वन अधिकार क़ानून 2006 के बावजूद आदिवासी के सामुदायिक हक़ नहीं मिले हैं

भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत आदिवासी इलाक़ों में ज़मीन का अधिग्रहण तब तक नहीं हो सकता जब तक ग्राम सभा की मंज़ूरी नहीं मिल जाती है. उसी तरह से पर्यावरण संबंधी अनुमति देने से पहले यह देखा जाना ज़रूरी है कि वन अधिकार क़ानून 2006, आदिवासी इलाक़ों में समुदाय के अधिकार को मानता है.

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2006 वन अधिकार क़ानून लागू होने के बाद कम से कम 18 लाख लोगों को ज़मीन के पट्टे प्राप्त हुए हैं. इस लिहाज़ से देखा जाए तो इस क़ानून के बनने के बाद इस मोर्चे पर अच्छा काम हुआ है.

लेकिन जब इस क़ानून में समुदाय के अधिकार का भी एक और महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया था. इस मोर्चे पर अभी तक सरकारें अधिक सफल नहीं रही हैं. यह मसला बुधवार, 16 मार्च को राज्य सभा में चर्चा में आया. इस मसले को कांग्रेस के सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने उठाया.

बजट की अनुपूरक माँगो पर आदिवासी मंत्रालय से जुड़ी चर्चा में उन्होंने आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा से तीन सवाल किए थे. उन्होंने अपने पहले सवाल में यही बात पूछी कि जहां व्यक्तिगत पट्टे देने का काम हुआ है वहीं समुदाय के अधिकारों के मामले में इस क़ानून को लागू करने में सफलता क्यों नहीं मिली है.

उन्होंने कहा कि वन अधिकार क़ानून के दो मक़सद थे. पहला मक़सद था कि आदिवासियों और जंगल में रहने वाले दूसरे समुदायों के लोगों को ज़मीन व्यक्तिगत अधिकार मिले. इसके साथ ही जंगल पर समुदाय का अधिकार भी स्वीकार किया गया था.

उन्होंने आदिवासी मंत्रालय से यह भी पूछा कि जनजातीय क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण से जुड़ी अनुमति देने से पहले क्या वन अधिकार क़ानूनों के प्रावधानों का ध्यान रखा जा रहा है.

उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत आदिवासी इलाक़ों में ज़मीन का अधिग्रहण तब तक नहीं हो सकता जब तक ग्राम सभा की मंज़ूरी नहीं मिल जाती है. उसी तरह से पर्यावरण संबंधी अनुमति देने से पहले यह देखा जाना ज़रूरी है कि वन अधिकार क़ानून 2006, आदिवासी इलाक़ों में समुदाय के अधिकार को मानता है.

इस मसले पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद संसद में बजट सत्र में आदिवासी मंत्रालय से जुड़े मसलों पर चर्चा की जा रही है. इन सवालों के जवाब में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों की चिंता भारत सरकार को है.

उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में सरकार पारदर्शिता से काम कर रही है. हालाँकि उन्होंने इस सिलसिले में कोई आँकड़े संसद में पेश नहीं किए. अर्जुन मुंडा ने यह नहीं बताया कि आदिवासियों को अभी तक वन अधिकार के तहत कितने सामुदायिक पट्टे दिए गए हैं.

अर्जुन मुंडा ने दावा किया कि केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय एक दूसरे के साथ तालमेल बना कर आदिवासी इलाक़ों के विकास के लिए काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि देश में आदिवासियों के साथ जो अन्याय इतिहास में हुआ है उसे दुरूस्त करने के लिए वर्तमान सरकार काम कर रही है.  

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