रानी दुर्गावती जैसे वीरों को आदिवासी वोटों तक सीमित ना करें

मुगल शासकों को अपने पराक्रम से पस्त करने वाले वीर योद्धाओं में रानी दुर्गावती का नाम भी शामिल है. उन्होंने आखिरी दम तक मुगल सेना का सामना किया और उसकी हसरतों को कभी पूरा नहीं होने दिया.

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हम में से ज्यादातर ने गोंडवाना की निडर रानी रानी दुर्गावती के बारे में सुना है. जिन्होंने मुगलों के खिलाफ कहर बरपाया और 16वीं शताब्दी में अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते हुए 24 जून, 1964 को वीरगति को प्राप्त हो गईं. उन्हें व्यापक रूप से गोंडों की बहादुर रानी के रूप में जाना जाता है. उनके बारे में एक और ख़ास बात है कि मध्य भारत में राजपूत और गोंड दोनों की समान रूप से एक सम्मानित नायक हैं.

हालांकि, रानी दुर्गावती के इर्द-गिर्द सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श ने उनके आदिवासी पूर्व इतिहास को ही उजागर किया है. लेकिन हकीकत यह है कि रानी दुर्गावती सिर्फ एक गोंड रानी से कहीं अधिक थीं. गोंड राज्य में उनके उत्थान के अलावा उन्होंने उस समय राजपूत और आदिवासियों के बीच समन्वय स्थापित करने की कोशिश भी की थी.

लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है रानी दुर्गावती को एक ऐसी ऐतिहासिक शख्सियत तक सीमित कर दिया जाता है, जिसके सहारे कुछ आदिवासी वोट हासिल किए जा सकते हैं.

मध्य प्रदेश में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे दलों का मुकाबला करने के लिए रानी दुर्गावती को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. राजनीति पर नज़र रखने वाले कुछ लोग कहते हैं कि इस मामले में बीजेपी सरकार ने राजनीतिक लाभ के लिए रानी दुर्गावती की विरासत को चतुराई से हथिया लिया.

कौन है रानी दुर्गावती

मुगल शासकों को अपने पराक्रम से पस्त करने वाले वीर योद्धाओं में रानी दुर्गावती का नाम भी शामिल है. उन्होंने आखिरी दम तक मुगल सेना का सामना किया और उसकी हसरतों को कभी पूरा नहीं होने दिया.

वर्तमान उत्तर प्रदेश के बांदा में इनका शासन हुआ करता था. उसे तब मालवा साम्राज्य कहा जाता था. मुगलों की तलवारों की चमक रानी दुर्गावती को डरा नहीं पाई थी. रानी दुर्गावती बांदा की स्वतंत्र रानी थी. लेकिन इस छोटे से राज्य की आजादी अकबर को खटकती रहती थी. अकबर ने अपने एक जनरल को इस राज्य पर कब्जा करने को कहा. फिर जो युद्ध हुआ वो मालवा और हिन्दुस्तान के इतिहास में दर्ज हो गया.

रानी दुर्गावती के बलिदान की कहानी हम आपको बताएं इससे पहले इस त्याग की पृष्ठभूमि हम आपको बताते हैं. सन 1542 ईस्वी में रानी दुर्गावती की राजगोंड वंश के राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह से हुई. 1545 ईस्वी में रानी दुर्गावती ने एक पुत्र को जन्म दिया, उनका नाम रखा गया वीर नारायण. जब वीर नारायण सिर्फ 5 साल के थे तभी दलपत शाह इस दुनिया से चल बसे. हालात को देखते हुए रानी दुर्गावती ने गोंड साम्राज्य का संचालन खुद अपने हाथ में लिया.

इस दौरान दुर्गावती को दीवान बेवहर अधर सिम्हा और मंत्री मन ठाकुर से मदद मिली. रानी अपनी राजधानी को सिंगूरगढ़ से चौरागढ़ ले आई. ये रणनीतिक दृष्टि से लिया गया फैसला था. चौरागढ़ सतपुड़ा की पहाड़ियों में स्थित था.

इधर अफगानी शासक शेरशाह की मृत्यु के बाद सुजात ख़ान ने मालवा पर कब्जा जमा लिया. 1556 में सुजात ख़ान का बेटा बाज बहादुर मालवा पर राज कर रहा था. सत्ता पर काबिज होते ही बाज बहादुर ने रानी दुर्गावती के राज्य पर हमला कर दिया. लेकिन इस युद्ध में दुर्गावती ने बाज बहादुर को धूल चटा दी. उसकी सेना को भारी नुकसान हुआ.

इस जीत के साथ ही दुर्गावती की चर्चा हिन्दुस्तान का हर जागरुक शहरी करने लगा था. दुर्गावती की तारीफ की ये खबरें मुगल सल्तनत तक भी पहुंची, जो अबतक शेरशाह से हिन्दुस्तान की गद्दी छिनकर उसपर खुद काबिज हो चुके थे.

1562 आते-आते अकबर ने मालवा के शासक बाज बहादुर को हरा दिया और मालवा को मुगल साम्राज्य में मिला लिया. इस तरह से मुगल राज्य की सीमा गोंड सीमा से मिल गई. दोनों राज्यों के बीच टकराव लाजिमी था.

इस दौरान अकबर का एक जनरल था ख्वाजा अब्दुल माजिद असफ़ ख़ान. असफ़ ख़ान महात्वाकांक्षी जनरल था. उसने रीवा के राजा रामचंद्र को हराकर अकबर के सामने अपनी काबिलियत साबित कर चुका था. गोंड साम्राज्य की समृद्धि उसकी आंखों में खटक रही थी.

असफ़ ख़न ने अकबर की शह पर गोंड साम्राज्य पर हमले का ऐलान कर दिया. रानी पद्मावती को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने पूरी शक्ति से इस हिमाकत का जवाब देने की तैयारी की. हालांकि उनके दीवान ने उन्हें मुगलों की ताकत से अवगत कराया. लेकिन रानी ने तय किया कि मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से अच्छा है इज्जत के साथ मौत को गले लगाया जाए.

एक तरफ तत्कालीन दुनिया में जंग के लिए प्रसिद्ध मुगलों की सेना थी, जिसके पास बारुद और असलहे थे तो दूसरी तरफ थी छोटे से राज्य गोंड की सेना. ये फौज साजो-सामान से उतनी संपन्न तो नहीं थी, लेकिन उनके जज्बे का कोई जोड़ नहीं था.

जून 1564 में दोनों के पक्षों के बीच गौर और नर्मदा नदियों की घाटी के बीच लड़ाई शुरू हुई. शुरुआती लड़ाई में रानी दुर्गावती को झटका लगा और उनका फौजदार अर्जुन दास मारा गया. इसके बाद रानी दुर्गावती ने खुद मोर्चा संभाला. दुश्मन जैसे ही घाटी वाले इलाके में घुसा, दुर्गावती की फौज ने उसपर हमला कर दिया.

बड़ा भयंकर युद्ध हुआ और दोनों तरफ से लोग मारे गए. लेकिन रानी ने मुगलों को शिकस्त दी और उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ दिया. इसी वक्त रानी ने अपने सैन्य रणनीतिकारों के साथ मशविरा किया. वह दुश्मन पर रात को हमला करना चाहती थी लेकिन उनके जनरलों ने इस सुझाव को नहीं माना.

अगली सुबह असफ़ ख़ान ने मुगलों की तोपें मंगवा ली थी. दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. असफ़ ख़ान एक हार के बाद चिढ़ा हुआ था, रानी अपने हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि में आई और रणभूमि में प्रलय सा मच गया. इस युद्ध में दुर्गावती के बेटे वीर नारायण ने अपना जौहर दिखाया.

लड़ाई में तीन बार मुगलों की सेना पीछे तो हटी लेकिन युद्ध के दौरान रानी के कान के पास तीर लगा और वो घायल हो गईं. वो जबतक संभलती एक दूसरा तीर उनकी गर्दन में घुस गया और वो बेहोश हो गईं. जब उनकी बेहोशी टूटी तो उन्हें लगने लगा कि हार अब तय है. उनके महावत ने उन्हें युद्ध क्षेत्र से बाहर निकलकर सुरक्षित स्थान पर जाने को कहा. लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया और उन्होंने अपनी कटार निकाली और अपनी जान दे दी.

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