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संजय गांधी नेशनल पार्क में तोड़फोड़ का आदिवासी क्यों कर रहे हैं विरोध?

वन विभाग का कहना है कि आज संजय गांधी नेशनल पार्क के अंदर कोई भी "असली" आदिवासी नहीं रहते हैं.

आदिवासियों के विरोध प्रदर्शनों के कारण वन विभाग को पिछले हफ़्ते महाराष्ट्र के संजय गांधी नेशनल पार्क (Sanjay Gandhi National Park) के अंदर चलाए जा रहे तोड़फोड़ अभियान को रोकना पड़ा.

इसके साथ ही इस बात पर लंबे समय से चला आ रहा विवाद फिर से शुरू हो गया है कि संरक्षित जंगल के अंदर रहने का अधिकार किसका है.  

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आदिवासी परिवार कहते हैं कि वे मूल निवासी हैं जिन्हें ज़बरदस्ती बाहर निकाल दिया गया था और बाद में वे वापस आ गए.

वहीं वन विभाग का कहना है कि सभी मूल निवासियों यानि आदिवासियों को 1977 में दूसरी जगह बसा दिया गया था और जो लोग आज पार्क के अंदर रह रहे हैं, वे अतिक्रमणकारी हैं.

तोड़फोड़ के नोटिस क्यों जारी किए गए?

17 जनवरी को वन विभाग ने संजय गांधी नेशनल पार्क (SGNP) के अंदर 10 बस्तियों को नोटिस जारी किए, जिनमें मागाठाणे, मलाड और गुंडगांव जैसे इलाकों के 385 घर शामिल थे.

विभाग ने इन घरों को “दोबारा अतिक्रमण” बताया, जिन्हें उन परिवारों ने बनाया था जिन्हें पहले दूसरी जगह बसाया गया था लेकिन बाद में वे पार्क में वापस आ गए.

यह कार्रवाई 1997 के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई है, जिसमें SGNP के अंदर सभी अतिक्रमणों को हटाने का निर्देश दिया गया था. जिन परिवारों के नाम 1995 की वोटर लिस्ट में थे, उन्हें 7 हज़ार रुपये देने के बाद चांदीवली और पवई में शिफ्ट कर दिया गया था. इस योजना के तहत 10 हज़ार से ज़्यादा परिवारों को बसाया गया था.

वन विभाग के मुताबिक, इनमें से 385 परिवार बाद में वापस आ गए और उन्होंने पार्क के अंदर दोबारा घर बना लिए.

इसके बाद साल 2023 में एक अवमानना ​​याचिका दायर की गई थी जिसमें कहा गया था कि 1997 के कोर्ट के आदेश को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. इसके बाद हाई कोर्ट ने इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के लिए एक हाई पावर्ड कमेटी (HPC) बनाई.

कमेटी ने फैसला किया कि पुनर्वास के बाद लौटे 385 परिवारों को पहले हटाया जाएगा.

परिवारों को 24 जनवरी तक आपत्तियां दर्ज करने के लिए नोटिस जारी किए गए और 19 से 28 जनवरी के बीच तोड़फोड़ की योजना बनाई गई.

आदिवासियों ने विरोध क्यों किया?

निवासियों का कहना है कि 385 इमारतों की लिस्ट में करीब 40 आदिवासी घर शामिल थे. इससे नवापाड़ा, चिंचपाड़ा, तुमनीपाड़ा, रावणपाड़ा और केतलाईपाड़ा समेत कई गांवों में विरोध प्रदर्शन हुए.

मंगलवार को प्रदर्शनकारियों ने बुलडोजर रोक दिए और अधिकारियों को तोड़फोड़ अभियान रोकने के लिए मजबूर किया.

राजनीतिक दखल के बाद वन मंत्री गणेश नाइक ने फिलहाल तोड़फोड़ रोकने का आदेश दिया.

वहीं वन विभाग का कहना है कि आज संजय गांधी नेशनल पार्क के अंदर कोई भी “असली” आदिवासी नहीं रहते हैं. यह *मानिक रामा सपटे बनाम महाराष्ट्र राज्य* मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले पर आधारित है.

विभाग के मुताबिक, कोर्ट ने कहा था कि सभी असली आदिवासी परिवारों को 1977 में जंगल से बाहर निकालकर पालघर जिले में बसा दिया गया था. विभाग का कहना है कि अब पार्क के अंदर रहने वाले लोग अतिक्रमणकारी हैं जो पुनर्वास के बाद वापस आ गए हैं.

1977 में क्या हुआ था?

वन अधिकारियों का कहना है कि जब विभाग ने जंगल का कब्ज़ा लिया था, तब जंगल के अंदर सिर्फ़ कुछ ही आदिवासी परिवार रह रहे थे. इन परिवारों को 1977 में पालघर ज़िले के खुटल गांव में शिफ़्ट कर दिया गया था.

सरकार का कहना है कि उसने उनके पुनर्वास पर पैसा खर्च किया.

बाद में जब संजय गांधी नेशनल पार्क को वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत औपचारिक रूप से नेशनल पार्क घोषित किया गया, तो सभी ज़मीन के दावों की जांच की गई और उन्हें खारिज कर दिया गया.

2003 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह माना कि आदिवासियों का जंगलों के साथ एक खास रिश्ता है, लेकिन इस दावे को खारिज कर दिया कि हजारों आदिवासी परिवार SGNP के अंदर रहते थे.

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ कुछ सौ परिवार मिले और जंगल की ज़मीन पर उनका कोई कानूनी अधिकार नहीं था. बेदखली और पुनर्वास के मामले में कोर्ट ने उन्हें दूसरे कब्ज़ा करने वालों के बराबर माना.

आज SGNP में रहने वाले आदिवासी कौन हैं?

संजय गांधी नेशनल पार्क के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि 1977 में शिफ्ट किए गए कई परिवार बाद में वापस लौट आए क्योंकि उनका पुनर्वास फेल हो गया था. समय के साथ परिवारों के बढ़ने से उनकी आबादी भी बढ़ गई.

वन विभाग का तर्क है कि क्योंकि उनका एक बार पहले ही पुनर्वास हो चुका है, इसलिए वे दोबारा जंगल के अधिकारों का दावा नहीं कर सकते.

आदिवासियों का कहना है कि उनके परिवार पीढ़ियों से नेशनल पार्क में रह रहे हैं और उन्हें 1977 में जबरदस्ती निकाला गया था.

उनका कहना है कि कई लोग इसलिए वापस लौट आए क्योंकि वे पुनर्वास वाली जगह पर गुज़ारा नहीं कर पाए.

वे वन अधिकार अधिनियम, 2006 का भी हवाला देते हैं, जिसके तहत उनके दावों का अभी भी वेरिफिकेशन चल रहा है. वे सवाल उठाते हैं कि जंगल में रहने वाले होने के बावजूद उन्हें अतिक्रमणकारी क्यों माना जा रहा है.

विरोध प्रदर्शनों के कारण राजनीतिक दखल हुआ, जिसके बाद महाराष्ट्र के वन मंत्री गणेश नाइक ने कहा कि आदिवासी मुद्दों और पुनर्वास पर फिर से विचार किया जाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ परिवारों को पास में घर दिए जा सकते हैं, जबकि पुनर्वास के बाद लौटे लोगों को नियमों के बारे में बताया जाएगा.

फिलहाल, तोड़फोड़ रोक दी गई है लेकिन संजय गांधी नेशनल पार्क के अंदर रहने का अधिकार किसका है, इस पर कानूनी विवाद अभी भी अनसुलझा है.

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