क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी गांव में लोग पत्थर भी खा लेते हैं. जी हाँ, नागालैंड के कई गांवों में पत्थर खाया जाता है.
इस सिलसिले में बताया जाता है कि चांगकी गाँव में “लॉन्गपिंग” नाम का एक विशेष प्रकार का पत्थर पीढ़ियों से खाया जाता रहा है.
स्थानीय समुदाय के लिए यह केवल एक असामान्य वस्तु नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है.
लॉन्गपिंग देखने में सख्त मिट्टी के टुकड़ों जैसा होता है. इसका रंग हल्का धूसर-भूरा होता है और यह परतदार, चपटे स्लैब की तरह दिखाई देता है.
पहली नज़र में यह खाने योग्य प्रतीत नहीं होता, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार इसकी बनावट मुलायम और चबाने योग्य होती है.
स्वाद में यह चॉक या कैल्शियम की गोली जैसा महसूस होता है. यही कारण है कि इसे आमतौर पर हल्के नाश्ते की तरह चबाया जाता रहा है.
इस गाँव के बुज़ुर्गों के अनुसार, लॉन्गपिंग का सेवन मुख्यतः आनंद और समय बिताने के लिए किया जाता था. ज
जब अन्य नाश्ते उपलब्ध नहीं होते थे, तो लोग इसे चबाते रहते थे. विशेष रूप से पहले के समय में गर्भवती महिलाओं के बीच लॉन्गपिंग खाने की प्रवृत्ति अधिक बताई जाती है. माना जाता था कि इसमें मौजूद खनिज तत्व गर्भावस्था के दौरान लाभकारी हो सकते हैं.
स्थानीय मान्यता है कि लॉन्गपिंग में कैल्शियम, मैग्नीशियम और अन्य खनिज लवण पाए जाते हैं. इसका चॉक जैसा स्वाद भी इन्हीं खनिजों की उपस्थिति का संकेत माना जाता है.
हालांकि इसके पोषण संबंधी लाभों पर कोई औपचारिक वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है. लेकिन पारंपरिक ज्ञान के आधार पर इसे उपयोगी समझा जाता रहा है.
लॉन्गपिंग को खाने से पहले साफ किया जाता है और विशेष तरीके से तैयार किया जाता है. यह प्रक्रिया भी स्थानीय ज्ञान और परंपरा का हिस्सा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही है.

