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आदिवासी संगठनों ने सोनापुर पावर ट्रांसमिशन लाइन के रूट में बदलाव की मांग की, NH-27 को ब्लॉक करने की धमकी दी

संगठनों का दावा है कि क्षेत्र के आदिवासी परिवारों के पास पहले से ही सीमित पट्टा भूमि है. ऐसे में यदि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भूमि का इस्तेमाल बिना पर्याप्त योजना के किया गया तो कुछ परिवारों के पास भविष्य में अपनी खेती और आजीविका के लिए पर्याप्त भूमि नहीं बचेगी.

असम के 6 आदिवासी संगठनों ने सोनापुर के आदिवासी बहुल इलाके से गुज़रने वाली हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन के प्रस्तावित रूट (अलाइनमेंट) को लेकर 5 अक्टूबर को नेशनल हाईवे-27 (NH-27) को ब्लॉक करने की धमकी दी है.

उनका आरोप है कि चार साल तक अपनी बात रखने के बावजूद उनकी आपत्तियों का कोई समाधान नहीं निकला है.

इन संगठनों ने इस रूट का विरोध इसलिए किया है क्योंकि इससे आदिवासी परिवारों की सीमित पट्टा भूमि और खेती की ज़मीन पर असर पड़ सकता है.

उनका आरोप है कि उनकी आपत्तियों के बावजूद परियोजना का काम जारी है और हाल के दिनों में इसकी गति भी बढ़ गई है.

2022 से सरकार के सामने उठा रहे हैं मुद्दा

सोनापुर के फोंग-आरी में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमरी करबी नेशनल काउंसिल, अमरी करबी स्टूडेंट्स यूनियन और चार अन्य जनजातीय संगठनों के नेताओं ने कहा कि वे साल 2022 से इस मामले को लेकर विभिन्न सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं और कई बार ज्ञापन सौंप चुके हैं.

संगठनों की मुख्य मांग है कि पावर ट्रांसमिशन लाइन का रूट (अलाइनमेंट) बदला जाए, ताकि सामुदायिक और जनजातीय भूमि को नुकसान से बचाया जा सके.

यह मामला 14 सितंबर को तब और बढ़ गया जब सैकड़ों स्थानीय लोग और इन संगठनों के सदस्य डिगारू बाली गेट से डिमोरिया के को-डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर के दफ्तर तक मार्च करते हुए गए. उन्होंने को-डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर के ज़रिए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा.

आदिवासी नेताओं ने कहा कि बाद में अधिकारियों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि प्रभावित समुदायों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए रूट पर फिर से विचार किया जाएगा. हालांकि, संगठनों का आरोप है कि इस आश्वासन के बावजूद जमीन पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है.

अमरी कार्बी नेशनल काउंसिल के अध्यक्ष उपेन एंगती ने कहा, “हम 2022 से एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर जा रहे हैं और कई बार ज्ञापन सौंप चुके हैं. हमें भरोसा दिलाया गया था कि रूट बदला जाएगा लेकिन काम उसी रास्ते पर चल रहा है. अगर हालात बिगड़ने से कानून-व्यवस्था की कोई समस्या पैदा होती है, तो सरकार ज़िम्मेदार होगी.”

अमरी कार्बी स्टूडेंट्स यूनियन के नेता महेंद्र तेरंग ने कहा कि संगठन पावर प्रोजेक्ट के खिलाफ नहीं हैं लेकिन वे चाहते हैं कि आदिवासियों की ज़मीन बचाने के लिए इसका रूट बदला जाए.

उन्होंने कहा, “हम पावर लाइन के खिलाफ नहीं हैं. हमारी मांग सिर्फ़ इतनी है कि इसका रूट बदला जाए ताकि समुदाय के ज़मीन के अधिकारों की रक्षा हो सके. कोई भी मुआवज़ा हमें ऐसा रूट मंज़ूर करने के लिए नहीं मना सकता जो हमारे लोगों के पास मौजूद थोड़ी-बहुत पट्टा ज़मीन को भी बर्बाद कर दे.”

संगठनों ने कहा कि प्रभावित इलाके में मुख्य रूप से कार्बी और अन्य आदिवासी समुदाय रहते हैं जिनकी आजीविका खेती-किसानी पर निर्भर है.

उन्होंने दावा किया कि इलाके में आदिवासी परिवारों के पास बहुत कम पट्टा ज़मीन है और चेतावनी दी कि बिना योजना के बुनियादी ढांचा बनाने से कुछ परिवार ज़मीन से महरूम हो सकते हैं.

नेताओं ने सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि वह आदिवासी समुदायों और किसानों की चिंताओं के बजाय औद्योगिक और पूंजीवादी हितों को ज़्यादा अहमियत दे रही है.

उन्होंने कहा कि यह विवाद मुख्य रूप से मुआवज़े के बारे में नहीं बल्कि ज़मीन के अधिकारों और आजीविका के बारे में है. असम इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड कॉर्पोरेशन लिमिटेड (AEGCL) जिस ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, उसमें 400/220/132/33-kV सोनापुर GIS और उससे जुड़ी हाई-वोल्टेज लाइनें शामिल हैं. ये लाइनें नार्टाप समेत 13 गांवों से होकर गुजरेंगी.

प्रस्तावित रूट (अलाइनमेंट) को लेकर आदिवासी संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि इससे पट्टा वाली ज़मीन और खेती की ज़मीन पर बुरा असर पड़ेगा.

संगठनों का कहना है कि 14 सितंबर का विरोध प्रदर्शन कई सालों तक अपनी बात रखने के बाद किया गया.

उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर रूट नहीं बदला गया, तो वे अपना आंदोलन और तेज़ करेंगे. साथ ही 5 अक्टूबर को NH-27 को ब्लॉक करने का उनका अगला बड़ा कार्यक्रम है.

संगठनों ने फिर से कहा कि वे विकास और बेहतर बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर का समर्थन करते हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि ट्रांसमिशन लाइन का रूट बदला जाए ताकि आदिवासी परिवारों की बची हुई ज़मीन को बचाया जा सके.

(Photo credit: NorthEast Now)

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