ओडिशा में वन अधिकार क़ानून 2006 को लागू करने के लिए बनाई गई फॉरेस्ट राइट्स एक्ट सेल (Forest Rights Act Cells) को भंग करने के फैसले ने आदिवासी मामलों के मंत्रालय को चौंका दिया है.
आदिवासी मामलों के मंत्रालय (Tribal Affairs Ministry) के एक अधिकार के हवाले से यह पता चला है कि पिछले मंगलवार यानि 17 फ़रवरी को ओडिशा के एसटी एवं एससी विकास विभाग ने कम से कम 50 सब डीविज़न स्तर पर स्थापित गई वन अधिकार सेलों को भंग करने का आदेश दे दिया गया है.
ओडिशा सरकार के इस कदम से केंद्र में आदिवासी मामलों के मंत्रालय को चौंका दिया है. वन अधिकार कानून 2006 को लागू करने के लिए इन सेलों की स्थापना केंद्र और राज्य सरकारों ने की थी.
इनका मकसद वन अधिकार क़ानून के तहत भूमि पट्टों से जुड़े दावों का शीघ्र निपटारा था.
केंद्र सरकार ने धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DA-JGUA) के तहत वन अधिकार क़ानून 2066 को तत्परता से लागू करने के लिए अतिरिक्त मैन पॉवर यानि कर्मचारियों की व्यवस्था की थी.
लेकिन ओडिशा सरकारने कई महीने पहले ही इस योजना के तहत नियुक्त किए गए कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी हैं. इन कर्मचारियों ने यह आग्रह किया था कि इन कर्मचारियों को वन अधिकार कानून सेल में शामिल कर लिया जाए.
ओडिशा वन अधिकार क़ानून के तहत पट्टे जारी करने वाला छत्तीसगढ़ के बाद दूसरा नंबर का राज्य है. लेकिन इसके साथ ही कड़वी सच्चाई यह भी है कि इस राज्य में वन अधिकार के तहत सबसे ज़्यादा दावे लंबित भी हैं.
आदिवासी मामलों के मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार ओडिशा में वन अधिकार क़ानून के तहत भूमि के दावों में से कम से कम 20 प्रतिशत दावे लंबित हैं.
ओडिशा वह राज्य है जहां देश के सबसे अधिक आदिवासी समुदाय रहते हैं.

