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राजस्थान: TSP क्षेत्र में आरक्षण को लेकर बढ़ता टकराव, आदिवासी संगठनों में गहरी नाराज़गी

आदिवासी संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे TSP क्षेत्र में आरक्षण से जुड़े किसी भी बदलाव का संगठित विरोध करेंगे.

राजस्थान के ट्राइबल सब-प्लान (TSP) क्षेत्रों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक तनाव गहराता दिख रहा है. गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति द्वारा उठाई गई नई मांग ने आदिवासी समुदायों में असंतोष पैदा कर दिया है और इसे उनके संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया जा रहा है.

क्या है नई मांग
गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति ने मांग की है कि TSP क्षेत्रों में लागू 50 प्रतिशत सामान्य/ओपन श्रेणी के आरक्षण को पुनर्गठित किया जाए. समिति का कहना है कि इस 50 प्रतिशत के भीतर ही OBC, MBC और EWS वर्गों के लिए अलग-अलग सब-कोटा तय किया जाए, ताकि इन वर्गों को प्रतिनिधित्व मिल सके.

आदिवासी संगठनों का कड़ा विरोध
इस मांग के सामने आते ही आदिवासी संगठनों ने तीखा विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि TSP क्षेत्र विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण के लिए बनाए गए हैं. ऐसे क्षेत्रों में आरक्षण ढांचे से छेड़छाड़ करना संविधान की भावना और पांचवीं अनुसूची का उल्लंघन है.

राजकुमार रोत का बयान
भारत आदिवासी पार्टी के नेता और सांसद राजकुमार रोत ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बिना जाति जनगणना और आदिवासी समाज से व्यापक एवं लोकतांत्रिक परामर्श के TSP ढांचे में कोई भी बदलाव अस्वीकार्य है. उनका कहना है कि TSP क्षेत्रों में आरक्षण व्यवस्था केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आदिवासियों के ऐतिहासिक अधिकारों और संरक्षण से जुड़ा विषय है.

संविधान और सामाजिक शांति का सवाल
आदिवासी नेताओं का तर्क है कि यदि TSP क्षेत्रों में आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को बदला गया, तो इससे न केवल आदिवासी समुदायों के शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, बल्कि क्षेत्र में सामाजिक संतुलन और शांति भी बिगड़ सकती है. उन्होंने चेतावनी दी है कि इस तरह के फैसले टकराव और असंतोष को जन्म दे सकते हैं, जिसके लिए सरकार जिम्मेदार होगी.

आगे की राह
फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर तूल पकड़ता जा रहा है. आदिवासी संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे TSP क्षेत्र में आरक्षण से जुड़े किसी भी बदलाव का संगठित विरोध करेंगे. वहीं, इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आदिवासी बहुल क्षेत्रों में नीतिगत फैसले लेते समय संविधान, सहमति और संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जा रही है या नहीं.

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