मार्क्सवादी कम्यनिष्ट पार्टी (Communist Party of India (Marxist)) ने आदिवासी भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखने के प्रस्ताव का विरोध किया है. पार्टी का कहना है कि यह कदम आदिवासी समुदायों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है.
दरअसल हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में एक कार्यक्रम के दौरान आदिवासी भाषाओँ के लिए देवनागरी लिपी (Devnagari Script) की पैरवी की थी.
उत्तर क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाई पहचान को बचाने में देवनागरी स्क्रिप्ट मदद कर सकती है.
अमित शाह के इस बयान के बाद से त्रिपुरा सरकार द्वारा जनजातीय भाषाओं—विशेषकर कोकबोरोक—को देवनागरी लिपि में लिखने की पहल पर बहस तेज हो गई है.
फिलहाल कोकबोरोक भाषा रोमन और बंगाली लिपि में लिखी जाती रही है. देवनागरी को अनिवार्य या प्रमुख लिपि के रूप में लागू करने की आशंका ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में असहमति पैदा कर दी है.
माकपा नेताओं का कहना है कि भाषा और लिपि का प्रश्न केवल प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है.
पार्टी के त्रिपुरा सचिव और विधानसभा में नेता विपक्ष जितेंद्र चौधरी का तर्क है कि किसी भी लिपि को ऊपर से थोपने की कोशिश आदिवासी समाज की भावनाओं के खिलाफ होगी. उनका कहना है कि सरकार को इस तरह के निर्णय से पहले व्यापक जनपरामर्श और सभी हितधारकों से चर्चा करनी चाहिए.

त्रिपुरा की जनजातीयों की भाषा कोकबोरोक की देवनागरी लिपि के सवाल पर साहित्य अकादमी के सदस्य और कोकबोरोक भाषा के जानेमाने लेखक बिकाश राय देबबर्मा (Bikashrai Debbarma) ने भी गृहमंत्री अमित शाह के बयान से असहमति प्रकट की है.
MBB से बात करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भाषा की स्क्रिप्ट तय करने का अधिकार उस भाषा को बोलने वालों को ही होता है.
कोकबोरोक की देवनागरी स्क्रिप्ट लागू करने की कोशिशों पर बोलते हुए उन्होंने कहा, ”देखिए, पहली बात यह है कि कॉकबरोक एक टोनल लैंग्वेज है. टोनल लैंग्वेज में टोनल वेरिएशन होता है जहां जहां पर वो वेरिएशन आता है, उसको दिखाने के लिए स्पेस चाहिए. हम लोगों को अलग से स्पेस चाहिए. देवनागरी की जो लेखन पद्धति है, वहां पर वो टोनल मार्क देने के लिए या डायक्रिटिक मार्क देने के लिए कोई जगह ही खाली नहीं मिलता. तो हम लोग अगर देवनागरी स्क्रिप्ट अपनाएं, कॉकबरोक लिखने के लिए वो टोनल मार्क्स हम लोग कैसे इस्तेमाल करेंगे?”

बिकास राय देबबर्मा एक और सवाल पूछते हुए कहते हैं, “कॉकबरोक में एक और मसला है, उसे हम लोग कहते हैं, सेंट्रल हाफ वावल, सेंट्रल हाफ वावल उसका उच्चारण जैसा है, ओ! कथंग, कपाक, वो जो सेंट्रल हाफ वावल का जो साउंड है, इसको हम लोग कैसे दिखाएंगे?”
कोकबोरोक भाषा के संरक्षण और इस्तेमाल पर बात करते हुए वे कहते हैं, “सबसे बड़ी बात यह है कि त्रिपुरा में अभी जो लोग हैं, कॉकबरोक स्पीच कम्युनिटी के जो लोग हैं, जहां पर स्पीच कम्युनिटी का सौ का सौ प्रतिशत लोग रोमन स्क्रिप्ट को यूज कर रहा है, गवर्नमेंट जो भी बोले, स्टेट गवर्नमेंट जो भी करे, उसको करने दो. लेकिन असल में यहां पर जितने भी लोग कॉकबरोक लिख रहे हैं, जितना भी किताबें निकल रहा है और अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट, यह दोनों स्तर पर जितना भी परीक्षाएं होते हैं, सभी रोमन स्क्रिप्ट को इस्तेमाल कर रहे हैं. सो दिस इज द चॉइस ऑफ द पीपल ऑफ द स्पीच कम्युनिटी.”
त्रिपुरा सरकार में बीजेपी की सहयोगी टिपरा मोथा पार्टी भी कोकबोरोक भाषा की देवनागरी स्क्रिप्ट का विरोध करती है. इस सवाल पर पार्टी कई बार सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर चुकी है.

टिपरा मोथा के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि उसके जो मुख्य मुद्दे हैं उनमें से एक आदिवासियों की भाषाई पहचान भी है.

