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झारखंड के नए PESA नियमों से बीजेपी और आदिवासी संगठन दोनों क्यों नाराज़ हैं?

पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के खूंटी सांसद अर्जुन मुंडा ने कहा कि PESA एक्ट 1996 में कानून बना लेकिन राज्यों को सिर्फ़ इसे लागू करने के लिए नियम बनाने का अधिकार दिया गया था, न कि इसकी मूल भावना से छेड़छाड़ करने का.

पिछले महीने जब झारखंड कैबिनेट ने पंचायतों (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) को लागू करने के लिए लंबे समय से लंबित नियमों को मंज़ूरी दी तो सरकार ने इसे राज्य में आदिवासी स्वशासन को मज़बूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया.

लेकिन कुछ ही हफ़्तों में दशकों पुरानी मांग को पूरा करने के बजाय इस कदम ने राजनीतिक और सामाजिक दरारें खोल दी हैं. जिससे न सिर्फ़ विपक्षी BJP बल्कि आदिवासी समुदाय के कुछ वर्गों से भी आलोचना हो रही है.

विपक्षी पार्टी बीजेपी ने हेमंत सोरेन सरकार पर पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 की मूल भावना को कमजोर करने का आरोप लगाया है.

BJP का दावा है कि पंचायत प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) झारखंड नियम, 2025, आदिवासी स्व-शासन पर सीधा हमला है.

रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के खूंटी सांसद अर्जुन मुंडा ने हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला करते हुए उस पर PESA एक्ट की “आत्मा पर ही हमला” करने का आरोप लगाया.

1996 के कानून की “ठंडे खून से हत्या” बताते हुए, मुंडा ने आरोप लगाया कि यह ढांचा पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभाओं के “अधिकार को कमज़ोर करता है” और आदिवासी स्वशासन के पारंपरिक चरित्र को बदलने की कोशिश करता है.

मुंडा ने कहा कि PESA एक्ट 1996 में कानून बना लेकिन राज्यों को सिर्फ़ इसे लागू करने के लिए नियम बनाने का अधिकार दिया गया था, न कि इसकी मूल भावना से छेड़छाड़ करने का.

नियमों के कंटेंट पर आपत्ति जताते हुए मुंडा ने आरोप लगाया कि झारखंड PESA नियमों में ग्राम सभा की परिभाषा 1996 के केंद्रीय PESA एक्ट के मुताबिक नहीं है.

उन्होंने कहा कि एक्ट ग्राम सभा को पारंपरिक कानून, धार्मिक रीति-रिवाजों और पुरानी परंपराओं के आधार पर परिभाषित करता है. जबकि राज्य के नियमों ने इस परिभाषा को छिपा दिया है और सिर्फ़ “परंपरा” का ज़िक्र किया है, बिना इस शब्द को परिभाषित किए.

उन्होंने यह भी बताया कि बाकी नौ राज्य जहाँ PESA एक्ट लागू है, उन्होंने अपने नियम एक्ट के अनुसार ही बनाए हैं.

बीजेपी नेता ने सरकार पर पांचवीं अनुसूची वाले राज्य में जहां मान्यता प्राप्त आदिवासी आबादी है, आदिवासी चिंताओं के प्रति असंवेदनशील होने का भी आरोप लगाया और कहा कि हालांकि नियम कई पन्नों के हैं.

लेकिन वे “भावना में खोखले” हैं और राज्य प्रशासन के हाथों में अत्यधिक नियंत्रण देकर “भविष्य में संघर्ष पैदा करने का जोखिम” उठाते हैं.

मुंडा ने यह भी कहा कि झारखंड में PESA को लागू करने की मांग सालों से पेंडिंग थी और लोगों को कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा, जिसके बाद सरकार को लंबे समय की देरी के बाद नियम नोटिफाई करने पड़े.

मुंडा ने राज्य सरकार पर आदिवासी समाज के चरित्र और पहचान को बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया.

मुंडा ने कहा, “जैसे किसी व्यक्ति की पहचान उसके परिवार से बनती है, वैसे ही आदिवासी समाज का भी एक खास चरित्र होता है. सरकार ने इस चरित्र को बदलने की कोशिश की है.”

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि पांचवीं अनुसूची वाले इलाकों में सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे आदिवासी समुदायों के प्रति संवेदनशीलता से काम करेंगी लेकिन झारखंड सरकार ऐसा करने में नाकाम रही है.

आदिवासी संगठन विरोध कर रहे हैं

सत्ताधारी JMM के लिए राजनीतिक कहानी को और जटिल बनाने वाली बात यह है कि आदिवासी संगठनों से भी समानांतर विरोध सामने आ रहा है.

आदिवासी बचाओ मोर्चा ने अन्य आदिवासी समूहों के साथ मिलकर सार्वजनिक रूप से अधिसूचित नियमों का विरोध किया है, यह तर्क देते हुए कि वे PESA एक्ट के मूल उद्देश्य का उल्लंघन करते हैं.

झारखंड की पूर्व मंत्री और कार्यकर्ता गीताश्री उरांव ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि ये नियम स्वशासन की पारंपरिक प्रणालियों को सशक्त बनाने के बजाय राज्य के नियंत्रण को मज़बूत करते हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि PESA एक्ट में पारंपरिक कानूनों के साथ तालमेल बिठाने का प्रावधान है. लेकिन झारखंड के नियम 2001 के झारखंड पंचायती राज एक्ट (JPRA) के प्रावधानों के तहत बनाए गए हैं. जिससे ऊपरी स्तर की स्थानीय शासन संस्थाओं और राज्य सरकार को ग्राम सभा के फैसलों को पलटने की छूट मिल सकती है.

इन संगठनों का कहना है कि PESA एक्ट के तहत, ग्राम सभाओं को विकास परियोजनाओं पर वीटो पावर और छोटे वन उत्पादों पर पूरा मालिकाना हक मिलता है.

हालांकि, अधिसूचित नियमों में वन विभागों और राज्य एजेंसियों को केंद्र में रखा गया है और ग्राम सभाओं को सिर्फ सलाह देने वाली भूमिका तक सीमित कर दिया गया है, आदिवासी समूहों का कहना है.

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि पारंपरिक रूप से मान्यता प्राप्त सामुदायिक नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है और उनकी जगह सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों को लाया गया है.

ओरांव ने कहा, “यह आदिवासी संस्कृति और स्वायत्तता पर सीधा हमला है.”

हालांकि, JMM ने BJP के हमले और आदिवासी समूहों की आलोचना को गुमराह करने वाला और राजनीति से प्रेरित बताकर खारिज कर दिया.

पार्टी के महासचिव विनोद पांडे ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए उसके अपने रिकॉर्ड की ओर इशारा किया और कहा कि PESA एक्ट उसके सत्ता में रहने के कई सालों तक लागू नहीं हुआ, जिसमें अर्जुन मुंडा के मुख्यमंत्री रहने का समय भी शामिल है.

पांडे ने कहा कि अधिसूचित नियम “ग्राम सभा को कमजोर करने के बजाय मजबूत करते हैं” और संवैधानिक ढांचे के भीतर परंपरा और स्थानीय स्व-शासन को व्यावहारिक रूप देते हैं.

उन्होंने BJP पर राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए भ्रम फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि सोरेन सरकार रचनात्मक सुझावों के लिए तैयार है, लेकिन गलत सूचना बर्दाश्त नहीं करेगी.

राजनीतिक बयानबाजी से परे यह विवाद झारखंड के गठन के बाद से ही एक गहरी चुनौती को दिखाता है… क्योंकि यह बड़ा सवाल है कि आदिवासी रीति-रिवाजों और पारंपरिक स्व-शासन को उनके मूल स्वरूप को कमजोर किए बिना आधुनिक प्रशासनिक ढांचे में कैसे शामिल किया जाए.

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