झारखंड के गुमला जिले से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. सड़क की सुविधा न होने के कारण एक गर्भवती आदिवासी महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की जान चली गई.
इस दर्दनाक घटना की वजह इस इलाके में मोटर चलने लायक सड़क न होने के कारण इलाज में देरी थी.
मृतका की पहचान गुमला ज़िले के घाघरा ब्लॉक की दिरगांव पंचायत के दूरदराज के झलकपत गांव (Jhalakapat village) के जगन्नाथ कोरवा की पत्नी सुकरी कुमारी (Sukri Kumari) के रूप में हुई है.
दरअसल, रविवार (14 दिसंबर, 2025) को सुकरी की हालत बिगड़ने लगी और गांव तक एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाई.
इसलिए उसके परिवार वाले अपनी जान जोखिम में डालकर क्योंकि यह एक ऊबड़-खाबड़, पहाड़ी और नक्सल प्रभावित इलाका है. उसे झलकपत स्थित उसके घर से पहाड़ी रास्ते से होते हुए एक किलोमीटर से ज़्यादा दूर करसिली गांव तक कंधे पर उठाकर डोली (बांस की बनी अस्थायी स्ट्रेचर) से ले गए.
करसिली पहुंचने के बाद महिला को ‘ममता वाहन’ मिला, जिसमें उसे घाघरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया.
शुरुआती इलाज के बाद डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर होने के कारण उसे तुरंत गुमला सदर अस्पताल रेफर कर दिया.
इलाज के लिए संघर्ष और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण सुकरी कुमारी की सदर अस्पताल पहुंचने के तुरंत बाद मौत हो गई.
गुमला के सिविल सर्जन, डॉ. शंभू नाथ चौधरी ने कहा कि सुकरी कुमारी की जान मेडिकल सहायता मिलने में देरी के कारण गई.
सिविल सर्जन ने कहा, “अगर उसे कुछ घंटे पहले CHC में मेडिकल सहायता मिल जाती तो शायद उसकी जान बच सकती थी. पहाड़ों पर बसे उसके गांव का रास्ता बहुत मुश्किल है, जहां ममता वाहन नहीं पहुंच सकता था.”
सिविल सर्जन के मुताबिक, मेडिकल भाषा में महिला की मौत का कारण ‘प्रेग्नेंसी से जुड़ा हाइपरटेंसिव डिसऑर्डर’ था, लेकिन मौत का असली कारण मेडिकल सहायता मिलने में देरी है.
सिविल सर्जन ने कहा, “सुबह 2:39 बजे स्थानीय सहिया दीदी को कॉल आया और 2:44 बजे कॉल सेंटर को कॉल आया. सुबह 3:15 बजे ममता वाहन मौके पर पहुंचा. लेकिन महिला को करसिली में इंतजार कर रहे ममता वाहन तक पहुंचने में कई घंटे लग गए, जो उसके गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर था.”
उन्होंने बताया कि सुकरी सिर्फ 17 साल की थी, और यह उसकी पहली प्रेग्नेंसी थी.
वहीं गांव वालों के मुताबिक, आज़ादी के लगभग 78 साल बाद भी झलकपत गांव में सड़क नहीं है. मॉनसून और बारिश के मौसम में हालात और भी खराब हो जाते हैं क्योंकि गांव पूरी तरह से कट जाता है. जिससे स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और रोज़गार तक पहुंच लगभग नामुमकिन हो जाती है.
दिरगांव पंचायत के तहत आने वाला झलकपाट गांव एक बहुत ही दूरदराज इलाके में माओवादी प्रभावित जगह है.
गांव में न सिर्फ सड़क कनेक्टिविटी की कमी है बल्कि नियमित बिजली, भरोसेमंद संचार सुविधाएं और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की भी कमी है. इसके अलावा रोज़गार के मौके गांव वालों के लिए लगभग नामुमकिन हैं.
गांव वालों का दावा है कि वे कई सालों से सड़क की मांग कर रहे हैं लेकिन उन्हें सिर्फ़ झूठे वादे मिले हैं. उनका आरोप है कि विकास योजनाएं सिर्फ़ कागज़ों पर ही रह गई हैं. यहां तक कि बच्चों को भी पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है.
साल 2025 में भी झारखंड के गुमला जिले के इन गांव वालों के लिए बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाना एक बहुत मुश्किल काम है.

