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तमिलनाडु के इस गांव में आदिवासी बच्चे आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित, कुपोषण के मामले बढ़ रहे

कई परिवार प्लास्टिक ट्रेडिंग से मिलने वाली दिहाड़ी पर निर्भर हैं. जबकि कुछ लोग रोज़गार के अवसरों की कमी के कारण भीख मांगने पर मजबूर हो गए हैं.

तमिलनाडु के मयिलाडुतुरै ज़िले के सिरकाझी तालुक में 100 से ज़्यादा आदिवासी परिवारों को कई महीनों से आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित रखा गया है. जिससे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है.

अरसूर ग्राम पंचायत में जे.जे. नगर की प्रभावित बस्ती में हिंदू अथियान समुदाय (Hindu Athiyan community) के 110 परिवारों का घर है, जिसमें करीब 150 बच्चे हैं.

समुदाय के अनुमानों के मुताबिक, 28 बच्चे दो साल से कम उम्र के हैं, 10 बच्चे 3-5 साल के आयु वर्ग के हैं और 119 बच्चे 5 से 18 साल के बीच के हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले साल मार्च से सभी आंगनवाड़ी सेवाएं अचानक बंद कर दी गईं. जब आंगनवाड़ी के पास एक तीन साल की बच्ची के साथ मारपीट हुई थी, जिसके लिए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी.

इस संबंध में स्थानीय और जिला अधिकारियों को उनकी बार-बार की गई याचिकाएं बेकार गईं.

एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना के तहत आंगनवाड़ी केंद्रों को 6 साल से कम उम्र के बच्चों को पूरक पोषण, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए घर ले जाने वाला राशन, 3 से 6 साल के बच्चों के लिए प्री-स्कूल गैर-औपचारिक शिक्षा, और स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य है.

साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के समन्वय से टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और रेफरल सेवाओं की सुविधा प्रदान करना भी शामिल है.

महिलाओं ने द हिंदू को बताया कि जो बच्चे पहले अंडे, सथुमावु (पोषक तत्वों से भरपूर मिश्रण) और पका हुआ खाना खाते थे, उन्हें अब ये नहीं मिल रहा है. प्री-स्कूल शिक्षा और घर ले जाने वाला राशन बंद हो गया है.

बस्ती की एक निवासी और 13 साल के लड़के की मां नागावली के. ने कहा, “पहले हमें नियमित रूप से बुलाया जाता था और अंडे और पोषण मिश्रण दिया जाता था. अब कोई बातचीत नहीं होती. सब कुछ बंद हो गया है.”

वहीं भुवनेश्वरी ए., जिनकी एक साल की बेटी है और प्लास्टिक बेचकर गुज़ारा करती हैं. उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी सहायता बंद होने से समुदाय की पहले से ही नाज़ुक आर्थिक स्थिति और खराब हो गई है.

उन्होंने कहा, “पहले कुछ पौष्टिक खाना मिलता था जिससे हमें गुज़ारा करने में मदद मिलती थी. अब खाना अपर्याप्त है और आय अनियमित है.”

कुपोषण के संकेत

कई निवासियों ने बताया कि बस्ती के बच्चों में कुपोषण के साफ संकेत दिख रहे हैं.

12 और 15 साल के दो लड़कों की मां वेलामल आर. ने कहा कि दोनों अपनी उम्र से बहुत छोटे दिखते हैं.

उन्होंने कहा, “वे पांच साल और आठ साल के लड़कों जैसे दिखते हैं. जिन दिनों काम मिलता है, उन दिनों हम मुश्किल से 500 रुपये कमा पाते हैं. पौष्टिक खाना खरीदना नामुमकिन है.”

कई परिवार प्लास्टिक ट्रेडिंग से मिलने वाली दिहाड़ी पर निर्भर हैं. जबकि कुछ लोग रोज़गार के अवसरों की कमी के कारण भीख मांगने पर मजबूर हो गए हैं.

इलाके में काम करने वाले एक्टिविस्ट्स ने कहा कि सरकारी सिस्टम के ज़रिए रूटीन हेल्थ मॉनिटरिंग के दौरान बस्ती में पोषण की कमी दर्ज की गई है.

जबकि हेल्थ वर्कर्स के ज़रिए वैक्सीनेशन और एंटीनेटल सर्विस जारी हैं, निवासियों ने कहा कि पोषण सहायता, जो आंगनवाड़ी केंद्रों का मुख्य काम है, रोक दी गई है.

वनविल ट्रस्ट की संस्थापक प्रेमा रेवती, जो समुदाय के साथ काम करने वाली एक NGO हैं, उन्होंने कहा, “नियमित स्वास्थ्य दौरों के दौरान इकट्ठा किए गए सबूत-आधारित डेटा से पता चलता है कि यहां के बच्चे पोषण के मामले में कमजोर हैं. ICDS के फायदे न देने से स्थिति और खराब होगी.”

इसके अलावा निवासियों ने इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी की ओर इशारा किया, जैसे कि सही सड़कें और स्कूल तक लगातार पहुंच न होना, जिससे उनमें सामाजिक बहिष्कार की भावना और गहरी हो गई है.

संपर्क करने पर ज़िला स्तर के एक वरिष्ठ ICDS अधिकारी ने द हिंदू को बताया कि वे इस मामले को देखेंगे.

तमिलनाडु में आदिवासी बच्चों में कुपोषण

तमिलनाडु में आदिवासी बच्चों में कुपोषण एक गंभीर समस्या बनी हुई है, खासकर दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों जैसे नीलबगिरि और धरमपुरी में.

हालिया आंकड़े

राज्य में कुल आंगनवाड़ी बच्चों में से करीब 43 हज़ार से अधिक कुपोषित हैं, जिनमें आदिवासी बच्चे असमानुपातिक रूप से प्रभावित हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु में कुल 1.78 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिसमें आदिवासी समुदायों का बड़ा हिस्सा शामिल है. ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में 5 वर्ष से कम उम्र के 440 बच्चों पर किए गए अध्ययन में आहार संबंधी कमियों का उच्च स्तर पाया गया.

आदिवासी बस्तियों तक सेवाओं की पहुंच न होना, आर्थिक पिछड़ापन और जागरूकता की कमी कुपोषण के मामले बढ़ने के प्रमुख कारण हैं. कुपोषण से स्टंटिंग, कम वजन और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं.

(Representative image)

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