इन दिनों तेलंगाना दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और दो साल में होने वाले आदिवासी त्योहार मेदाराम जतारा (Medaram Jatara) की तैयारी कर रहा है.
राज्य में कांग्रेस सरकार 28-31 जनवरी तक होने वाले जतारा के लिए तैयारी कर रही है. 50 बेड का अस्पताल बना रही है और 3 हज़ार से ज़्यादा बसें तैनात करने के लिए तैयार कर रही है.
इस तैयारी के साथ ही उल्टे स्वास्तिक (Left-facing swastika) के मूल स्थान को लेकर बहस एक बार फिर शुरू हो गई है.
आदिवासी इतिहास के विशेषज्ञों के मुताबिक, मेदाराम के आदिवासी मंदिर – सम्मक्का-सरलम्मा मंदिर (Sammakka-Saralamma temple) के कई खंभों पर बना उल्टा स्वास्तिक आदिवासी इतिहास में एक आम प्रतीक है.
तेलंगाना के मुलुगु जिले के मेदाराम गांव में आदिवासी शोधकर्ता एम अरुण कुमार ने कहा कि उल्टा स्वास्तिक एक आदिवासी प्रतीक है, जो हिंदू परंपरा में सीधे स्वास्तिक से अलग है.
अरुण कुमार ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “बाएं मुंह वाला स्वस्तिक कोया आदिवासी परंपरा में बार-बार दिखने वाला प्रतीक है. हमने मंदिर के 32 खंभों पर उकेरने के लिए ऐसी कई चित्रकला परंपराओं को चुना.”
कुमार ने बताया कि मंदिर में अब ऐसी 7,000 चित्रकलाएं हैं, जिनमें से स्वस्तिक सबसे ज़्यादा खास है.
कोया आदिवासी स्टडीज़ में डॉक्टरेट करने वाले कुमार के मुताबिक, स्वास्तिक एक आदिवासी प्रतीक है जिसे बाद में हिंदू धर्म ने अपना लिया.
कुमार ने कहा, “बाएं तरफ मुंह वाला स्वास्तिक सिंधु घाटी सभ्यता के समय का है.”
आदिवासी परंपरा में बाएं तरफ़ वाला स्वस्तिक
वहीं हैदराबाद यूनिवर्सिटी में मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री के प्रोफेसर भंग्या भुक्या ने इस विचार का समर्थन किया और कहा कि बाएं तरफ़ वाला स्वस्तिक तेलंगाना में आदिवासी समुदायों में एक आम प्रतीक है. कोया लोगों के अलावा, लंबाडा लोग भी बाएं तरफ़ वाला स्वस्तिक बनाते हैं.”
कुमार के मुताबिक, मंदिर में शिवलिंग जैसी संरचनाएं भी होंगी जिन पर स्वस्तिक बना होगा. भगवान शिव में विश्वास आदिवासी प्रकृति का है. स्वस्तिक लोगों का स्वागत करेगा, उन्हें देश की अनोखी आदिवासी परंपराओं की याद दिलाएगा.
कुंभ मेले के बाद मेदाराम जतारा में देश में सबसे ज़्यादा श्रद्धालु आते हैं. पहले इस जतारा में करोड़ों लोग आए थे.
मंदिर में दो देवियों, सम्मक्का और सरलम्मा की पूजा होती है, जो माँ-बेटी हैं और जिन्होंने लंबे समय तक मेदाराम की रक्षा की.
कुमार ने कहा, “कहा जाता है कि मां-बेटी ने काकतीय शासकों का सामना किया था जो मेदाराम को अपने राज्य में मिलाना चाहते थे. लेकिन हमारी रिसर्च के मुताबिक, सम्मक्का-सरलम्मा काकतीयों से पहले भी इस क्षेत्र की मुखिया थीं.”
उन्होंने अपनी थ्योरी को साबित करने के लिए कोया भाषा में ताड़ के पत्तों पर लिखे ग्रंथों का हवाला दिया.
कोया मौखिक परंपरा और लोककथाओं के मुताबिक, शिकार पर गए कुछ आदिवासी सरदारों को एक नवजात बच्ची, सम्मक्का मिली, जो बाघों के बीच खेलते हुए चमक रही थी.
सरदार उसे अपने गांव ले गए और कबीले के मुखिया ने उसे गोद ले लिया और एक मुखिया के तौर पर पाला-पोसा. उसके तीन बच्चे थे, सरक्का, नागुलम्मा और जम्पनना.
कुमार ने कहा कि बाईं ओर मुंह वाले स्वस्तिक ने कुछ संगठनों को नाराज़ कर दिया है, जिन्होंने इसे हिंदू इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना बताया है.
वारंगल के एक शोधकर्ता अरविंद आर्य, जो इस प्रतीक का विरोध करते हैं. उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “जिन शोधकर्ताओं ने बाईं ओर मुंह वाले स्वस्तिक को शामिल किया है, उनके पास इसे शामिल करने का कोई आधार नहीं है.”
हालांकि, अरुण कुमार ने कहा कि बाईं ओर मुंह वाला स्वस्तिक सिर्फ आदिवासी परंपराओं में ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया में बौद्ध परंपराओं में भी पाया जाता है.
उन्होंने कहा, “यह मंदिर कोया और गोंड जनजाति के लिए पवित्र है और चाहे कोई भी विरोध हो, हम अपनी परंपराओं को जारी रखेंगे.”
जतारा का महत्व…
कोया जनजाति द्वारा आयोजित “सम्मक्का सरलम्मा जतारा” पूरे एशिया में सबसे बड़े आदिवासी त्योहार के रूप में जाना जाता है. ‘मेदाराम जतारा’ के दौरान आदिवासी भक्त मेदाराम में देवी सम्मक्का और उनकी बेटी सरलम्मा की पूजा करते हैं, जो एक वन क्षेत्र में स्थित है.
इस उत्सव से महीने भर पहले से ही लोग आना शुरू कर देते हैं, जिससे मंदिर आध्यात्मिक गतिविधि का केंद्र बन जाता है.
यह आदिवासी मेला “माघ शुद्ध पूर्णिमा” (माघ महीने की पूर्णिमा का दिन) पर 13वीं शताब्दी की दो आदिवासी महिलाओं – सम्मक्का और उनकी बेटी सरलम्मा की देवताओं के रूप में पूजा करने के लिए मनाया जाता है.
इसमें तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से श्रद्धालु आते हैं. इस मेले में गैर-आदिवासी श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में आते हैं.
आदिवासियों का मानना है कि सम्मक्का और सरलम्मा ने काकतीय राजवंश के शक्तिशाली सम्राटों से लड़ते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया था. जिन्होंने राजशाही की मांग करते हुए उनके छोटे से आदिवासी गांव पर हमला किया था और उनके जीवन और संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की थी.
अन्य धार्मिक सभाओं के विपरीत सममाका-सरलाम्मा जातरा में इन देवताओं के लिए कोई मंदिर नहीं बनाया गया है. वे केवल दो खंभे हैं जिन्हें दो अलग-अलग स्थानों से लाया जाता है.
चिलकलागुट्टा नामक पड़ोसी पहाड़ी से सममाका और कन्नेपल्ली गांव से सरलाम्मा को ढोल और तुरही बजाने के बीच पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों के साथ जुलूस में लाया जाता है. फिर दो प्लेटफार्मों पर खड़ा किया जाता है. जहां अगले दो दिन उनकी पूजा की जाती है.
भक्त देवी-देवताओं को अपने वजन के बराबर मात्रा में गुड़ के रूप में बंगाराम (सोना) चढ़ाते हैं और एक स्थानीय जलधारा जम्पन्ना वागु में पवित्र स्नान करते हैं. देवताओं के लिए बकरियों, भेड़ों और मुर्गों की बलि भी पूजा का हिस्सा रही है.

