कोया आदिवासी: जीने का पुरातन तरीक़ा और नए ज़माने की चुनौती

'इन तीलियों पर लगे चिपचिपे लेप में पक्षी आकर चिपक जाते होंगे' मैंने उन लड़कों से कहा. उन लड़कों ने हाँ में जवाब दिया था. लेकिन इस लेप में ऐसा क्या है कि पक्षी इन तीलियों पर आ जाते हैं और फँस जाते हैं. जब मैंने उनसे पूछा तो लड़के हंस दिए. उन्होंने कहा कि इस लेप में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पक्षी इन पर आ कर बैठ जाते हैं. पक्षियों को लालच देना पड़ता है और उसके लिए जतन करना पड़ता है.

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ओडिशा के मलकानगिरी ज़िले में रंगमाटियागुड़ा नाम का एक छोटा सा गाँव है. इस गाँव में कोया आदिवासी रहते हैं. इस गाँव में 30 परिवार है जिनकी कुल आबादी क़रीब 150 बताई जाती है.

शाम के समय इस गाँव में टहलते हुए हमारी मुलाक़ात कुछ लड़कों से हुई जिनकी उम्र 12-13 साल रही होगी. ये लड़के जंगल की तरफ़ से आ रहे थे. इन लड़कों के हाथों में चूहे थे जिन्हें इन्होंने पूँछ से पकड़ा हुआ था.

ये लड़के जंगल से चूहे मार कर लाए थे जो शाम को परिवार का खाना होगा. इन्हीं लड़कों में से एक के हाथ में बांस का एक टुकड़ा था. इस टुकड़े में बांस से बनी ढेर सारी तीलियाँ थीं. इन तीलियों में कुछ चिपचिपा लेप लगा था.

जब मैंने इन तीलियों और चिपचिपे लेप के बारे में पूछा तो लड़कों ने बताया कि वो इन तीलियों से पक्षी पकड़ते हैं. ‘इन तीलियों पर लगे चिपचिपे लेप में पक्षी आकर चिपक जाते होंगे’ मैंने उन लड़कों से कहा.

उन लड़कों ने हाँ में जवाब दिया था. लेकिन इस लेप में ऐसा क्या है कि पक्षी इन तीलियों पर आ जाते हैं और फँस जाते हैं. जब मैंने उनसे पूछा तो लड़के हंस दिए. उन्होंने कहा कि इस लेप में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पक्षी इन पर आ कर बैठ जाते हैं. पक्षियों को लालच देना पड़ता है और उसके लिए जतन करना पड़ता है.

चिपचिपे लेप का काम पक्षी को चिपका लेना भर ही होता है. पक्षियों को लालच कैसे दिया जाता है? मैं अब पूरी प्रोसेस देखना चाहता था.

मेरे कहने पर ये लड़के मुझे पक्षी का शिकार करने की विधि दिखाने को तैयार हो गए. इन लड़कों के साथ गाँव के कुछ बड़े लड़के भी शामिल हो गए. जंगल जाते हुए इन लड़कों से बात होती रही.

स्कूल जाने की बजाए यह बच्चा जंगल में चूहे पकड़ता है

इन लड़कों ने बताया कि गाँव के बच्चे दिन भर जंगल में भटकते रहते हैं और जो भी छोटा मोटा जानवर मसलन चूहा, गिलहरी या खरखोश मिल जाए उसे मार लाते हैं. इसके अलावा जंगल से कांदे खोद लाते हैं. उन्होंने बताया कि जंगल में कई तरह के कांदे मिल जाते हैं.

इन लड़कों ने जंगल में एक खुले इलाक़े में एक जगह पर कुछ जगह साफ़ कर दी. उसके बाद वहाँ एक छोटी से खूँटी गाड़ दी और उस खूँटी से एक ज़िंदा चूहा बांध दिया.

फिर इस खूँटी के चारों तरफ़ लेप लगी बांस की तीलियों को गाड़ दिया. अब मेरी समझ में आ गया था कि ये लड़के कैसे पक्षियों को फाँस लेते हैं. इन लड़कों ने बताया कि इन तीलियों पर जो लेप है वो महुआ के रस से बना है.

शाम का समय था और अब अंधेरा होने लगा था. हम बिना पक्षी पकड़े ही इन लड़कों के साथ गाँव लौट आए. इन लड़कों में से एक ने बताया कि वो हॉस्टल में रहता है. यह एक सरकारी हॉस्टल है जो आदिम जनजाति के लड़कों के लिए बनाया गया है.

यह लड़का छठी क्लास में पढ़ता है. वह आगे पढ़ना चाहता है लेकिन उसका मन हॉस्टल से ज़्यादा जंगल में लगता है.

गाँव पर एक नज़र डालने भर से समझ में आ जाता है कि यहाँ पर ग़रीबी और कुपोषण काफ़ी है. सरकार से राशन मिलता है इसलिए भूखमरी कम से कम नहीं है. गाँव के कई लोगों से बातचीत हुई.

अब इस गाँव के ज़्यादातर कोया आदिवासी खेती करने लगे हैं. लेकिन यह खेती मामूली ही कही जा सकती है. छोटे खेतों में बिना किसी आधुनिक औज़ारों के परिवार के गुज़ारे लायक़ भी पैदा नहीं हो पाता है.

यहाँ के कुछ लोग मज़दूरी के लिए कुछ महीनों के लिए बाहर जाते हैं. इस गाँव के लोगों से बात करेंगे तो आपको लगेगा कि ये लोग ख़ुद ही अपनी हालत के लिए ज़िम्मेदार हैं. सरकारी हॉस्टल होने के बावजूद बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं.

खेती किसानी को गंभीरता से नहीं लेते हैं. मज़दूरी भी टिक कर नहीं करना चाहते हैं. इन आदिवासियों में अभी भी जंगल के सहारे ही जीने की प्रवृति नज़र आती है. आदिवासी भारत में आदिम जनजातियों से मेरी मुलाक़ातों में मैंने यह बात लगभग सभी आदिम जनजातियों में देखी है.

इस अनुभव के आधार पर मुझे जो समझ में आया कि आदिम जनजातियों को मुख्यधारा में लाने का दावा और काम करने वाले लोग वहाँ पहुँच कर हार जाते हैं, जहां से उनका काम शुरू ही होता है.

स्कूल और हॉस्टल बना देने के बाद आदिम जनजाति के बच्चों को स्कूल लाना अगर बड़ी चुनौती है तो उससे भी बड़ा काम है इन बच्चों को स्कूल में रोक कर रख पाना. इन आदिवासियों को खेती या दूसरे काम की आदत डालना बेहद ज़रूरी लेकिन मुश्किल काम है.

इन आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के काम में जुटे लोगों को समझना होगा कि इनकी ज़िंदगी की फ़लसफ़ा क्या रहा है. ये आदिवासी मानते रहे हैं कि कुदरत ने सभी के जीने का इंतज़ाम किया है. फिर बेबात में हाड़ तोड़ने और कुदरत के ख़िलाफ़ जाने की ज़रूरत क्या है.

अंततः तो सभी को दो वक़्त का खाना ही चाहिए, वो तो जंगल से मिल ही रहा है.

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