सुप्रीम कोर्ट ने कहा – अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अत्याचार अतीत की बात नहीं

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा-15ए में जमानत, पैरोल, आरोपमुक्तआदि के संबंध में पीड़ितों को समय पर नोटिस देने का महत्वपूर्ण प्रावधान है जो जाति-आधारित अत्याचारों, गवाहों और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करते हैं.

0
572

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर अत्याचार अतीत की बात नहीं है. इसलिए इनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के उपायों के रूप में संसद के बनाए गए कानून के प्रावधानों का सतर्कतापूर्वक अनुपालन किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की. इस आदेश में हत्या के एक मामले में एक आरोपी को जमानत दी गई थी. मामले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दंडनीय अपराधों को भी जोड़ा गया था.

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि मामले में एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन था और हाईकोर्ट ने जमानत याचिका पर विचार करते हुए शिकायतकर्ता को कानून की धारा 15ए के प्रावधानों के तहत नोटिस जारी नहीं किया था.

पीठ ने अपने फैसले में कहा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार अतीत की बात नहीं है. यह आज भी हमारे समाज में एक वास्तविकता बनी हुई है. इसलिए इनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के उपायों के रूप में संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों का सतर्कतापूर्वक अनुपालन किया जाना चाहिए और ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए.

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 15ए पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों से संबंधित है और इसकी उप-धाराएं (3) और (5) विशेष रूप से पीड़ित या उनके आश्रित को आपराधिक कार्रवाई में एक सक्रिय हितधारक बनाती है.

पीठ ने कहा फिलहाल मामले में धारा 15ए की उप-धारा (3) और (5) में निहित वैधानिक आवश्यकताओं का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है. पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 15ए में अहम प्रावधान हैं जो जाति-आधारित अत्याचारों के पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों की रक्षा करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जाति-आधारित अत्याचारों के कई अपराधी खराब जांच और अभियोजन की लापरवाही के कारण मुक्त हो जाते हैं. इसके परिणामस्वरूप एससी/एसटी अधिनियम के तहत सजा की दर कम होती है जिससे इस गलत धारणा को बल मिलता है कि दर्ज मामले झूठे हैं और इसका दुरूपयोग हो रहा है.

पीठ ने कहा मौजूदा मामले में यह स्पष्ट है कि नोटिस और सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन किया गया है. पीठ ने कहा कि जमानत देने के हाईकोर्ट के आदेश में कोई तर्क नहीं है और ऐसे आदेश पारित नहीं हो सकते.

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर अपने छोटे भाई की हत्या के संबंध में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराने वाले व्यक्ति की ओर से दायर अपील की अनुमति देते हुए कहा कि आरोपी को सात नवंबर या उससे पहले आत्मसमर्पण करना होगा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here