‘तारपा’ रिश्तों की एक अटूट ज़ंजीर, साथ-साथ जीने का प्रण

कमर पर जब एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं तो वो देखने और सीखने लायक़ होता है. इसमें सामूहिकता, एकता और सहयोग नज़र आता है. एक दूसरे का हाथ जिस तरह से पकड़ते हैं तो ऐसी एक मज़बूत ज़ंजीर बनती है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता है. सा लगता है कि ये एक दूसरे के लिए मर-मिटने के लिए तैयार हैं. साथ-साथ लड़ने के लिए तैयार हैं. साथ जीने के लिए तैयार हैं. सब कुछ साथ-साथ.

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महाराष्ट्र के पालघर ज़िले की जव्हार तहसील के सोनगिरी पाड़ा नाम के गांव में लोगों से मिलने और बातचीत का सिलसिला देर शाम तक चलता रहा. अंधेरा घिरने लगा तो हमने यहाँ के लोगों से विदा लेनी चाही. तब इस गाँव के लोगों ने बताया कि पास में ही एक और गाँव है पारधी पाड़ा. 

पारधी पाड़ा भी वारली आदिवासियों का ही गाँव हैं. उस गाँव के लोग चाहते हैं कि हम उनसे भी मिलते हुए जाएँ. क़रीब सात ही बजे थे लेकिन घना अंधेरा घिर चुका था. दिन भर लू के थपड़ों ने हमारी टीम को बुरी तर से थका दिया था.

शाम को मौसम में ठंडक थी लेकिन थकान इतनी थी कि हाँ कहने की हिम्मत नहीं थी. मैंने उनसे कहा कि फिर कभी उस गाँव भी जाएँगे, फ़िलहाल जव्हार चलते हैं. क्योंकि पहुँचते पहुँचते क़रीब दो घंटे लग जाएँगे. अगर पारधी पाड़ा जाएँगे तो देर रात हो जाएगी और जंगल के रास्ते में हम कहीं भटक सकते हैं.

इस पर एकनाथ और शांताराम ने कहा कि पारधी पाड़ा हमारे रास्ते में ही पड़ेगा और वहाँ ज़्यादा समय नहीं रूकना होगा. इसके अलावा उन्होंने कहा कि उनके गाँव का एक आदमी बाक़ायदा हमें जव्हार तक पहुँचाने जाएगा.

अब हमारे पास ना कहने का विकल्प नहीं बचा था. सोनगिरी पाड़ा से कंधों पर सामान लाद कर, नदी पार कर गाड़ी तक पहुँचे. वहाँ से पारधी पाड़ा के लिए निकल पड़े. क़रीब 4-5 किलोमीटर चल कर पारधी पाड़ा पहुँच गए.

आधी रात तक का इंतज़ार

गाँव में लोग हमारे इंतज़ार में थे. गाड़ी से उतर कर कुएँ का ठंडा पानी पिया और प्लास्टिक की कुर्सियों पर हम लोग लगभग पसर गए थे. गाँव के लोगों ने बताया कि वो आज हमें तारपा संगीत और नाच दिखाना चाहते हैं. 

यह सुनते हुए मैंने टीम के कैमरामैन साथियों की तरफ़ देखा दो उन्होंने तुरंत हामी भर दी. हालाँकि उस हामी में कोई दम तो नहीं था. फिर भी मैंने यह मान लिया कि हम तारपा नाच की रिकॉर्डिंग करने को तैयार हैं.

हमने गाँव के लोगों से कहा कि जितना जल्दी हो सके, कार्यक्रम शुरू कर दिया जाए. कुछ जवान लड़कों ने फुर्ती दिखाते हुए इधर-उधर आना जाना शुरू किया. धीरे धीरे लोग उस आँगन में जमा होने लगे जहां हम बैठे थे.

लेकिन 9 बजे तक यानि क़रीब दो घंटे बीत जाने पर भी तारपा या तारपा बजाने वाले का कहीं अता-पता नहीं था. टीम की बेचैनी बढ़ रही थी. हमें अगले दिन सुबह 5 बजे डहाणू के लिए भी निकलना था. मैंने गाँव के लोगों से कहा कि अगर कुछ मुश्किल हो रही है तो तारपा का कार्यक्रम छोड़ सकते हैं.

लेकिन गाँव के लोग चाहते थे कि हम उनका तारपा नाच ज़रूर देखें. अब यह इमोशनल मामला बन चुका था. मैंने टीम को सूचित कर दिया कि अब जितना समय लगे, हम कार्यक्रम रिकॉर्ड करके ही निकलेंगे. 

थोड़ी देर बाद एक घर से तारपा की आवाज़ आनी शुरू हुई तो मुझे इत्मिनान हो गया कि अब कार्यक्रम कभी भी शुरू हो सकता है. इस बीच गाँव के कुछ लड़के आँगन में एक बड़ी लाइट लगाने की कोशिश करते रहे जो आख़िरकार बेकार साबित हुई.

तब हमने आँगन में अपनी लाइट्स लगा दी और गाँव के लोगों से कहा कि अब कार्यक्रम शुरू किया जा सकता है. तब हमें बताया गया कि दरअसल गाँव में जो तारपा है उसके सुर ठीक से नहीं लग रहे हैं. उसकी मरम्मत करने की कोशिश भी नाकाम हो चुकी है.

अब मेरी हिम्मत भी जवाब दे रही थी. मैंने उनसे कहा कि अब वो हमें अनुमति दें. क्योंकि दस बज चुके हैं और हम तुरंत भी निकलें के तो 12 बजे से पहले गेस्ट हाउस नहीं पहुँच पाएँगे. अगले दिन सुबह हमें जल्दी उठना भी है और फिर सफ़र और दिन भर का काम है.

लेकिन गाँव के लोगों ने कहा कि पास के ही गाँव से तारपा मंगाया गया है, अगर हो सके तो हम थोड़ा और रूक जाएँ. गाँव के लोगों के भाव देख कर हमें रूकना ही पड़ा. मैंने उनसे पूछा की क्या हर गाँव में एक- दो ही तारपा होते हैं.

गाँव के लोगों ने बताया कि तारपा दशहरे से लेकर दिवाली तक बजाया जाता है. उसके बाद इसे रख दिया जाता है. लंबे समय तक रखे रहने से यह वाद्ययंत्र कई बार बिगड़ जाता है. दशहरे से कुछ दिन पहले तारपा को दुरूस्त किया जाता है.

गाँव और घर ही गुरूकुल है

गाँव की तरफ़ पगडंडी पर एक हल्की लाइट नज़र आई जो शायद टॉर्च की थी. उम्मीद बंधी और आख़िरकार एक लड़का तारपा ले कर प्रकट हो गया. क़रीब 11.30 बजे तारपा बजना शुरू हुआ. जब तारपा बजा और नाच शुरू हुआ तो कैमरामैन और मेरी थकान मानो उड़ गई थी.

पीठ के पीछे एक दूसरे के हाथ मज़बूती से पकड़े नाचते लोगों में दर्शकों में से दौड़ कर अचानक कोई भी शामिल हो जाता. ऐसा तालमेल जैसे महीनों से साथ साथ रिहर्सल कर रहे हों.

नाच-गाना बंद हुआ तो मैंने तारपा बजा रहे रामादास से पूछा कि उनके गाँव में उनके अलावा कितने लोग तारपा बजाते हैं. उन्होंने बताया कि वो दो लोग हैं जो इस वाद्ययंत्र को बजा सकते हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने यह वाद्ययंत्र किससे बजाना सीखा तो वो हंस दिए.

शायद उन्हें मेरा सवाल अजीब लगा था. फिर भी मैं उनकी तरफ़ देखता रहा तो जवाब मिला, ‘डोकरा’ से सीखा. यानि गाँव के बुजर्गों से सीखा था. तारपा बजाने या नाचने के लिए इन आदिवासियों को किसी गुरूकुल या मास्टर की ज़रूरत नहीं होती है.

इनके घर और गाँव ही इनके गुरूकुल हैं. 

तारपा बनाम डीजे

लेकिन रामदास की एक चिंता है कि अब धीरे धीरे तारपा बजाने वाले कम होते जा रहे हैं. उसकी वजह है कि अब तारपा की अगर डीजे ने ले ली है. ख़ैर उनसे बातचीत ख़त्म हुई और आधी रात के बाद हमने पारधी पाड़ा के लोगों से विदा ली. 

अगले दिन सुबह पाँच बजे हम लोग डाहणू के लिए निकल पड़े. यहाँ के झारली पाड़ा और आस-पास के कई गाँवों में सारा दिन घूमते रहे. शाम को पता चला की झारली पाड़ा में तारपा नाच होने वाला है. हम लोगों को वहाँ पर बुलाया गया है.

आज हमें कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि अगले दिन भी हमें इसी इलाक़े में रहना था और गेस्ट हाउस भी दूर नहीं था. शाम को हम झारली पाड़ा में पहुँचे तो एक बड़े से मैदान में पानी छिड़क कर पूरी तैयारी थी. थोड़ी ही देर में ही गाँव की महिलाएँ, लड़कियाँ और औरतें जमा हो गए.

एक बड़ा स्पीकर लगा दिया गया था जिस पर फ़ोन से तारपा म्यूज़िक शुरू कर दिया गया. जैसे ही म्यूज़िक शुरू होता है सब मिल कर नाचना शुरू कर देते हैं. इस नाच की गति और लय चकित करने वाली थी. इस नाच में शामिल एक लड़के से मैंने पूछा कि तारपा का म्यूज़िक तो है पर तारपा नहीं है.

इस नाच में शामिल अश्वनी की उम्र 14-15 साल होगी. वो अपने साथियों का हाथ मज़बूती से पकड़े नाच रही थीं. मैंने उनसे पूछा की एक बार में वो कितनी देर तक तारपा नाच में शामिल रह सकती हैं.

वो कहती हैं कि एक बार जब वो शामिल होती हैं तो कम से कम एक घंटा नाचती हैं. उसके बाद ब्रेक लेती हैं और फिर नाच में शामिल हो जाती हैं.

इसी नाच में शामिल एक बुजुर्ग महिला ने मुझे बताया था कि वो एक बार नाचना शुरू करती हैं तो 4-5 घंटा कम से कम नाचती ही हैं.

दरअसल तारपा नाच एक लगातार चलने वाला नाच है. वैसे यह बात सभी आदिवासी नृत्यों के बारे में कही जा सकती है. जो लोग थकते जाते हैं वो बाहर आते जाते हैं और नए लोग नाच में शामिल होते जाते हैं.

रिश्तों की मज़बूत ज़ंजीर

झारली पाड़ा में हो रहे इस नाच में शामिल लोगों में लगभग हर उम्र के लड़के लड़कियाँ और औरतें शामिल थे. जब ये लोग नाच रहे थे तो हमने नोटिस किया कि गाँव के छोटे बच्चे एक तरफ़ अपनी माँओं, भाई-बहनों की ही तरह समूह बना कर नाच रहे हैं.

आदिवासी बचपन से ही कैसे नाचना सीख जाते हैं, इस सवाल का जवाब भी हमारे सामने था. इसके अलावा मुझे हमेशा लगता है कि आदिवासियों की शारीरिक बनावट के साथ साथ उनके मन की बनावट भी ऐसी होती है कि नाच उनके भीतर रहता ही है.

कमर पर जब एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं तो वो देखने और सीखने लायक़ होता है. इसमें सामूहिकता, एकता और सहयोग नज़र आता है. एक दूसरे का हाथ जिस तरह से पकड़ते हैं तो ऐसी एक मज़बूत ज़ंजीर बनती है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता है.

ऐसा लगता है कि ये एक दूसरे के लिए मर-मिटने के लिए तैयार हैं. साथ-साथ लड़ने के लिए तैयार हैं. साथ जीने के लिए तैयार हैं. सब कुछ साथ-साथ.

क्या उन्हें डीजे पर ही नाचना ज़्यादा अच्छा लगता है. उस लड़के के जवाब में मुझे मेरी दुविधा का जवाब मिल गया था. इस लड़के ने कहा, “ आदिवासी संस्कृति की पहचान तारपा है. तारपा होना चाहिए, लेकिन डीजे में फ़ायदा ये है कि तारपा बजाने वाला ना भी हो तो भी फ़ोन से ही आप तारपा म्यूज़िक बजा सकते हैं.”

मुझे भी यही लगा कि तारपा को बचाया जाना ज़रूरी है. लेकिन यह समझना कि तारपा सिर्फ़ डीजे की वजह से मर रहा है शायद सही समझ नहीं होगी. इसके और भी कई कारण मिलेंग, जब उनकी तलाश की जाएगी.

डीजे के ज़रिए वाद्ययंत्र ना सही कम से कम नाच तो ज़िंदा रहेगा. 

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