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छत्तीसगढ़: आदिवासी संगठन ने सरकारी आयोजनों में ‘पंडुम’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के सर्व आदिवासी समाज ने सरकारी और निजी आयोजनों, मेलों, प्रदर्शनियों और अभियानों में ‘गोंडी’ शब्द ‘पंडुम’ – जिसका शाब्दिक अर्थ उत्सव है…उसके उपयोग पर आपत्ति जताई है.

संगठन ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इसे तत्काल प्रतिबंधित करने की मांग की है.

सर्व आदिवासी समाज का कहना है कि इसका इस्तेमाल आदिवासी आस्था के मूल तत्व को बिगाड़ता है और उसका कमर्शियलाइज़ेशन करता है, जबकि यह गांव के देवी-देवताओं की खास धार्मिक सेवा और पूजा के तरीके को बताता है.

समाज के प्रतिनिधियों ने कहा, “इसे सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों का टाइटल बनाना हमारी धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और जीवन शैली के खिलाफ है.”

पिछले साल सरकार ने लोगों को आदिवासी कला और संस्कृति में हिस्सा लेने के लिए एक सालाना फेस्टिवल ‘बस्तर पंडुम’ शुरू किया था.

राज्यपाल रमन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साई को संबोधित तीन पन्नों के ज्ञापन में सर्व आदिवासी समाज (बस्तर संभाग) ने सरकारी और निजी कार्यक्रमों के नामों में “पंडुम” शब्द के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है.

सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा, “पंडुम किसी त्योहार, प्रदर्शनी, कार्यक्रम या प्रचार अभियान का शब्द नहीं है. आदिवासी समुदायों में पंडुम का मतलब गांव के देवी-देवताओं की एक खास धार्मिक सेवा और पूजा पद्धति है.”

आदिवासी संगठन ने इस ज्ञापन की प्रतियां आदिवासी कल्याण और गृह विभागों के साथ-साथ बस्तर संभाग के सभी सात जिलों – बस्तर, कोंडागांव, कांकेर, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा के कलेक्टरों और जिला पंचायत सीईओ को भी भेजी हैं.

पंडुम पूजा है, त्योहार का नाम नहीं’

अपनी बात समझाते हुए समाज का कहना है कि गोंडी परंपरा में पंडुम एक पवित्र प्रक्रिया है. यह गांव और परिवार के देवी-देवताओं की पूजा का एक अनुष्ठान है, जो एक निश्चित स्थान पर, निश्चित तारीख और समय पर, समुदाय के तय सदस्यों द्वारा किया जाता है.

ज्ञापन के मुताबिक, पंडुम में देवी-देवता को फल और फूल जैसे जंगल और खेत के उत्पाद चढ़ाए जाते हैं, साथ ही गांव की सुरक्षा और भलाई के लिए सामूहिक प्रार्थना की जाती है.

यह इस प्रथा को समुदाय के “प्राचीन धार्मिक विश्वास, सामूहिक चेतना और पारंपरिक जीवन-प्रक्रिया” का एक अभिन्न अंग बताता है.

पत्र में कहा गया है, “इस संदर्भ में ऐसे कार्यक्रमों के लिए ‘पंडुम’ शब्द का वर्तमान उपयोग असंवैधानिक है और हमारे धार्मिक विश्वास पर हमला है.”

यह तर्क देते हुए कि ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी भी पारंपरिक शब्द या अनुष्ठान प्रक्रिया का उपयोग सरकारी कार्यक्रमों के लिए नहीं किया जाना चाहिए.

राजनीतिक रंग

इस विवाद ने राज्य सरकार की “बस्तर पंडुम” पहल को सीधे जांच के दायरे में ला दिया है.

अब जब यह ज्ञापन सार्वजनिक हो गया है तो यह मुद्दा एक तीखा राजनीतिक रंग लेने लगा है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा सरकार पर धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण आदिवासी शब्द का दिखावे और प्रचार के लिए “दुरुपयोग” करने का आरोप लगाया है.

यह आरोप लगाते हुए कि “फंड पर नियंत्रण करने के बाद सरकार अब शब्दों पर भी नियंत्रण करना चाहती है.”

दूसरी ओर, सरकारी सूत्रों का कहना है कि बस्तर पंडुम जैसे कार्यक्रम आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने और उसका जश्न मनाने के लिए बनाए गए थे, भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं और प्रशासन बातचीत के लिए तैयार है.

हालांकि, अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक जवाब जारी नहीं किया गया है.

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