छत्तीसगढ़ की गणतंत्र दिवस झांकी, जिसका विषय “वंदे मातरम – स्वतंत्रता का मंत्र” था, उसने गणतंत्र दिवस परेड में कर्तव्य पथ पर सबका ध्यान खींचा क्योंकि इसमें प्रस्तावित “भारत का पहला आदिवासी डिजिटल संग्रहालय” दिखाया गया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आदिवासी प्रतिरोध की विरासत को उजागर किया गया.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्रीय मंत्रियों और विशेष अतिथियों ने झांकी को उत्सुकता के साथ देखा और तालियां बजाकर सराहना की. दर्शक दीर्घा में मौजूद लाखों लोगों ने भी तालियों की गड़गड़ाहट के साथ छत्तीसगढ़ की झांकी का स्वागत किया.
झांकी के समक्ष छत्तीसगढ़ के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक लोक नृत्य ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया.
छत्तीसगढ़ की झांकी में आदिवासी नायकों की एकता, वीरता और ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके अटूट विद्रोह को दिखाया गया.
झांकी के आगे धुरवा समुदाय के महान नेता और 1910 के भूमकाल विद्रोह का चेहरा वीर गुंडाधुर खड़े थे. भूमकाल का मतलब है अन्याय के खिलाफ सामूहिक सभा, जो बड़े पैमाने पर आदिवासी एकता का प्रतीक था.
झांकी में भूमकाल आंदोलन से जुड़े विद्रोह के प्रतीकों – आम के पत्तों की टहनी और सूखी लाल मिर्च, जो लामबंदी और विरोध का प्रतिनिधित्व करते थे, उनको दिखाया गया था.
झांकी के वर्णन में 1910 के विद्रोह के पैमाने का भी उल्लेख किया गया था, जिसमें कहा गया था कि ब्रिटिश शासन को नागपुर से अतिरिक्त सैनिकों को बुलाना पड़ा था, जबकि गुंडाधुर कभी पकड़े नहीं गए.
झांकी के पिछले हिस्से में शहीद वीर नारायण सिंह घोड़े पर सवार थे, जिनके हाथ में तलवार थी.
वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति के नेता और सोनाखान के ज़मींदार थे, उन्हें 1856 में एक भयानक अकाल के दौरान गरीबों को अनाज बांटने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.
सोनाखान लौटने के बाद सिंह ने 500 लोगों की सेना बनाई और 1857 में पहले स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए. उन्हें 10 दिसंबर, 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर फांसी दी गई थी और उन्हें छत्तीसगढ़ के पहले शहीद के रूप में पूजा जाता है.
कुल मिलाकर झांकी ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी नायकों की एक बड़ी कहानी बुनी…बस्तर के जंगल विद्रोह से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक धाराओं तक. जिसमें प्रस्तावित डिजिटल म्यूज़ियम को साहस, बलिदान और प्रतिरोध के आधुनिक आर्काइव के रूप में पेश किया गया.
आदिवासी डिजिटल संग्रहालय
भारत का पहला आदिवासी डिजिटल संग्रहालय उन आदिवासी नायकों की विरासत का सम्मान करने के लिए बनाया गया है जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और आज़ादी के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर दी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में बने डिजिटल म्यूज़ियम का उद्घाटन किया था.
इसमें छत्तीसगढ़ सहित देश के 14 प्रमुख जनजातीय स्वतंत्रता आंदोलनों को आधुनिक डिजिटल तकनीकों के माध्यम से संरक्षित किया गया है.
यह म्यूज़ियम प्रतिरोध के एक शक्तिशाली इतिहास को सामने लाता है जो लंबे समय से मुख्यधारा की कहानियों में कम दिखाया गया है.
म्यूज़ियम का उद्देश्य ही युवा पीढ़ियों को स्थानीय विद्रोहों की कहानियों से जोड़ना है जो अक्सर मुख्यधारा के ऐतिहासिक आख्यानों से बाहर रहती हैं.

