गुजरात के बनासकांठा ज़िले के मोटा पिपोदरा गांव के 29 आदिवासी परिवार अब वापस अपने घर लौटने वाले हैं.
कोडरवी आदिवासी समुदाय के करीब 300 लोग पिछले 12 वर्षों से अपने ही गांव से दूर रह रहे थे.
अब इन आदिवासी परिवारों की ये सामूहिक वापसी 17 जुलाई को होगी.
कौन सी परंपरा बनी पलायन की वजह?
इन परिवारों को वर्ष 2013 में अपने ही गांव से पलायन करना पड़ा था.
इनके पलायन का कारण था ‘छड़ उतारू’ नामक एक पुरानी सामाजिक परंपरा.
गुजरात के कुछ आदिवासी समुदायों विशेषकर, डांग, साबरकांठा और बनासकांठा जैसे क्षेत्रों में प्रचलित यह परंपरा न्याय, सामाजिक दंड और सुलह-सफाई से जुड़ी होती थी.
जब किसी व्यक्ति या पक्ष को सामूहिक रूप से सज़ा दी जाती थी या उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता था, तब उसका ‘छड़ चढ़ाया जाता’ था. यानी उसके खिलाफ निर्णय लिया गया था.
जब वह व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार कर लेता, माफी मांगता और पंचायत या समुदाय की शर्तें मान लेता था तो समुदाय के मुखिया या बुजुर्ग उसका ‘छड़ उतारते’ थे. यानी उसे समाज में दोबारा स्वीकार कर लिया जाता था.
इसी परंपरा के चलते इन परिवारों को सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा और उन्हें अपना गांव छोड़ना पड़ा.
कुछ गांव छोड़कर पलनपुर गए, कुछ सूरत. लेकिन गांव की मिट्टी और अपनी जमीन की याद कभी नहीं छूटती.
पुलिस और पंचायत ने मिलकर बनाई वापसी की योजना
बनासकांठा पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए गांव के बुजुर्गों, पंचायत सदस्यों और समाज के नेताओं के साथ कई दौर की बैठकें कीं.
संवाद, समझ और सहमति के बाद ये रास्ता बना कि इन परिवारों को सुरक्षा, सम्मान और सुविधा के साथ दोबारा बसाया जा सकता है.
सालों से वीरान पड़ी इन परिवारों की 8.5 हेक्टेयर पुश्तैनी ज़मीन को भी अब प्रशासन ने साफ करवा कर खेती लायक बनाया है.
इस ज़मीन पर बीजों की पहली बुवाई कल इन परिवारों की वापसी के साथ-साथ ही होगी.
गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी ने बताया कि इन परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर दिए जाएंगे.
दो मकान पहले ही बन चुके हैं और बाकी 27 का निर्माण जल्द शुरू होगा. बच्चों को शैक्षिक किट्स और परिवारों को राशन सामग्री भी दी जाएगी.
17 जुलाई को होगा स्वागत समारोह
गांव लौटने वाले इन परिवारों का भव्य स्वागत किया जाएगा.
कार्यक्रम में पूजा, बीज बुवाई और भविष्य की पुनर्वास योजनाओं पर चर्चा होगी.
मंत्री हर्ष सांघवी ने कहा कि कोई भी आदिवासी परिवार सिर्फ परंपराओं के नाम पर उजड़ने को मजबूर न हो. अब समय है कि पुरानी रुकावटों को पीछे छोड़कर विकास की राह पर चला जाए.
(Image is for representation purpose only)

