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महाराष्ट्र के आदिवासी स्वास्थ्य संकट पर HC ने सरकार को फटकारा

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ये टिप्पणियां एक बार फिर महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में गरीबी, लिंग, कम उम्र में शादी और कमज़ोर स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे के बीच संबंध को उजागर करती हैं.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में कुपोषण से लगातार हो रही मौतों को लेकर राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की है. कोर्ट ने कहा कि बार-बार चेतावनी और न्यायिक जांच के बावजूद इस संकट से निपटने के लिए सरकारी प्रयास “बहुत कम” हैं.

आदिवासी इलाकों, खासकर मेलघाट में शिशुओं, बच्चों और गर्भवती महिलाओं की मौतों को उजागर करने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कुपोषण कोई अलग-थलग समस्या नहीं बल्कि एक सिस्टम की नाकामी है.

HC बेंच ने क्या कहा

जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और संदेश पाटिल की बेंच ने कहा कि ऐसी मौतों का लगातार होना पोषण, हेल्थकेयर तक पहुंच और सोशल वेलफेयर डिलीवरी में गहरी प्रशासनिक कमियों की ओर इशारा करता है.

बेंच राजेंद्र सदानंद बर्मा और एक अन्य याचिकाकर्ता द्वारा 2007 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि “जून 2025 से अब तक 0 से 6 महीने के करीब 65 बच्चों की कुपोषण के कारण मौत हो गई है.”

जजों ने कहा कि पार्टियों ने कुपोषण से निपटने के कदमों पर एक जॉइंट रिपोर्ट सबमिट नहीं की है. जबकि 29 जुलाई, 2025 के पहले के आदेश में उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया गया था.

कोर्ट के सामने रखी गई जानकारी के मुताबिक, प्रभावित इलाकों में हाल के महीनों में शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की 115 से ज़्यादा मौतें हुई हैं. जबकि राज्य सरकार ने कुछ मौतों का कारण “कई कारण” बताया.

ऐसे में हाई कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि कुपोषण को सेकेंडरी फैक्टर के तौर पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

जजों ने कहा कि इन इलाकों में कई महिलाओं की शादी कम उम्र में हो जाती है, कभी-कभी तो 13 या 14 साल की उम्र में ही, और उन्हें बार-बार प्रेग्नेंसी, एनीमिया और अच्छी हेल्थकेयर सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है.

समय से पहले डिलीवरी और उससे जुड़ी मेडिकल दिक्कतें इन जोखिमों को और बढ़ा देती हैं.

लापरवाही के सबूत

याचिकाकर्ताओं के 16 अक्टूबर, 2025 के हलफनामे में बताया गया है कि चिखलदरा में रायपुर सब-सेंटर तीन महीने तक बंद रहा, जिसके कारण सुगति घोडे की मौत हो गई, क्योंकि उन्हें समय पर इलाज नहीं मिल पाया.

वहीं हाथरस गांव में एक बच्चे का जन्म आधी रात को मोबाइल फोन की टॉर्च की रोशनी में हुआ क्योंकि बिजली नहीं थी और कोई मेडिकल मदद भी नहीं थी.

एक और महिला, रूपाली धांडे की, जो सात महीने की गर्भवती थी, घर पर बिना किसी मदद के डिलीवरी के बाद धरनी अस्पताल जाते समय रास्ते में मौत हो गई.

बैरागढ़ और धरनी के बीच की सड़कों की हालत इतनी खराब बताई गई कि एक महिला को रास्ते में ही लेबर पेन शुरू हो गया और उसने गड्ढों से हिलती हुई गाड़ी में ही बच्चे को जन्म दिया.

याचिकाकर्ताओं ने इस क्षेत्र में काम कर रहे NGO सिस्टम में भी गहरी अनियमितताओं की ओर इशारा किया है.

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि आधिकारिक रिकॉर्ड में 380 NGO लिस्टेड हैं, लेकिन असल में मुश्किल से 20 ही काम कर रहे हैं. जिससे निगरानी और फंड के संभावित दुरुपयोग के बारे में गंभीर सवाल उठते हैं.

उन्होंने तर्क दिया कि बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को खराब होने दिया गया है… करीब 60 प्रतिशत सड़कें बनी हैं और ज़्यादातर सड़कों का पिछले लगभग दो दशकों से रखरखाव नहीं हुआ है.

ज़रूरी हेल्थकेयर सुनिश्चित करने में राज्य की नाकामी को लेकर कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल की बार-बार दी गई चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया गया है, जबकि विधानसभा में दिए गए आश्वासन पूरे नहीं किए गए हैं.

दिसंबर 2001 में धरनी में एक अल्ट्रा-मॉडर्न अस्पताल बनाने का कोर्ट का निर्देश भी अभी तक लागू नहीं हुआ है.

यह सिस्टम की नाकामियों की एक पूरी चेन को सामने लाता है.

कोयलारी और पासडोंगरी में बिजली कटने के बाद पानी की सप्लाई स्कीम फेल होने से दूषित पानी पीने से बारह लोगों की जान चली गई.

इन मौतों की रिपोर्ट आने के बाद भी करीब 365 गांव बिना बिजली के रह रहे हैं. वहीं हेल्थ सेंटर में लगाए गए सोलर यूनिट लगभग पांच महीनों से खराब पड़े हैं.

एफिडेविट में पब्लिक हेल्थ में लगातार कम निवेश की बात भी कही गई है, जिसमें बताया गया है कि महाराष्ट्र अपनी इनकम का सिर्फ़ 0.4 प्रतिशत हेल्थकेयर पर खर्च करता है और प्रति व्यक्ति खर्च 2019 के 975 रुपये से घटकर 2024-25 में और भी कम हो गया है.

स्टाफ़ की कमी ने हेल्थकेयर सिस्टम को और भी कमज़ोर कर दिया है. करीब 60 प्रतिशत प्राइमरी हेल्थ सेंटर बिना रेगुलर डॉक्टरों के काम कर रहे हैं, जबकि मेडिकल ऑफिसर और फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर के मंज़ूर पद खाली पड़े हैं.

स्पेयर पार्ट्स और फंड की कमी के कारण मोबाइल मेडिकल वैन बेकार पड़ी हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं.

महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं

गर्भवती महिलाओं को सपोर्ट देने के लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाएं, जिनमें मातृत्व अनुदान योजना भी शामिल है. पिछले पांच सालों से पेमेंट जारी करने में फेल रही हैं, जिससे अनुमानित 250-300 महिलाओं को मदद नहीं मिल पाई है.

एफिडेविट में यह भी बताया गया है कि 2017 से पोषण अभियान के तहत 5 हज़ार करोड़ जारी किए गए हैं. लेकिन राज्य ने सिर्फ़ आधे फंड का ही इस्तेमाल किया है और नीति आयोग ने बार-बार लागू करने में गंभीर कमियों की ओर इशारा किया है.

महाराष्ट्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि सभी मौतें सीधे कुपोषण से नहीं हुई थीं और कोई बीमारी, सामाजिक रीति-रिवाजों और इलाज में देरी जैसे कारणों का हवाला दिया.

हालांकि, बेंच ने सवाल किया कि दशकों से योजनाओं और नीतियों के बावजूद, आदिवासी इलाकों में कुपोषण से जुड़ी रोकी जा सकने वाली मौतें क्यों हो रही हैं.

कोर्ट ने कहा कि कुपोषण के मूल कारणों की पहचान करना और ICDS, मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों और पोषण सहायता जैसी कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई नहीं रह सकता.

संकट के बार-बार होने पर चिंता जताते हुए, हाई कोर्ट ने राज्य से मौजूदा उपायों के विफल होने के कारणों का गहन मूल्यांकन करने और आगे होने वाली मौतों को रोकने के लिए तत्काल, ठोस कदम उठाने का आग्रह किया.

इसने यह भी संकेत दिया कि अगर हालात नहीं सुधरते हैं तो लगातार न्यायिक निगरानी की ज़रूरत पड़ सकती है.

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ये टिप्पणियां एक बार फिर महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में गरीबी, लिंग, कम उम्र में शादी और कमज़ोर स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे के बीच संबंध को उजागर करती हैं.

कोर्ट ने आंगनवाड़ी सेवाओं के तहत पोषण के लिए आवंटित फंड की खास तौर पर आलोचना की और इस प्रावधान को बहुत अपर्याप्त बताया.

राज्य के हलफनामे में बताए गए आंकड़ों का जिक्र करते हुए, बेंच ने कहा कि 2017 में आखिरी बार संशोधित आवंटन “बहुत कम” था और इसमें तुरंत संशोधन और बढ़ोतरी की ज़रूरत है.

जजों ने प्रशासन की ओर से गंभीरता की कमी पर भी निराशा जताई. उन्होंने कहा कि सालों से कोर्ट के कई निर्देशों के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर बहुत कम बदलाव हुआ है.

इसे देखते हुए, बेंच ने आदिवासी मामलों, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वित्त, महिला एवं बाल विकास और लोक निर्माण विभागों के प्रधान सचिवों को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया.

जन स्वास्थ्य अभियान के सह-संयोजक डॉ. अभय शुक्ला ने कहा कि यह मामला जागरूकता की कमी के बजाय एक गहरी सिस्टम की विफलता को दिखाता है.

उन्होंने कहा, “यह मामला लगभग एक दशक से कोर्ट में है. अगर आप वही काम, उन्हीं संसाधनों और उसी तरीके से करते रहते हैं और अलग नतीजों की उम्मीद करते हैं, तो यही पागलपन की परिभाषा है.”

उन्होंने बताया कि बार-बार दिए गए अदालती निर्देशों का ज़मीन पर कोई खास असर नहीं हुआ है.

कोर्ट सरकार से ‘सही तरीके से काम करने’ के लिए कहता रहता है लेकिन सिस्टम पहले की तरह ही काम करता रहता है. जब तक सिस्टम ही नहीं बदलेगा, नतीजे कैसे बदलेंगे? यह सुधार की गंभीर कोशिश के बजाय सिर्फ एक प्रक्रिया बनकर रह गया है.

उन्होंने कहा, “कुपोषण को कम करने के लिए आज़माए हुए तरीके मौजूद हैं, यहां तक कि महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में भी. ऐसा ही एक मॉडल है कम्युनिटी एक्शन फॉर न्यूट्रिशन, जिसे राज्य भर के 400 आदिवासी गांवों में लागू किया गया है. इससे आठ से नौ महीनों में गंभीर कुपोषण में 50 प्रतिशत की कमी आई.”

उन्होंने आगे कहा कि इस दखल का टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने इंडिपेंडेंट मूल्यांकन किया है और राज्य सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया है. सबूत मौजूद हैं, तरीका मौजूद है, और संसाधन भी मौजूद हैं. सरकार ने इसे पायलट बेसिस पर लागू भी किया है. फिर भी इसे बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया है

शुक्ला ने कहा, “हम जो देख रहे हैं, वह समाधानों की कमी नहीं है, बल्कि सिस्टम में बदलाव को लागू करने से इनकार है. जमीनी स्तर पर सिविल सोसाइटी संगठन मेलघाट में काम करने के लिए तैयार और सक्षम हैं. लेकिन उन्हें सरकारी मदद और बिल्कुल अलग अप्रोच की ज़रूरत है.”

अपने अनुभव से उन्होंने आगे कहा, “सिर्फ़ स्टडीज़ के आधार पर नहीं बल्कि दखल के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि मेलघाट में कुपोषण को एक साल के अंदर आधा किया जा सकता है. ऐसा करने के लिए ज़रूरी सब कुछ पहले से ही उपलब्ध है. जो कमी है, वह सिस्टम को बदलने की इच्छाशक्ति की है.”

जैसे ही यह मामला आगे की सुनवाई के लिए कोर्ट में वापस आता है, सबकी नज़र इस बात पर टिकी है कि क्या महाराष्ट्र सरकार न्यायिक चेतावनियों को सार्थक कार्रवाई में बदल पाएगी. इससे पहले कि रोकी जा सकने वाली मौतों का एक और सिलसिला इस मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ले आए.

(Representative image)

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