द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनना बड़ी बात क्यों है

विपक्ष द्वारा यशवंत सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद बहुत से लोग विपक्ष की मूर्खता पर ताने मार रहे थे. लेकिन जैसे ही भाजपा ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया, वैसे ही लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए और तरह-तरह की प्रतिक्रिया देने लगे. ज़्यादातर लोगों ने भाजपा के इस कदम का स्वागत किया, लेकिन कुछ लोग उल्टी-सीधी बातें लिखने लगे हैं.

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राष्ट्रपति पद के चुनाव अब क़रीब हैं, और देश में चुनावी सरगर्मियाँ तेज हो चुकी हैं. लगभग 25 सालों तक भाजपा में रहे पार्टी के पूर्व नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार चुने गए हैं. जबकि भाजपा ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला लेते हुए आदिवासी महिला नेता और झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया है. उम्मीद की जा रही है कि इस बार देश को द्रौपदी मुर्मू के रूप में पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिलेंगी.

विपक्ष द्वारा यशवंत सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद बहुत से लोग विपक्ष की मूर्खता पर ताने मार रहे थे. लेकिन जैसे ही भाजपा ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया, वैसे ही लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए और तरह-तरह की प्रतिक्रिया देने लगे. ज़्यादातर लोगों ने भाजपा के इस कदम का स्वागत किया, लेकिन कुछ लोग उल्टी-सीधी बातें लिखने लगे हैं. मसलन,

1. द्रौपदी मुर्मू अन्य राष्ट्रपतियों की तरह रबर स्टाम्प साबित होंगी.

2. द्रौपदी मुर्मू प्रतीकात्मक राष्ट्रपति उम्मीदवार हैं.

3. आदिवासी राष्ट्रपति बनाए जाने के बाद आदिवासियों का भला नहीं होगा. जैसे दलित राष्ट्रपति बनने के बाद दलित उत्पीड़न बढ़े, ठीक वैसे ही आदिवासी राष्ट्रपति बनने के बाद अडानी-अम्बानी के लिए जंगलों को उजाड़ा जाएगा और आदिवासी विस्थापन में वृद्धि होगी.

4. वर्तमान में चल रहे आदिवासी आंदोलनों पर द्रौपदी मुर्मू का क्या स्टैंड रहा है? क्या वो आदिवासी समुदाय के हित में काम केंरगी?

5. कुछ लोग तो यह भी लिख रहे है कि सामाजिक न्याय की राजनीति का अर्थ यह क़तई नहीं है कि हर जगह मेरी जाति या समुदाय का शख़्स हो. प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी में प्रगतिशील वैचारिकी भी शामिल होनी चाहिए.

6. द्रौपदी मुर्मू जी के एक शिव मंदिर में झाड़ू लगाने के वीडियो का मजाक बनाया जा रहा है.

7. द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने पाए आदिवासी समुदाय इतना खुश क्यों है?

8. आदिवासी अब भाजपा को वोट देंगे.

इन सभी सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश मैं करूंगा, और अंत में यह भी बात करेंगे कि यशवंत सिन्हा और द्रौपदी मुर्मू में से कौन बेहतर है और किसे राष्ट्रपति बनना चाहिए.

1. द्रौपदी मुर्मू अन्य राष्ट्रपतियों की तरह रबर स्टाम्प साबित होंगी

हम सब जानते है कि भारतीय राजनीति में राष्ट्रपति बिलकुल रबर स्टाम्प के समान होता है. वैसे ये भविष्य  गर्त में छिपा है कि वो रबर स्टाम्प साबित होंगी या नहीं. लेकिन जब वो झारखंड की राज्यपाल थीं, तो तत्कालीन भाजपा सरकार ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन की कोशिश की थी, जिस संशोधन पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए थे और कहा था कि संशोधन आदिवासी हितैषी होने चाहिए ना कि आदिवासी विरोधी. वैसे अभी तक अधिकतर राष्ट्रपति चाहे वो दलित हो, मुस्लिम या महिला, जब रबर स्टाम्प साबित हुए हैं, तो द्रौपदी मुर्मू के रबर स्टाम्प बनने पर आपत्ति क्यों?

2. क्या द्रौपदी मुर्मू प्रतीकात्मक राष्ट्रपति उम्मीदवार हैं?

जी, बिल्कुल प्रतीकात्मक हैं. लेकिन आप लोग उन लोगों से सवाल पूछिए कि भारतीय राजनीति में प्रतीकों का खेल किसने शुरू किया था? वैसे हाल ही का उदाहरण देख लीजिए जब पंजाब में अमरिंदर सिंह की जगह चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर बहुत से लोग खुश हो रहे थे, अब उन्हीं में कुछ लोग द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर दुखी हो रहे हैं.

3. क्या आदिवासी राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासियों का भला होगा? क्या जैसे दलित राष्ट्रपति बनने के बाद दलित उत्पीड़न बढ़े ठीक वैसे ही आदिवासी राष्ट्रपति बनने के बाद अडानी-अम्बानी के लिए जंगलों को उजाड़ा जाएगा और आदिवासी विस्थापन में वृद्धि होगी?

हमें नहीं पता कि द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समुदाय का भला करेंगी या नहीं. क्योंकि ये सब भविष्य के गर्त में है लेकिन मुझे ये बताओ कि किस राष्ट्रपति ने अपने समुदाय के लोगों का भला किया? क्या ज्ञानी ज़ैल सिंह, के आर नारायणन, अब्दुल कलाम, रामनाथ कोविंद, प्रतिभा पाटिल ने अपने-अपने समुदायों का भला किया? फिर द्रौपदी मुर्मू से ही यह उम्मीद क्यों? क्या विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार यशवंत सिन्हा आदिवासियों का भला करेंगे? जबकि विपक्ष के इस उम्मीदवार यशवंत सिन्हा का इतिहास बताता है कि ये बिहार में दलितों का जनसंहार करने वाली रणवीर सेना के हितैषी रहे हैं. ऐसे में इनसे आदिवासी हितैषी होने की उम्मीद करना मूर्खता है. और जिन्हें आदिवासी समुदाय के जल-जंगल-ज़मीन की अचानक से फ़िक्र होने लगी है, उनसे पूछिए कि उनमें से कितने लोग, नेता और पार्टियाँ हसदेव, सिलगेर, नेतरहाट और कांकरी डूँगरी आंदोलन में आदिवासी समुदाय के साथ थे? एक बात और कहना चाहता हूँ कि यदि आदिवासी समुदाय के जल जंगल ज़मीन स्वाभिमान और अधिकार पर हमला हुआ तो वो अपने दम पर अपनी लड़ाई लड़ेंगे ना कि राष्ट्रपति के भरोसे बैठे रहेंगे.

4. वर्तमान में चल रहे आदिवासी आंदोलनों पर द्रौपदी मुर्मू का क्या स्टैंड रहा है? क्या वो आदिवासी समुदाय के हित में काम करेगी..?

पूछिए विपक्षी उम्मीदवार की पैरवी करने वाले लोगों से कि हसदेव, सिलगेर और कांकरी डूँगरी में आदिवासी समुदाय के ऊपर कांग्रेस की सरकार ने हमला किया था, तब यशवंत सिन्हा, आप, और विपक्षी दल कहाँ थे? विपक्ष को वोट भी आदिवासी दें और उत्पीड़न भी आदिवासी सहें, लेकिन जब बात प्रतिनिधित्व की आएँ तो मलाई ग़ैर-आदिवासी चाटेगा? ऐसे कैसे चलेगा? बाक़ी मैंने द्रौपदी मुर्मू से जुड़े कई आर्टिकल पढ़े हैं, उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि वो चाहे आदिवासी विस्थापन और उत्पीड़न पर ना बोलें, लेकिन वो आदिवासी क्षेत्रों में केंद्र सरकार के सहयोग से शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ावा ज़रूर देने की कोशिश करेंगी. द्रौपदी मुर्मू को कई उल्लेखनीय कार्यों के लिए ओडिशा विधानसभा में सबसे बेहतर विधायक का अवार्ड भी मिला था और साथ में वो झारखंड की ऐसी पहली राज्यपाल है, जिसने अपना कार्यकाल पूर्ण किया है; ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि वो एक बेहतर राष्ट्रपति साबित होंगी.

5. कुछ लोग तो यह भी लिख रहे हैं कि सामाजिक न्याय की राजनीति का अर्थ यह क़तई नहीं है कि हर जगह मेरी जाति या समुदाय का शख़्स हो. प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी में प्रगतिशील वैचारिकी भी शामिल होनी चाहिए.

मैं इन साथियों की इस बात से कुछ हद तक सहमत हूँ कि सामाजिक न्याय की राजनीति का अर्थ यह क़तई नहीं है कि हर जगह मेरी जाति या समुदाय का शख़्स हो. लेकिन जब आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी वर्तमान विपक्ष द्वारा आदिवासी समुदाय को महत्व ना दिया जाए तो भाजपा द्वारा द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित करने वाला यह कदम लोगों को सामाजिक न्याय ही लगेगा. बाक़ी मैं इन साथियों से इतना पूछना चाहता हूँ कि विपक्ष के उम्मीदवार की वैचारिकी और सामाजिक न्याय का आधार क्या है? यशवंत सिन्हा लगभग तीन दशक तक भाजपा में रहे हैं. बिहार में दलितों का जनसंहार करने वाली घोर जातिवादी रणवीर सेना के हितैषी रहे हैं. गुजरात दंगों के वक्त यही यशवंत सिन्हा केंद्र सरकार में मंत्री थे. Old पेंशन को हटाने वाले भी यही यशवंत सिन्हा थे. लेकिन क्या उनकी वैचारिकी सिर्फ़ इसलिए मज़बूत हो जाती है क्योंकि वो 2018 से मोदी विरोधी हैं? इसे प्रगतिशीलता या वैचारिकी मज़बूती नहीं, बल्कि मौक़ापरस्ती कहते हैं. कल को तो इस देश का वर्तमान तानाशाह मोदी, भाजपा और RSS को छोड़ दे तो क्या आप मोदी को माफ़ कर देंगे? वैसे इस देश में आरक्षण का प्रावधान प्रतिनिधित्व के लिए किया गया था फिर तो उन लोगों का आरक्षण ख़त्म कर देना चाहिए, जो वैचारिक रूप से मज़बूत ना हों. क्या वो लोग, नेता, विधायक, सांसद और दल सामाजिक न्याय की पालना कर रहे हैं, जो इस देश में सिलगेर, हसदेव, कांकरी डूँगरी, नेतरहाट जैसे आदिवासी आंदोलनों और कांग्रेस एवं भाजपा प्रायोजित सलवा जूडूम पर चुप रहे?

6. कुछ लोग उस वीडियो के माध्यम से द्रौपदी मुर्मू जी का मजाक बना रहे है, जिसमें वो एक शिव मंदिर में झाड़ू लगा रही हैं.

मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या अब्दुल कलाम शंकराचार्य के कदमों में जाकर नहीं बैठे थे? क्या वर्तमान राष्ट्रपति पुष्कर नहीं गये थे? क्या बहनजी मायावती ने तिलक तराज़ू तलवार के नारे को ताक पर रखकर हाथ में त्रिशूल और गणेश जी की मूर्ति को नहीं उठाया था? क्या कन्हैया कुमार जैसे पूर्व वामपंथी और वर्तमान कांग्रेसी मंदिर नहीं जाते हैं? क्या राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मंदिर नहीं जाते हैं? क्या स्वच्छता अभियान के नाम पर मोदी से लेकर जाने माने नेताओं और सेलेब्रिटीज़ ने अपने हाथों में झाड़ू नहीं उठाई? ऐसे में द्रौपदी मुर्मू का मजाक क्यों?

7. द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर आदिवासी समुदाय इतना खुश क्यों है?

यह ख़ुशी इसलिए है क्योंकि यह सम्मान, गौरव और प्रतिनिधित्व का मसला है. इसे आप यूँ समझ सकते हैं कि जब चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो शायद ही कोई किसान परिवार होगा जिसने मिठाई ना बांटी हो. इसी प्रकार जब बहन जी पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं, तो दलित समुदाय ने भी गौरवान्वित महसूस किया था.  ओबामा ने बेशक अश्वेतों के लिए कुछ भी ना किया हो, लेकिन वो अश्वेतों का गौरव रहेंगे हमेशा क्योंकि अमेरिकी इतिहास के वो पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे. ऐसे समुदायों और वर्गों से अगर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसा कोई पद निकलता है तो आने वाली कई पुश्तों के लिए गौरव की बात होती है. एक बात और है कि दुनिया के हर महाद्वीप में जब मूल निवासियों को सम्मान दिया जा रहा है, चाहे वो अमेरिका हो या आस्ट्रेलिया या फिर अफ्रीका तो देश की आजादी के 75 वर्षों बाद एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति बनने पर लोगों को दिक़्क़त क्यों हो रही है?

8. क्या आदिवासी अब भाजपा को वोट देंगे?

अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाए जाने के बाद कितने मुस्लिमों ने भाजपा को वोट दिया? क्या रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाए जाने के बाद भाजपा के दलित वोट बैंक में वृद्धि हुई? फिर ये सवाल क्यों किया जा रहा है कि आदिवासी भाजपा को वोट देंगे या नहीं. भाजपा के किसी ऐतिहासिक कदम का स्वागत करने का मतलब यह नहीं है कि आदिवासी समुदाय भाजपा को एक तरफ़ा वोट देगा. आदिवासी समुदाय हमेशा भाजपा विरोधी वोट बैंक रहा है. छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा के आँकड़े निकाल लीजिए, आदिवासी वोट बैंक कभी भाजपा को उस मात्रा में नहीं मिला है, जितना वोट अन्य दलों को आदिवासी देते हैं. 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में आदिवासी बाहुल्य पूर्वी राजस्थान में 39 में से भाजपा को सिर्फ़ 4 सीट मिली थी. इसके अलावा मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा आदि राज्यों में भाजपा को आदिवासी वोट नाम मात्र का मिला था.

बुद्धिजीवियों और राजनीतिक विश्लेषकों को फ़ालतू के सवाल करने के बजाय विपक्ष से निम्नलिखित सवाल करने चाहिए थे:-

1. आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी कांग्रेस और विपक्षी दलों ने कभी आदिवासी समुदाय को वो प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया, जिसका वो हक़दार था?

2. आख़िर कांग्रेस और विपक्षी दलों ने हाल ही के राज्यसभा चुनावों में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व देने की जगह सवर्णों को प्रतिनिधित्व क्यों दिया?

3. आख़िर कांग्रेस और विपक्षी दलों ने पिछले 75 वर्षों में एक भी आदिवासी को राष्ट्रपति क्यों नहीं बनाया? हाँ एक बार भाजपा में विपक्ष में रहते हुए पी.ए.संगमा को 2012 में राष्ट्रपति का उम्मीदवार ज़रूर बनाया था.

4. आख़िर वर्तमान विपक्ष ने कितने आदिवासियों को राज्यपाल बनाया?

5. जब पिछले तीन महीने से चर्चा चल रही थी कि भाजपा किसी आदिवासी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना सकती है, तो क्या ऐसे में वर्तमान विपक्ष को तीन दशक तक भाजपाई रहे यशवंत सिन्हा से बेहतर कोई आदिवासी नेता पूरे देश में नहीं मिला?

6. विपक्ष ने तीन दशक तक भाजपाई रहे यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर कौनसा तीर मारा है? ये वो ही यशवंत सिन्हा हैं, जिन्होंने लगभग तीन दशक तक भाजपा की सेवा की और छोड़ते ही प्रगतिशील हो गये. जबकि इसे प्रगतिशीलता नहीं बल्कि मौक़ापरस्ती कहते हैं. विपक्ष चाहता तो एक पूर्व भाजपाई को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने की जगह किसी भी आदिवासी नेता को उम्मीदवार बना सकता था.

7. आख़िर आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी पाँचवीं अनुसूची को लागू क्यों नहीं किया गया है और आदिवासी समुदाय को धर्मकोड क्यों नहीं दिया गया है?

साथियों राष्ट्रपति चुनाव में वैसे तो दोनों उम्मीदवार RSS-BJP के हैं, फर्क बस इतना है कि एक मोदी विरोधी हैं और दूसरा मोदी समर्थक. यशवंत सिन्हा जी भी भाजपा और संघ के ही हैं, बस चेहरा विपक्ष का है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि विपक्ष वैचारिक रूप से दिवालिया हो चुका है. बाकि प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण होता है और यहाँ सवाल उस प्रतिनिधित्व का है, जो आदिवासी समुदाय को 75 वर्षों में नहीं मिला. आप इसे स्वीकार किजिए.

द्रोपदी मूर्मू जी कल क्या करेंगी और क्या नहीं, यह बाद की बात है लेकिन वो सिन्हा से तो बेहतर हैं. सवाल ये भी नहीं है कि द्रौपदी मुर्मू आदिवासी अस्मिता को लेकर कितनी सचेत राष्ट्रपति साबित होंगी. सवाल प्रतीक का है और सत्ता में आदिवासियों की भागीदारी का है. पहले भी कहा है और अब भी कह रहा हूँ कि बात हिस्सेदारी, सम्मान और प्रतिनिधित्व की है. हम 75 वर्षों से वर्तमान विपक्ष को वोट दे रहे हैं, और बदले में हमें कुछ नहीं मिल रहा है. तानाशाही और फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ वोट आदिवासी समुदाय दें और मलाई ग़ैर-आदिवासी चाटें, ऐसे नहीं चलेगा.

विपक्ष चाहता तो किसी आदिवासी को उम्मीदवार बनाकर अपने आदिवासी कोर वोट को साध सकता था और भाजपा को काउंटर कर सकता था लेकिन विपक्ष ने हमेशा की तरह अपने कोर वोट बैंक को इग्नोर किया. अब भी वक़्त है कि विपक्ष के लोग आदिवासी समुदाय को ज्ञान देने की बजाय आत्मचिंतन करके अपनी ग़लतियों से सीखें, वरना विपक्ष आदिवासीरूपी स्थायी वोट बैंक को खो देगा.

अंत में मैं इतना ही कहूँगा कि मैं बीजेपी-RSS की राजनीति के खिलाफ था, हूँ और रहूंगा. लेकिन सवाल अब भी यही रहेगा कि विपक्ष को हमेशा सवर्ण ही क्यों पसंद आते हैं? बीजेपी की इस राजनीति का विपक्ष के पास क्या काट है?

(अर्जुन मेहर दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र हैं, और AISA से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ता हैं.)

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