HomeLaw & Rightsदुनिया भर के आदिवासियों ने अपने पुरखों की ज़मीन पर दावा ठोका

दुनिया भर के आदिवासियों ने अपने पुरखों की ज़मीन पर दावा ठोका

नैरोबी में हुई बैठक में दुनिया भर के आदिवासियों ने कहा कि अगर पर्यावरण, वन्यजीव और जंगल को बचाना है तो वह आदिवासी समुदायों के नेतृत्व में होना चाहिए.

दुनिया के 16 देशों से आए आदिवासी प्रतिनिधियों ने मांग की है कि जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण के नाम पर छीनी गई उनके पुरखों की जमीन उन्हें वापस लौटाई जाए.

केन्या की राजधानी नैरोबी में पहली बार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से संरक्षण परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ एक मंच पर आए हैं. इस बैठक के बाद ‘नैरोबी घोषणा’ जारी की गई.

इस घोषणा में कहा गया है कि जंगल और वन्यजीवों को बचाने के नाम पर आदिवासी समुदायों की जमीन पर कब्जा किया गया और उनकी सहमति के बिना वहां राष्ट्रीय उद्यान (National Parks), टाइगर रिजर्व (Tiger Reserves), वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries) और अन्य संरक्षित क्षेत्र बनाए गए.

नैरोबी में आयोजित ‘Our Land, Our Nature’ बैठक में 16 देशों के करीब 60 आदिवासी प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. भारत से Jenu Kuruba समुदाय के प्रतिनिधि भी इस बैठक में शामिल हुए.

इस बैठक में भारत के उत्तर-पूर्व के आदिवासी कार्यकर्ता प्रणब डोले को जुलाई में गिरफ्तारी का मामला भी उठाया गया. वे काजीरंगा नेशनल पार्क के पास एक लग्जरी होटल परियोजना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे. 

नैरोबी बैठक में शामिल लोगों ने आशंका व्यक्त करते हुए का कि इस परियोजना से वहां के आदिवासी लोगों पर असर पड़ सकता है.

प्रणब डोले इस बैठक में बोलने वाले थे, लेकिन गिरफ्तारी और जेल में होने के कारण वह इसमें शामिल नहीं हो सके.

इस बैठक में यह दावा किया गया कि अफ्रीका, एशिया और अमेरिका में कम से कम 30 लाख आदिवासी लोग संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से प्रभावित हो रहे हैं. 

उनका दावा है कि संरक्षण के नाम पर दुनिया भर में 110 करोड़ हेक्टेयर से अधिक आदिवासी जमीन छीनी गई है.

हमारी जमीन छोड़ो और हमारे अधिकारों का सम्मान करो

आदिवासी प्रतिनिधियों ने दुनिया की कई बड़ी संरक्षण संस्थाओं से भी अपनी जमीन और अधिकारों का सम्मान करने की मांग की है. इनमें WWF, Wildlife Conservation Society, African Parks और UNESCO जैसी संस्थाओं के नाम लिए गए हैं.

नैरोबी घोषणा में कहा गया है कि अगर संरक्षण संस्थाएं आदिवासी लोगों के अधिकारों का सम्मान नहीं करतीं तो उन्हें उनकी जमीन छोड़नी होगी.

इस सम्मेलन में मौजूद प्रतिनिधियों का कहना था कि संरक्षण का नेतृत्व आदिवासी समुदायों के हाथ में होना चाहिए, क्योंकि वे अपनी जमीन, जंगल और प्रकृति को बेहतर तरीके से समझते हैं.

संरक्षण के नाम पर जमीन लेने का आरोप

नैरोबी घोषणा में कहा गया है कि कई दशकों से संरक्षण के नाम पर आदिवासी समुदायों की जमीन ली जाती रही है.

इन जमीनों को राष्ट्रीय उद्यान, टाइगर रिजर्व, वन्यजीव अभयारण्य, कंजरवेंसी और ट्रॉफी हंटिंग रिजर्व में बदला गया. कई मामलों में स्थानीय समुदायों की सहमति नहीं ली गई.

इस सिलसिले में जारी घोषणा में यह भी कहा गया है कि आदिवासी इलाकों को कार्बन मार्केट, जैव-विविधता क्रेडिट और दूसरे ऑफसेट कार्यक्रमों के जरिए बाजार का हिस्सा बनाया जा रहा है.

आदिवासी प्रतिनिधियों का आरोप है कि इन योजनाओं के नाम पर बड़ी कंपनियों के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कामों को ‘ग्रीन’ दिखाया जा रहा है.

खनन और बड़े प्रोजेक्ट पर भी सवाल

इस घोषणा में कहा गया है कि कुछ इलाकों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किए जाने के बावजूद वहां बाद में खनन, बड़े प्लांटेशन और दूसरे व्यावसायिक प्रोजेक्ट शुरू किए जाते हैं.

इनमें रबर, पाइन, चाय, कॉफी, सोयाबीन और सागौन के बड़े व्यावसायिक बागान शामिल हैं. 

आदिवासी प्रतिनिधियों ने सफारी पर्यटन पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि कई जगहों पर पर्यटन परियोजनाएं आदिवासी समुदायों और उनके पूर्वजों से जुड़े स्थानों का सम्मान नहीं करतीं.

इस अंतरराष्ट्रीय बैठक के बाद आदिवासी प्रतिनिधियों ने Indigenous Land Alliance नाम से एक नया नेटवर्क भी बनाया है.

इसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों की जमीन और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना और संरक्षण के ऐसे मॉडल को बढ़ावा देना है जिसमें आदिवासी समुदाय खुद नेतृत्व करें.

नैरोबी घोषणा में कहा गया है कि प्रकृति संरक्षण और आदिवासी अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. आदिवासी समुदाय चाहते हैं कि उनकी जमीन और जंगलों की रक्षा उनके अधिकारों और उनकी सहमति के साथ की जाए.

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