HomeAdivasi Dailyअस्पताल में डिलीवरी से डरी आदिवासी महिला 10 दिन बाद लौटी घर

अस्पताल में डिलीवरी से डरी आदिवासी महिला 10 दिन बाद लौटी घर

जब सरकार बेहतर स्वास्थ्य की सुविधाएं देती है, तो भी बहुत से आदिवासी इलाके रह जाते हैं. और जिन इलाकों तक सुविधा पहुंच जाती है, वहां आदिवासियों का भरोसा जीतने में स्वास्थ्य अधिकारी नाकाम हो जाते हैं. और फिर इस तरह के मामले सामने आते हैं जब गर्भवती आदिवासी महिला को प्रसव की तारीख नज़दीक होने के बावजूद अपने घर से भागना पड़ता है...

तमिलनाडु के इरोड ज़िले की थलावड़ी पहाड़ियों के सोलागर धोड्डी गांव की रहने वाली 25 वर्षीय शेवंती शुक्रवार को घर लौट आईं. वह बीते 10 दिनों से लापता थीं.

बताया गया कि वे अस्पताल में अपने बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थीं और उन्हें अस्पताल जाने से डर लगता था इसलिए उन्होंने घर छोड़ दिया था.

डॉक्टर समझाते रहे, लेकिन महिला नहीं मानी

शेवंती की डिलीवरी की तारीख 7 जुलाई तय की गई थी. स्वास्थ्य विभाग की टीम लगातार उनसे संपर्क में थी.

टीम में शामिस डॉ. सेन्थिल कुमार, डॉ. विश्णु और स्वास्थ्य नर्स पी. ज्योति ने उन्हें कई बार समझाया कि अस्पताल में डिलीवरी सुरक्षित है. लेकिन शेवंती ने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया.

शेवंती के पति चंद्रन भी उनके साथ लापता थे. दोनों के मोबाइल बंद थे.

परिजनों ने थलावड़ी पुलिस को शिकायत दी थी.

सामाजिक कार्यकर्ता ने निभाई अहम भूमिका

गुरुवार को थलावड़ी फार्मर्स फाउंडेशन के अध्यक्ष एस. कन्नैयन ने परिवार से मुलाकात की. उन्होंने चंद्रन की मां नगियम्मा और बहन मदेवी से बात की.

उन्होंने परिवार को अस्पताल डिलीवरी के फायदे समझाए. यह भी भरोसा दिलाया कि वह खुद शेवंती को अस्पताल लेकर जाएंगे.

करीब एक घंटे की बातचीत के बाद परिवार ने शेवंती को वापस बुलाने का फैसला लिया.

पुलिस की चेतावनी से और बढ़ा डर

शुक्रवार को कन्नैयन दोबारा घर पहुंचे. वहां मदेवी ने बताया कि पुलिस की ओर से फोन आया था.

कहा गया कि अगर शेवंती नहीं लौटी तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी. इस धमकी से परिवार घबरा गया. बाद में संबंधित पुलिसकर्मी ने फोन पर माफी मांगी.

स्वास्थ्य टीम शुक्रवार को फिर शेवंती के घर पहुंची.

टीम ने महिला का ब्लड प्रेशर जांचा. इसके बाद उन्हें थलावड़ी के सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया.

डॉक्टरों ने बताया कि प्रसव कभी भी हो सकता है. तुरंत भर्ती होने की सलाह दी गई. लेकिन शेवंती और उनकी ननद मदेवी ने साफ कह दिया कि जब दर्द शुरू होगा तभी आएंगे.

इसके बाद दोपहर करीब 1:30 बजे उन्हें वापस घर छोड़ दिया गया.

डर का कारण

शेवंती की सास नगियम्मा ने बताया कि उनकी एक बेटी की डिलीवरी के बाद बहुत खून बहा था. तभी से वे डरे हुए हैं.

उन्होंने कहा कि गांव की कई महिलाओं ने बताया था कि अस्पतालों में डिलीवरी खतरनाक होती है.

शेवंती ने बताया कि उन्होंने कर्नाटक के चामराजनगर अस्पताल में स्कैन कराया था. वहां डिलीवरी की तारीख 27 जुलाई बताई गई.

इसपर स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी ने कहा कि 7 जुलाई की तारीख पुरानी रिपोर्ट पर आधारित थी.

इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं है. पिछले महीने तमिलनाडू के बर्गूर से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था, जब बहुत बार समझाने के बाद आदिवासी महिला अस्पताल में डिलीवरी के लिए तैयार हुई थी.

आदिवासी इलाकों में अस्पताल को लेकर व्याप्त डर और गलतफहमियों को खत्म करना बेहद ज़रूरी है.

आदिवासी इलाकों में सुविधाएं देने के साथ-साथ आदिवासियों के बीच भरोसा कायम करना एक बड़ी चुनौती है.

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