आदिवासी भाषाओं पर विलुप्त होने का ख़तरा, बचाने के लिए उठाने होंगे ठोस क़दम

भारत में किसी व्यक्ति का एक से ज़्यादा भाषाएं बोलना और समझना आम बात है. संविधान के आठवें शेड्यूल में भले ही सिर्फ़ 22 आधिकारिक भाषाएं हों, लेकिन देश में क़रीब 20 हज़ार भाषाएं बोली जाती हैं.

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पूर्वोत्तर भारत की कई आदिवासी भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र में क़रीब 300 भाषाओं हैं, जिनमें से 70 से 80 जल्दी ही लुप्त हो सकती हैं.

आधिकारिक तौर पर भारत में 187 भाषाओं पर लुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है, जिनमें से 64 पूर्वोत्तर राज्यों की हैं.

एक अध्ययन के मुताबिक़ अरुणाचल प्रदेश में लगभग 40 भाषाएं, और असम की 15-20 भाषाओं की स्थिति ऐसी है.

बात सिर्फ़ पूर्वोत्तर तक सीमित नहीं है. देश के दूसरे हिस्सों में भी आदिवासियों की मातृभाषाएं संकट में हैं, और कई जगह इन्हें बचाने के लिए कुछ काम हो रहा है.

तमिलनाडु में आदिवासी भाषाओं को बचाने की कोशिश हो रही है

केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति (New Education Policy – NEP) से स्थानीय और मातृभाषाओं के लिए कुछ उम्मीद बंधी है. लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे कैसे लागू किया जाएगा.

इस साल 21 फ़रवरी को जब अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया, उसकी थीम थी ‘शिक्षा और समाज में समावेश के लिए मल्टीलिंगुअलिस्म को बढ़ावा’.

भारत में किसी व्यक्ति का एक से ज़्यादा भाषाएं बोलना और समझना आम बात है. संविधान के आठवें शेड्यूल में भले ही सिर्फ़ 22 आधिकारिक भाषाएं हों, लेकिन देश में क़रीब 20 हज़ार भाषाएं बोली जाती हैं.

लेकिन दिक़्क़त यह है कि इनमें से कई भाषाओं का इस्तेमाल सिर्फ़ पारंपरिक अनुष्ठानों तक ही सीमित है.

कई भाषाओं का इस्तेमाल पूजा-पाठ तक सीमित है

आदिवासियों की बात करें तो, मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज के संपर्क में आने पर उनकी दूसरी आदतों के साथ-साथ उनकी भाषाओं पर भी असर पड़ता है.

ज़ाहिर सी बात है कि आधुनिक समाज से मेलजोल बढ़ने से आदिवासियों की पहचान कहीं न कहीं पीछे छूट जाती है. ख़ासतौर पर युवा पीढ़ी पर भाषा और संस्कृति को संजो कर रखने का बड़ा दबाव होता है.

ऐसे में कई भाषाएं केवल प्रार्थना के दौरान या सांस्कृतिक प्रथाओं को निभाते समय बोली जाने लगती हैं, इनका रोज़मर्रा के जीवन में इस्तेमाल नहीं होता, और धीरे-धीरे ये ख़त्म हो जाती हैं.  

किसी भी भाषा को ज़िंदा रखने के लिए उसका बोला जाना ज़रूरी है. भारत जैसे विविधता भरे देश में, हर थोड़ी दूरी पर भाषा, या उसको बोलने का तरीक़ा बदल जाता है. ऐसे में ज़रूरत है भाषा को जिंदा रखने के निरंतर प्रयास की, आम लोगों और सरकार, दोनों द्वारा.

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