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एजेंसी इलाकों में गैर-आदिवासी नर्सों की नियुक्ति पर बवाल, कलेक्टर पर मामला दर्ज

अधिसूचना के एक हफ्ते के अंदर आवेदन की स्वीकृति और जांच हो गई, डॉक्यूमेंट चेक हो गए और इंटरव्यू भी हो गए. अब बस चुने गए उम्मीदवारों की घोषणा बाकी है. पहली बार चुने गए जिन 31 उम्मीदवारों ने दोबारा आवेदन किया था, उनमें से किसी का भी चयन नहीं किया गया है.

तेलंगाना के कोठागुडेम की रहने वाली के. रमा देवी एक निजी अस्पताल में नर्सिंग प्रैक्टिशनर हैं और सरकारी नौकरी की तलाश में हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के ‘नर्स प्रैक्टिशनर मिडवाइफरी डिप्लोमा कोर्स’ के तहत जिले में 17 पदों पर वेकेंसी को भरने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण आयुक्त ने 4 अक्टूबर को अधिसूचना जारी की, जिसने उन्हें बहुत खुश किया.

रमा देवी उन 31 उम्मीदवारों में शामिल थीं, जिन्हें 500 आदिवासी आवेदकों में से शॉर्टलिस्ट किया गया था. जिला चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी ने उनकी भर्ती को अंतिम रूप दे दिया था और वे केवल जिला कलेक्टर के साथ एक इंटरव्यू का इंतजार कर रहे थे. इस इंटरव्यू के बाद उनमें से 17 उम्मीदवारों को 18 महीने के लिए प्रशिक्षित होने और फिर आदिवासी इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सेवा करने के लिए शामिल होने का आदेश दिया जाना था.

लेकिन उन्हें तब धक्का लगा जब जिला प्रशासन ने अधिसूचना को रद्द कर दिया और 29 अक्टूबर को एक नई अधिसूचना जारी की. इस दूसरी अधिसूचना से हुआ यह कि अब गैर-आदिवासी भी इन पदों के लिए आवेदन दे सकते थे.

अधिसूचना के एक हफ्ते के अंदर आवेदन की स्वीकृति और जांच हो गई, डॉक्यूमेंट चेक हो गए, और इंटरव्यू भी हो गए. अब बस चुने गए उम्मीदवारों की घोषणा बाकी है. पहली बार चुने गए जिन 31 उम्मीदवारों ने दोबारा आवेदन किया था, उनमें से किसी का भी चयन नहीं किया गया है.

भद्राचलम आईटीडीए, जिला कलेक्टर और जिला चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी को कई बार अभ्यावेदन देने के बाद, इन 31 आदिवासी महिलाओं ने कलेक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.

अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत की गई इस शिकायत में वो कहती हैं कि एजेंसी इलाके में जो उनके अधिकार हैं, वो छीन लिए गए हैं.

रमा देवी ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “दूरदराज के आदिवासी इलाकों में नर्सों को काम पर रखने के पीछे केंद्र की मंशा मातृ मृत्यु दर को कम करना है, जो इन इलाकों में ज्यादा है. स्थानीय भाषा बोलने वाला आदिवासी ही, जो आदिवासी व्यवहार को समझते हैं, भावनात्मक रूप से उनसे जुड़े हैं, वही वहां सेवा कर सकारात्मक नतीजे पा सकता है. कोई गैर-आदिवासी यह कैसे करेगा?”

पहले आई अधिसूचनाओं के अनुसार, आरक्षण के नियम के तहत “अनुसूचित क्षेत्रों में आने वाले पदों के लिए रिक्तियों को विशेष रूप से स्थानीय अनुसूचित जनजाति से ही भरा जाना चाहिए.”

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