HomeMain Bhi Bharatएक 'नेटवर्क डार्क ज़ोन' में जिंदगी कैसी होती है?

एक ‘नेटवर्क डार्क ज़ोन’ में जिंदगी कैसी होती है?

क्या आप पहले पटरी बिछाएंगे और फिर उस पर ट्रेन चलाएंगे और फिर पहले ट्रेन ख़रीद लेंगे और फिर आपको पटरी बिछाने का ख़्याल आएगा? भारत के आदिवासी इलाकों में डिजिटल सेवाएं आरंभ कर दी गई हैं, लेकिन उसके लिए ज़रूरी साधन उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं.

दुनिया भर में AI यानि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की ज़िंदगी को आसान बनाने में भूमिका और उसके कुछ ख़तरों पर बहस हो रही है. लेकिन भारत में अभी कई ऐसे इलाके हैं जहां मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट नहीं पहुंचा है.

इन इलाक़ों में शिक्षा, स्वास्थ्य या फिर संपर्क और समाचार तो छोड़िए, सरकार की तरफ़ से मिलने वाला मामूली राशन हासिल करना भी एक बेहद मुश्किल काम हो जाता है. इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क बहुत कमज़ोर या बिलकुल नहीं होने की वजह से महीनों तक लोगों को राशन के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं.

यह स्थिति देश के आदिवासी बहुल इलाकों में अक्सर नज़र आती है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा के बाद महाराष्ट्र में हमने सतपुड़ा में बसे आदिवासी बस्तियों में यह नेटवर्क डार्कज़ोन में लोगों की ज़िंदगी और बेबसी को क़रीब से देखा.

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