हिमाचल प्रदेश के राजस्व और जनजातीय विकास मंत्री जगत सिंह नेगी ने शुक्रवार को राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला से मुलाकात की और राज्य के जनजातीय क्षेत्रों में वन संरक्षण अधिनियम को निलंबित करने के फैसले में जल्दी फैसला देने का आग्रह किया.
जगत नेगी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि राज्यपाल राज्य सरकार के मंत्रिमंडल के प्रस्ताव को मंजूरी देंगे जिसके बाद आदिवासी लोगों को नौतोड़ की जमीन मिल सकेगी.
हिमाचल प्रदेश में एक नौतोड़ नियम है जिसके तहत जंगल की ज़मीन भूमिहीन किसानों को मिलती है. लेकिन वन संरक्षण क़ानून इस नियम को लागू करने में बाधा पैदा करता है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस सिलसिले में एक आदेश पारित किया था. इस आदेश के अनुसार राज्य में नौतोड़ नियम अवैध हो गया है.
इसलिए सरकार राज्य में नौतोड़ नियम को बनाए रखने के लिए वन संरक्षण क़ानून को निलंबित करती रही है.
क्या है नौतोड़ नियम ?
हिमाचल प्रदेश में 1968 में एक नियम पारित हुआ था, नौतोड़ नियम. इस नियम के अनुसार, जिन लोगों के पास 20 बीघा से कम जमीन थी, उन्हें जमीन देने का प्रावधान किया गया था और सरकार न्यूनतम कर पर 20 बीघा तक जमीन उपलब्ध कराती थी.
इस नियम से राज्य के हजारों भूमिहीन लोगों को लाभ मिला था. 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू हुआ और नौतोड़ नियम समाप्त हो गया.
हालांकि उसके बाद भी जनजातीय लोगों को लंबे समय तक इसका लाभ मिलता रहा. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में वन संरक्षण अधिनियम को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया और जनजातीय क्षेत्रों में नौतोड़ भूमि आवंटन पर भी रोक लगा दी गई.
वर्ष 2014 में वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री काल में कांग्रेस सरकार ने जनजातीय लोगों को नौतोर प्रदान करने के लिए वन संरक्षण अधिनियम 1980 को निलंबित करने के लिए अनुसूची 5 के तहत राज्यपाल को एक प्रस्ताव पारित किया था.
शुरुआत में इसे 2014 से 2016 तक दो वर्षों के लिए यह कहकर निलंबित कर दिया गया था कि इसके कारण नौतोर प्राप्त करना कठिन हो गया था.
वर्ष 2016- 2018 में इन अधिनियमों को दो और वर्षों के लिए निलंबित कर दिया और क्षेत्र में लोगों को नौतोर भूमि मिलने लगी.
जगत नेगी ने यह भी कहा कि वर्ष 2020 में विपक्ष ने इस मुद्दे को फिर से उठाया लेकिन सरकार ने जनजातीय क्षेत्रों के लिए एक भी नौतोड़ को मंजूरी नहीं दी.

