देश की ज़िला और निचली अदालतों में 14.15 फीसदी दलित, 5.12 फीसदी आदिवासी और 26.64 फीसदी OBC जज हैं. लेकिन आँकड़ों से पता चलता है कि देश के बाकी हिस्सों की तुलना में दक्षिण भारत में, खासकर तमिलनाडु और कर्नाटक में जजों में विविधता ज़्यादा है.
इससे पता चला कि हाई कोर्ट की तुलना में ज़िला और निचली अदालतों में ज़्यादा प्रतिनिधित्व है. जहां साल 2018 से हुई नियुक्तियों में 847 जजों में से सिर्फ़ 3.89 फीसदी दलित, 2 फीसदी आदिवासी और 12.27 फीसदी OBC थे.
ये आंकड़े कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने RJD के सीनियर सांसद मनोज के झा को एक लिखित जवाब में दिए.
उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की निचली अदालतों में भी इन वर्गों का अच्छा प्रतिनिधित्व है. जबकि संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल और अंडमान निकोबार द्वीप समूह की निचली अदालतों में SC, ST और OBC जज “शून्य” हैं.
दक्षिण भारत राज्यों में SCs, STs और OBC जजों का प्रतिनिधत्व अधिक
आंकड़ों के मुताबिक, 21 जनवरी तक जिला और अधीनस्थ अदालतों के 20 हज़ार 833 जजों में से 45.76 प्रतिशत यानि 9 हज़ार 534 सिविल जज (जूनियर डिवीजन), सिविल जज (सीनियर डिवीजन) और जिला जज SC, ST और OBC समुदायों से हैं.
इनमें से 14.15 फीसदी यानि 2 हज़ार 949 एससी जज, 5.12 फीसद यानि 1 हज़ार 68 एसटी जज और 26.64 फीसदी यानि 5 हज़ार 517 जज OBC हैं.
बड़े राज्यों में तमिलनाडु में इन श्रेणियों से 97.65 फीसदी (1,234 में से 1,205) जज हैं यानि 20.66 फीसदी (255) जज अनुसूचित जाति समुदाय से हैं, वहीं 1.21 फीसदी (15) जज अनुसूचित जनजाति समुदाय से हैं और 75.76 फीसदी (935) जज ओबीसी समुदाय से हैं.
कर्नाटक में 1129 जिला और अधीनस्थ अदालत के जजों में से 88.82 प्रतिशत यानि 996 जज एससी, एसटी और OBC थे.
राज्य में दलित जजों की संख्या 226 (20.01%) थी और आदिवासी जजों की संख्या 47 (4.16%) थी, जबकि OBC जज 733 (64.92%) थे.
दूसरे दक्षिण भारतीय राज्य – आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल ने भी निचली अदालतों में प्रतिनिधित्व के मामले में अच्छा प्रदर्शन किया.
केरल में OBC जजों की संख्या 50.60 प्रतिशत थी, जबकि दलित 7.45 प्रतिशत और आदिवासी 0.69 प्रतिशत थे.
वहीं आंध्र प्रदेश में 38.98 फीसदी ओबीसी जज, 18.88 फीसदी दलित जज और 5.59 फीसदी आदिवासी जज थे और तेलंगाना में 44.71 फीसदी ओबीसी जज, 15.28 फीसदी दलित और 8.98 फीसदी आदिवासी जज थे.
UP, बिहार, महाराष्ट्र और MP में निचली अदालतों में प्रभावशाली प्रतिनिधित्व
अगर उत्तर भारत के राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में 2 हज़ार 640 जजों में से 53.56 प्रतिशत यानि 1414 जज इन तीन समुदायों के थे. 534 जज दलित समुदाय, 38 जज आदिवासी समुदाय से और 842 जज ओबीसी समुदाय से थे.
बिहार में जिला और अधीनस्थ अदालतों में 253 यानि 20.01 प्रतिशत दलित जज हैं, जबकि आदिवासियों के लिए यह आंकड़ा 0.84 यानि 14 जज आदिवासी हैं और 28.76 प्रतिशत यानि 479 जज ओबीसी थे.
बिहार के जिलों में 1,665 जजों में से 746 जज SC, ST और OBC समुदायों के थे.
भले ही देश के कई राज्यों की ज़िला और निचली अदालतों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदाय के जजों का प्रतिनिधित्व है लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट इन समुदायों का प्रतिनिधित्व न के बराबर है.
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज के रूप में केवल उन्हीं लोगों को नियुक्त किया जाता है जिनकी सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम करता है.
वहीं राज्य सरकारें संबंधित हाई कोर्ट के साथ सलाह करके संबंधित राज्य न्यायिक सेवा में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति और भर्ती के संबंध में नियम और कानून बनाती हैं.
सुप्रीम और हाई कोर्ट में SC, ST, OBC जजों का प्रतिनिधित्व क्यों कम है
सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में SC, ST और OBC जजों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है. नियुक्तियों में कोलेजियम सिस्टम के कारण विविधता की कमी बनी हुई है और सरकार ने सामाजिक पृष्ठभूमि का डेटा 2018 से ही ट्रैक करना शुरू किया.
ऐसे ही हाई कोर्ट में SC, ST और OBC जजों का प्रतिनिधित्व निचली अदालतों की तुलना में कम है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 में इन पदों के लिए जाति-आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इसके बजाय नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम सिस्टम के माध्यम से होती है.
नियुक्ति के लिए कोई औपचारिक आरक्षण नहीं है. वहीं कोलेजियम प्रक्रिया के तहत पुराने जज नए जज चुनते हैं, जिससे विविधता प्रभावित होती है. साल 2018-2026 में 847 नियुक्तियों में केवल 4% SC, 2% ST और 12% OBC थे.

