चादर बादोनी: आदिवासी कलाकार बचेंगे तो कला फूले फलेगी

संताली और बांग्ला भाषा के मिश्रण से भी इस लोककला के कई नाम पड़े हैं. इससे जुड़े कलाकार इसका प्रदर्शन अगस्त के मध्य से शुरू कर नवंबर महीने तक गांव-गांव घूम कर किया करते थे. यह कहा जाता है कि 1855 के संताल हूल और उसके बाद आज़ादी की लड़ाई के दौरान चादर बादोनी कलाकार सिदो कान्हो की बाहदुरी के क़िस्से सुना कर लोगों देश भक्ति की भावना मज़बूत करते थे.

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चादर बादोनी संताल परगना के आदिवासियों की एक बेहद खूबसूरत कला है. यह कला लंबे समय से संताल आदिवासियों की संस्कृति का हिस्सा रही है. इस कला में संताल आदिवासियों के जीवन की झलक मिलती है. इसके अलावा इस कला से जुड़े संताली और बांग्ला गीत भी होते हैं.

पहले इस कला को शायद चदर-बदर के नाम से जाना जाता था. लेकिन आजकल इसको चादर बदोनी कहा जाने लगा है.  यह संताल आदिवासी समुदाय की एक परंपरागत कठपुतली लोक कला है.

मुख्य रूप से झारखंड के संताल परगना और पश्चिम बंगाल के झारखंड सटे संताल बहुल इलाकों में कभी यह काफी प्रचलित व लोकप्रिय रही थी. इस कठपुतली लोक कला को कुछ इलाक़ों में ‘चादर-बादोयनी तो कहीं छादर-बादरनी के नाम से भी पुकारा जाता है.

संताली और बांग्ला भाषा के मिश्रण से भी इस लोककला के कई नाम पड़े हैं. इससे जुड़े कलाकार इसका प्रदर्शन अगस्त के मध्य से शुरू कर नवंबर महीने तक गांव-गांव घूम कर किया करते थे. यह कहा जाता है कि 1855 के संताल हूल और उसके बाद आज़ादी की लड़ाई के दौरान चादर बादोनी कलाकार सिदो कान्हो की बाहदुरी के क़िस्से सुना कर लोगों देश भक्ति की भावना मज़बूत करते थे.

इस बेहद ख़ास कहानी की तलाश में हम दुमका के मसलिया ब्लॉक में नवासर गाँव पहुँचे. वैसे तो झारखंड और पश्चिम बंगाल के संताल इलाक़ों में इस कला को जानने वाले अनकों परिवार थे. लेकिन इस गाँव में इस कला को जानने वाला एक परिवार अभी भी बचा है.

यह परिवार इस लगभग लुप्त हो चुकी कला को बचाने में जुटा है. इस परिवार के मुखिया मानेश्वर मूर्मु और उनके कई साथियों की एक टीम बन गई है. 

जुलाई महीने की उमस भरी दोपहरी में हम मानेश्वर मूर्मु के घर पहुँचे थे. उनका घर एक दम संताली परंपरा के अनुसार ही बना है. इस घर में एक बड़ा सा आँगन है और खैपरल के छज्जे के नीचे बैठने के लिए जगह बनाई गई है.

आंगने में मिट्टी की मुढ्ढी बनी हैं और बराबर में ही एक परंपरागत चूल्हा है जिस पर लोहे की बड़ी कड़ाई रखी है. घर को देख कर ही अंदाज़ा होता है कि इस घर में सामाजिक समारोह होते हैं. मानेश्वर मूर्मु से उनके घर परिवार के बारे में काफी देर तक बातचीत होती रही थी.

लेकिन इस उमस भरी दोपहर में उनसे चादर बादोनी की कुछ झलकियाँ दिखाने का आग्रह करने में हिचक हो रही थी. लेकिन मानेश्वर मूर्मु उनके घर पर हमारे पहुँचने का मक़सद जानते थे. मैंने हिम्मत कर उनसे हमें चादर बादोनी का खेल दिखाने को कह ही दिया.

इस पर उन्होंने कहा कि वैसे साल का यह समय आदिवासी इलाक़ों में समारोह का नहीं बल्कि खेतों में काम करने का होता है. संगीत का साजो सामान भी मौसम में नमी की वजह से भारी हो जाता है. लेकिन वो जानते थे कि हम दिल्ली से उनसे मिलने पहुँचे हैं और दो दिन तक उन्हें खोजते रहे थे.

इसलिए उन्होंने हमारा आग्रह मान लिया और अपने दोस्तों को बुला भेजा, कुछ देर में उनके आँगन में चादर बादोनी का खेल शुरू हो गया. चादर बादोनी में माँदर, नगाड़े, बाँसुरी, झालर और घुँघरुओं से संगीत दिया जाता है. मानेश्वर मूर्मु कठपुतलियों को नचाते हैं और उनके साथी वाद्य बजाते हुए ख़ुद नाचते हैं. 

आदिवासी कठपुतली लोक कला  की खासयित ये है कि इन्हें उँगलियों पर नहीं नचाया जा सकता है. बल्कि इनको एक पैर के अंगूठे और उँगली के बीच फँसी गाँठ से कंट्रोल किया जाता है. चादर बादोनी का पूरा प्लेटफ़ार्म एक बांस पर टिका होता है, इस बांस पर मौजूद कठपुतलियों को नचाने के लिए इनको एक रस्सी से बांधा जाता है. यह रस्सी खोखले बांस से हो कर नीचे जाती है. 

मानेश्वर मुर्मू और इनके साथी बाबूधन मुर्मू, सोनाधन मुर्मू, शिवधन मुर्मू और बोरो मुर्मू इस कला को बचाने में जी जान से जुटे हैं. यह कला उन्हें कुछ प्रसिद्धि भी दे रही है. आजकल उन्हें कुछ स्थानीय  कार्यक्रमों या फिर आदिवासी उत्सवों में भी बुलाया जाने लगा है.

लेकिन यह कला उनकी आजीविका का साधन नहीं बन सकी है. इस कला को एक बड़ा बाज़ार या फिर संरक्षण   ही बचा सकता है. बाज़ार मिलने की संभावना तो फ़िलहाल कमजोर ही दिखाई देती हैं, क्योंकि उतने तो कलाकार ही नहीं बचे हैं जो इसे उस लोकप्रियता की उंचाई पर ले जाएँ जो इसको कभी हासिल थी. इसलिए इस कला का भविष्य इसको जानने वाले कलाकारों को आर्थिक प्रोत्साहन दे कर ही बचाया जा सकता है. 

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