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आदिवासी बच्चों की मौत को ‘बहुत गंभीर’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया

याचिका में दावा किया गया है कि सही ट्रांसपोर्ट, ट्रेंड हेल्थकेयर स्टाफ, जांच की सुविधाओं और इमरजेंसी रेफरल सर्विस की कमी के कारण परिवार बिना क्वालिफिकेशन वाले डॉक्टरों या पारंपरिक इलाज पर निर्भर रहने को मजबूर थे.

मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के बैगा-बहुल बिरसा और बैहर ब्लॉक में खसरा-रूबेला और गंभीर कुपोषण के कारण 30 से ज़्यादा आदिवासी बच्चों की मौत के बाद, सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है.

इसमें ‘महामारी रोग अधिनियम, 1897’ के तहत इन इलाकों को महामारी-संभावित क्षेत्र घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई है.

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से वकील वरुण ठाकुर की दलीलें सुनने के बाद केंद्र सरकार, राज्य सरकार, NHRC और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया.

तीन राज्यों को नोटिस जारी

दरअसल, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में कुपोषण के कारण बच्चों की मौत को “बहुत गंभीर” मामला बताया.

कोर्ट ने केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर इस मामले में तुरंत दखल देने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर जवाब मांगा है.

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच, मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के रहने वाले अजब लाल लिलहारे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

याचिका में गंभीर कुपोषण और रोकी जा सकने वाली बीमारियों के कारण आदिवासी बच्चों की कथित मौतों का मुद्दा उठाया गया था.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रशासनिक लापरवाही, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं, कुपोषण और समय पर टीकाकरण सुनिश्चित न कर पाने के कारण दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में बच्चों की मौत हुई.

इसमें प्रभावित परिवारों के लिए मुआवज़े, सुरक्षित पेयजल और पौष्टिक भोजन की व्यवस्था करने, और आदिवासी समुदाय के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की मांग की गई है.

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों को जानकारी देने के बावजूद, बुरी तरह प्रभावित आदिवासी इलाकों में बच्चे रोज़ मर रहे हैं.

याचिका में खसरा-रूबेला के प्रकोप और गंभीर कुपोषण के कारण ‘विशेष रूप से कमज़ोर आदिवासी समूहों’ (PVTG) के दर्जनों बच्चों की मौत का ज़िक्र किया गया था.

याचिकाकर्ता का कहना था कि इन इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में गंभीर कमियां हैं. जैसे – मेडिकल अधिकारियों की कमी, टीकाकरण अभियान का असरदार न होना, और आंगनवाड़ी केंद्रों के ज़रिए ‘टेक-होम राशन’ और पोषण संबंधी सामान का वितरण बंद होना.

प्रशासनिक लापरवाही और सरकारी तंत्र की विफलता

याचिका में कहा गया है कि आदिवासियों के आवास, जीवन और अस्तित्व की रक्षा के लिए कई कानूनी प्रावधान होने के बावजूद सरकारी व्यवस्था पूरी तरह विफल रही.

याचिकाकर्ता का आरोप है कि एक ऐसे वायरल संक्रमण ने, जिसका इलाज संभव था, पहले से ही कमजोर स्थिति में रह रहे आदिवासी समुदाय को भारी नुकसान पहुंचाया.

याचिका के अनुसार, जनवरी 2026 में ही जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को लिखित रूप में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी. इसके बावजूद सरकारी तंत्र ने समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए और प्रशासनिक निष्क्रियता बनी रही.

पत्रकारों और स्वास्थ्यकर्मियों पर प्रतिबंध लगाने वाले आदेश को चुनौती

याचिका में बालाघाट के अपर जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 3 सितंबर को जारी एक आदेश को भी चुनौती दी गई है.

यह आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत जारी किया गया था.

इस आदेश के अंतर्गत नागरिकों, पत्रकारों और स्वास्थ्यकर्मियों को सरकारी कार्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों के अंदर की परिस्थितियों की तस्वीरें लेने, वीडियो या रील बनाने और उनसे संबंधित जानकारी सोशल मीडिया पर प्रकाशित करने से प्रतिबंधित किया गया था.

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रतिबंध का उद्देश्य प्रशासनिक विफलताओं से जुड़े साक्ष्यों को सामने आने से रोकना था. याचिका में इसे संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है.

हालांकि, बालाघाट प्रशासन ने आदेश जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर उसे वापस ले लिया था.

प्रशासन ने कहा था कि आदेश जल्दबाजी में जारी किया गया था और इसका उद्देश्य मीडिया कवरेज को रोकना नहीं था.

दूरदराज की बस्तियों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव

याचिका के अनुसार, प्रभावित बैगा जनजातीय बस्तियां दूरदराज के वन क्षेत्रों में स्थित हैं. कुछ गांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से लगभग 35 से 40 किलोमीटर दूर हैं.

याचिका में दावा किया गया है कि सही ट्रांसपोर्ट, ट्रेंड हेल्थकेयर स्टाफ, जांच की सुविधाओं और इमरजेंसी रेफरल सर्विस की कमी के कारण परिवार बिना क्वालिफिकेशन वाले डॉक्टरों या पारंपरिक इलाज पर निर्भर रहने को मजबूर थे.

याचिका में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर पहुंच नहीं होने से बच्चों की स्थिति बिगड़ती गई और जरूरी चिकित्सा सहायता मिलने में देरी हुई.

जनवरी 2026 में ही बीमारी फैलने की चेतावनी दी गई थी

याचिका में कहा गया है कि दिसंबर 2025 में इलाके में लगे एक विंटर कैंप के दौरान कम्युनिटी वर्कर्स ने बच्चों में तेज बुखार, स्किन पर रैशेज, सांस लेने में तकलीफ और शरीर के बहुत कमजोर होने (सीवियर फिजिकल वेस्टिंग) जैसे लक्षण देखे.

इसमें दावा किया गया है कि 4 जनवरी 2026 को बालाघाट-सिवनी संसदीय क्षेत्र के सांसद को एक लिखित शिकायत दी गई थी. इसमें बच्चों में तेजी से फैल रही महामारी के बारे में चेतावनी दी गई थी और मेडिकल स्पेशलिस्ट, बच्चों के डॉक्टर (पीडियाट्रिशियन) और मोबाइल हेल्थ टीमों को तुरंत तैनात करने की मांग की गई थी.

याचिका में पहली मौत पांच साल की बच्ची रूही परास्ते की बताई गई है. आरोप है कि 18 मई 2026 को बिरसा ब्लॉक के मतला गांव में उसकी मौत हो गई. उसे लंबे समय से बुखार था, शरीर पर गंभीर रैशेज थे और सांस लेने में तकलीफ का इलाज नहीं हो पाया था.

याचिका में बताया गया है कि इसके बाद बोंडारी, मछुलधा, कोंडेकासा, कोरक, कोटबीर कोना, गतिया और तेंदुहाही जैसे गांवों में भी मौतें हुईं.

याचिका में इन मौतों के पीछे खसरा-रूबेला संक्रमण और गंभीर कुपोषण के संयुक्त प्रभाव को जिम्मेदार बताया गया है.

इसके अनुसार, टीकाकरण का अपर्याप्त कवरेज, पोषण की कमी और चिकित्सा सहायता मिलने में देरी ने बच्चों को ऐसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता था.

बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में कथित विफलता

याचिका में आदिवासी परिवारों के बच्चों के लिए पोषण संबंधी सहायता में कमी का भी मुद्दा उठाया गया है.

इसमें आरोप लगाया गया है कि आदिवासी शिशुओं के लिए अतिरिक्त पौष्टिक भोजन की आपूर्ति बंद कर दी गई थी. साथ ही, संयुक्त परिवारों को मिलने वाले राशन को केवल एक सदस्य के हिसाब से सीमित किए जाने से बच्चों में कुपोषण की समस्या और गंभीर हुई.

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए घर ले जाने वाले पोषण आहार की आपूर्ति क्षेत्र में बंद कर दी गई थी.

याचिकाकर्ता के अनुसार, बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य संबंधी सहायता में इन कमियों ने बीमारी के प्रकोप के दौरान उनकी स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया.

याचिकाकर्ता का आरोप है कि सरकार ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की सुरक्षा के लिए उपलब्ध कल्याणकारी व्यवस्थाओं और योजनाओं का पर्याप्त उपयोग नहीं किया.

सुप्रीम कोर्ट से की गई मांगें…

जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई मांगों को पूरा करने का अनुरोध किया गया है.

1. बालाघाट जिले के प्रभावित बैगा बहुल बिरसा और बैहर विकासखंडों को महामारी रोग अधिनियम, 1897 के तहत महामारी प्रभावित क्षेत्र घोषित किया जाए.

2. प्रभावित क्षेत्रों में प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 10 लीटर पीने योग्य पानी उपलब्ध कराया जाए.

3. प्रभावित आदिवासी परिवारों और बच्चों को पर्याप्त पौष्टिक भोजन दिया जाए.

4. आदिवासी कल्याण, टीकाकरण और पोषण से संबंधित सरकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए.

5. बच्चों की मौतों और बीमारी के प्रकोप के लिए जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच कर जवाबदेही निर्धारित की जाए.

6. आदिवासी समुदायों के बच्चों की सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक व्यवस्था में आवश्यक सुधार किए जाएं.

कुल मिलाकर यह मामला केवल बच्चों की मौतों तक सीमित नहीं है बल्कि दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, कुपोषण, सुरक्षित पेयजल, टीकाकरण, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवाल उठाता है.

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