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तेलंगाना HC ने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत एक आदिवासी महिला की SC पुरुष से शादी को भंग कर दिया  

हाई कोर्ट ने मुख्य रूप से कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड शादी कानून की नज़र में कायम नहीं रह सकती. अगर दोनों में से कोई एक पक्ष इस अधिनियम के तहत नहीं आता है.

तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक अनुसूचित जनजाति (Scheduled tribe) महिला और अनुसूचित जाति (Schedule Caste) पुरुष के बीच विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act)के तहत भंग कर दिया है.

कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि अधिनियम अनुसूचित जनजाति सदस्यों पर लागू नहीं होता.

आदिवासी महिला ने क्रूरता और जबरन शादी के आधार पर तलाक़ की याचिका दायर की थी, जिसे 2014 में फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था.

वहीं जस्टिस के लक्ष्मण और वकिती रामकृष्ण रेड्डी की डिवीजन बेंच ने 19 जनवरी को एक फैसले में कहा कि “सिर्फ हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी करना या हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत रजिस्ट्रेशन कानूनी रूप से काफी नहीं है” क्योंकि हिंदू मैरिज एक्ट याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होता है जो एक अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित है.

महिला, जो निजामाबाद में डेंटल छात्रा थी, उसने आरोप लगाया कि एससी पुरुष (पुलिस कांस्टेबल) साल 2010 से उसका पीछा कर रहा था और मई 2012 में उसे जबरन नेल्लोर के एक मंदिर में ले गया और एसिड अटैक की धमकी देकर उससे शादी करने के लिए मजबूर किया.

उसने कथित तौर पर उससे कुछ दस्तावेजों पर साइन करवाए और बाद में अगस्त 2013 में उसे एक कथित शादी का सर्टिफिकेट दिया.

वहीं उस आदमी ने दावा किया कि उनके बीच सहमति से संबंध थे और उन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार शादी की थी.

2014 में तलाक़ की याचिका खारिज

इस सबके बाद महिला ने जब तलाक़ के लिए याचिका दायर की तो निजामाबाद के फैमिली कोर्ट-कम-एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के सामने महिला की शादी रद्द करने की याचिका जुलाई 2014 में खारिज कर दी गई, जिससे शादी को मान्यता मिल गई.

महिला के वकील ने हाई कोर्ट में तर्क दिया कि वह गोंड जनजाति से है और वह आदमी एक अनुसूचित जाति (माला) समुदाय से है और इसलिए हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधानों के तहत हुई शादी अमान्य है क्योंकि यह कानून इस मामले पर लागू नहीं होता है.

वहीं पुरुष के वकील ने कहा कि शादी महिला की मर्जी और सहमति से हिंदू मैरिज एक्ट के तहत हुई थी और उसके माता-पिता उसे उसके साथ वैवाहिक जीवन से बचने के लिए मजबूर कर रहे थे क्योंकि वह माला समुदाय से था और पुलिस कांस्टेबल था.

शादी कायम नहीं रह सकती

हाई कोर्ट ने मुख्य रूप से कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड शादी कानून की नज़र में कायम नहीं रह सकती. अगर दोनों में से कोई एक पक्ष इस अधिनियम के तहत नहीं आता है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला अनुसूचित जनजाति की थी, जिस पर अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता है. जब तक केंद्र सरकार अधिसूचना न जारी करे.

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह साबित करने के लिए न तो कोई दलील है और न ही कोई सबूत कि महिला ने आदिवासी रीति-रिवाजों को छोड़ दिया था या वह पूरी तरह से हिंदू पर्सनल लॉ के तहत आती थी.

कोर्ट ने कहा कि इसलिए प्रतिवादी का हिंदू विवाह अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन पर भरोसा उसके मामले को आगे नहीं बढ़ाता है क्योंकि रजिस्ट्रेशन उस चीज़ को वैध नहीं बना सकता जिसे कानून स्पष्ट रूप से बाहर करता है.

कोर्ट ने आगे कहा, “इसलिए, नतीजा यह निकलता है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होता है. और कथित शादी, जहां तक ​​इसे उक्त अधिनियम के तहत मान्यता देने की बात है, कानून की नज़र में अमान्य है.”

इसके अलावा हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को भी फटकार लगाई कि उसने कानूनी लागू होने के मूल मुद्दे पर फैसला किए बिना, हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों को लागू करके मामले का फैसला किया.

कोर्ट ने कहा, “जब अधिकार क्षेत्र ही इस तरह के लागू होने पर निर्भर करता है, तो उस पर फैसला करने में विफलता पूरे काम को अधिकार क्षेत्र के लिहाज़ से कमज़ोर बना देती है, जिसके लिए अपीलीय हस्तक्षेप ज़रूरी है.”

इस तरह हाई कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट ने “अधिकार क्षेत्र की गलती” की है.

अपील को मंज़ूरी देते हुए, हाई कोर्ट ने घोषणा की कि शादी कानून की नज़र में अमान्य और लागू करने योग्य नहीं है.

क्या कहता है हिंदू मैरिज एक्ट

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) अनुसूचित जनजातियों (STs) को उनके पारंपरिक कानूनों और स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए स्पष्ट रूप से बाहर रखता है.

धारा 2(2) में कहा गया है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 366(25) के तहत परिभाषित किसी भी अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता है, जब तक कि केंद्र सरकार अन्यथा सूचित न करे.

यह प्रावधान जनजातियों को विवाह, तलाक और विरासत के लिए अपनी परंपराओं वाले अलग-अलग जातीय समूहों के रूप में मान्यता देता है, जो अक्सर अलिखित होते हैं लेकिन समुदायों के भीतर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं.

सुप्रीम कोर्ट सहित अदालतों ने इस रोक को बरकरार रखा है, भले ही जनजातियां स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज अपना लें, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि उन्होंने हिंदू पर्सनल लॉ के लिए अपने रीति-रिवाजों को पूरी तरह से छोड़ दिया है.

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