (tribal empowerment campaign) नाम के संगठन ने सरना धर्म को मान्यता दिलाने के लिए कई आदिवासी सगंठन को एक मंच पर लाने का प्रयास किया है. 

आदिवासी समुदायों की अलग धार्मिक पहचान के आंदोलन को एक बड़ा राजनीतिक समर्थन झारखंड सरकार से मिला. 11 नवंबर 2020 को झारखंड विधान सभा का एक दिन का विशेष अधिवेशन आयोजित कर सरना धर्म को मान्यता देने का प्रस्ताव पास किया.

झारखंड विधान सभा से पास प्रस्ताव को केंद्र सरकार को भेज दिया गाया. इसके अलावा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार सरना धर्म को अलग से मान्यता देने की माँग का समर्थन करती रही हैं. 

लेकिन केन्द्र सरकार या फिर सत्ताधारी दल बीजेपी की तरफ़ से इस मुद्दे या आंदोलन पर कुछ नहीं कहा गया है. आदिवासी समुदायों की इस अहम माँग पर केंद्र सरकार और बीजेपी में एक गहरी चुप्पी नज़र आती है. 

आदिवासी सेंगेल अभियान के नेता सलखान मूर्मु

इसकी वजह शायद विचारधारा और सैद्धांतिक ज़्यादा है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) और बीजेपी की लाइन है कि देश के सभी आदिवासी हिन्दू हैं. उससे जुड़े कई संगठन आदिवासी इलाक़ों में काम करते हैं जो आदिवासी समुदायों में हिन्दू धर्म का प्रचार करते हैं.

संघ परिवार के लिए आदिवासी समुदायों में धर्म परिवर्तन सबसे बड़ा मुद्दा है. संघ के संगठन आदिवासी समुदायों में ईसाई धर्म के प्रचार के मसले पर चिंतित रहते हैं. इस सवाल पर सलखान मूर्मु ने MBB से बात करते हुए कहा, “बीजेपी या आरएसएस कुछ भी समझ सकती हैं. लेकिन सच्चाई ये है कि आदिवासी समुदाय हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 लागू नहीं होता है. इस क़ानून के तहत हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के लोग कवर होते हैं. “

वो कहते हैं, “आदिवासी समुदाय क़ानूनी तौर पर हिन्दू नहीं माने जा सकते हैं. हम लोग प्रकृति के पुजारी हैं और हमारी अलग धार्मिक पहचान है. “

प्रोफ़ेसर कर्मा (दाएँ से चौथे) सरना धर्म पर झारखंड की विधानसभा में पारित प्रस्ताव के बाद की रैली में भाग लेते हुए

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में आंदोलन और प्रदर्शन के अलावा झारखंड के आदिवासी संगठन भी सरना धर्म को मान्यता देने की माँग को तेज़ करने की तैयारी कर चुके हैं. झारखंड में सरना धर्म के लिए चल रहे आंदोलन के बड़े नेता प्रोफ़ेसर कर्मा उराँव ने MBB से बातचीत में यह जानकारी दी है.

प्रोफ़ेसर कर्मा उराँव ने कहा, “हमारे धर्म को क्रिश्चियन और हिंदू धर्म में बाँट कर देखा जा रहा है. हमें अपनी पहचान बचाने के लिए इसे रोकना होगा. हमारी अपनी पहचान है और इसलिए हम चाहते हैं कि सरना धर्म को मान्यता दी जाए.”

उन्होंने कहा, “हम लोग 11 नवंबर 2022 को दिल्ली में एक बड़ा प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया है. इसकी तैयारी के लिए 23 सितंबर को हमारी बैठक है. इस बैठक में 40 से ज़्यादा संगठन शामिल होंगे.”

प्रोफ़ेसर कर्मा उराँव ने कहा कि सरना धर्म रक्षा अभियान के लिए कम से कम 40 संगठन एक मंच पर आए हैं. उन्होंने यह भी बताया कि ये 40 संगठन दिल्ली पहुँचने से पहले राँची में एक विशाल रैली की जाएगी. 

उन्होंने भी कहा कि अब एक आदिवासी महिला यानि द्रोपदी मूर्मु देश की राष्ट्रपति हैं. इसलिए आदिवासी समुदाय के लोगों को उम्मीद है कि उनके मसलों पर दिल्ली में कोई सुनवाई हो सकती है. 

पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, असम से लेकर मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आदिवासी मसलों पर लगातार चर्चा हो रही है. इसकी वजह विशुद्ध रूप से चुनाव है. लेकिन इसके बावजूद अगर देश के इतने राज्यों में आदिवासी चर्चा का विषय बन रहा है तो यह देश के राजनीतिक विमर्श में बदलाव का संकेत हो सकता है. 

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